हज़रत ख्वाजा अब्दुल्लाह अल्मारूफ़ ख्वाजा खुर्द नक्शबंदी देहलवी रहमतुल्लाह अलैह

हज़रत ख्वाजा अब्दुल्लाह अल्मारूफ़ ख्वाजा खुर्द नक्शबंदी देहलवी रहमतुल्लाह अलैह

विलादत

कुल्लियाते बाकी बिल्लाह! में मौलाना अबुल हसन फारूकी नक्शबंदी रहमतुल्लाह अलैह रकमतराज़ हैं के: हज़रत ख़्वाजा बाक़ी बिल्लाह नक्शबंदी देहलवी रहमतुल्लाह अलैह! ने हज़रत ख्वाजा अब्दुल्लाह अल्मारूफ़ ख्वाजा खुर्द नक्शबंदी रहमतुल्लाह अलैह की पैदाइश के मौके पर फ़रमाया: आप ने अपने फ़रज़न्द को ऐसा गुले शकर यानि गुलकंद बताया है:
जिस की शकर हिन्द की हवा और फूल तुर्क का हो, इससे मालूम हुआ के इस फ़रज़न्द की वालिदा कश्मीर की थीं, और वालिद माजिद तुर्क हैं, आप अपने भाई से 4/ महीने और 5/ दिन छोटे थे, पैदाइश 6/ रजब 1010/ हिजरी बा वक़्ते सुबह सादिक हुई थी, आप का नाम वालिदा की तरफ से “ज़कीयुद्दीन” था, मगर आप ने हज़रत ख्वाजा अब्दुल्लाह अल्मारूफ़ ख्वाजा खुर्द रहमतुल्लाह अलैह के नाम से शुहरत पाई, आप शक्लो सूरत से हज़रत ख़्वाजा बाक़ी बिल्लाह नक्शबंदी देहलवी रहमतुल्लाह अलैह! से बहुत मुशाबहत रखते थे, जब आप गुफ्तुगू फरमाते थे, तो ऐसा लगता था, के हज़रत ख़्वाजा बाक़ी बिल्लाह रहमतुल्लाह अलैह! मुताकल्लिम फरमा रहे हैं, हज़रत ख्वाजा खुर्द रहमतुल्लाह अलैह अपने भाई की तरह साहिबे ज़ाहिद और साहिबे इल्मो फ़ज़्लो कमाल थे, बड़े भाई का बहुत अदबो लिहाज़ करते थे, हर बात में उन्हें फौकियत देते थे,
हज़रत ख्वाजा अब्दुल्लाह अल्मारूफ़ ख्वाजा खुर्द रहमतुल्लाह अलैह! जब सने बूलूग को पहुंचे तो हज़रत ख्वाजा हुस्सामुद्दीन रहमतुल्लाह अलैह की तरबियत व शफकत की बदौलत फ़ज़ीलतो सलाहीयत पाई, और हज़रत ख्वाजा हुस्सामुद्दीन रहमतुल्लाह अलैह के ईमा पर हज़रत ख्वाजा शैख़ अल्लाह दाद रहमतुल्लाह अलैह से सिलसिलए आलिया नक्शबंदिया में शुगलो औराद वज़ाइफ़ सीखे, हज़रत ख्वाजा अब्दुल्लाह अल्मारूफ़ ख्वाजा खुर्द रहमतुल्लाह अलैह! अपने बुज़ुर्गों के नक़्शे कदम पर गामज़न हुए, फिर आप इस के बाद तालीम हासिल करने के लिए सरहिंद शरीफ गए, वहां आप ने कुरआन शरीफ हिफ़्ज़ किया और बातनी उलूमे फुनून हासिल किए, आप ने शरहे लमआत! के तीन सबक हज़रत शैख़ अब्दुल अज़ीज़ शकर बार से पढ़े थे।

हज़रत ख्वाजा अब्दुल्लाह अल्मारूफ़ ख्वाजा खुर्द रहमतुल्लाह अलैह! ज़िक्र मुराकिबा की तालीम इमामे रब्बानी मुजद्दिदे अल्फिसानी शैख़ अहमद सरहिंदी रहमतुल्लाह अलैह! से हासिल की है, कई मर्तबा आप दिल्ली से पैदल और सवारी में हज़रत मुजद्दिदे अल्फिसानी शैख़ अहमद सरहिंदी रहमतुल्लाह अलैह! के आस्ताने पर हाज़िर हुए हैं, सरहिंद में कई कई दिन गुज़ारे हैं, ख़ास तवज्जुहात फीयूज़ हासिल किए, हज़रत मुजद्दिदे अल्फिसानी शैख़ अहमद सरहिंदी रहमतुल्लाह अलैह! ने आप की तारीफ में एक मर्तबा फ़रमाया: वो मुहम्मदी मशरब लोगों में से हैं और महबूबों में से हैं और वो निस्बते तौहीद के मग्लूबों में से हैं,

आप की सखावत

हज़रत ख्वाजा अब्दुल्लाह अल्मारूफ़ ख्वाजा खुर्द रहमतुल्लाह अलैह! एक दिन आप बाज़ार तशरीफ़ ले जा रहे थे, शदीद गर्मी और लू का ज़माना था, रास्ते में एक कलंदर मिला और उसने आप से जूतियों का सवाल किया, आप ने फ़ौरन अपनी जूतियां पाऊँ से निकाल कर इस को दे दें,
एक दिन आप बाज़ार में रौनक अफ़रोज़ थे के एक बछड़े को प्यास ने बेचैन कर दिया, आप ने अपने हाथों से उस को पानी पिला दिया,
एक मर्तबा एक नावाकिफ आदमी आप के पास आया और आप से कुबा का सवाल किया, आप ने फ़ौरन अपने जिस्म से कुबा उतार कर उस को देदी।

करामात

दिल्ली के एक बुज़रुग ने हज़रत ख्वाजा अब्दुल्लाह अल्मारूफ़ ख्वाजा खुर्द रहमतुल्लाह अलैह! को एक रुक्का लिखा के अगर आप एक सबक अरबी का मुझ को पढ़ा दिया करे तो आप आप की बड़ी महरबानी होगी, आप ने रुक्का के हाशिया पर लिख दिया के आधे रमज़ान मुबारक की शर्त किस के लिए है? आप ने फ़रमाया के इसी तरह मेरे दिल में आया है, आखिर वो नौजवान 14/ रमज़ान 1073/ हिजरी को फौत हो गया,

भूक ख़त्म हो गई

हज़रत मौलाना शाह अब्दुर रहीम देहलवी रहमतुल्लाह अलैह का बयान है के एक दफा हम दोनों भाई हज़रत ख्वाजा अब्दुल्लाह अल्मारूफ़ ख्वाजा खुर्द रहमतुल्लाह अलैह! की खिदमत में हाज़िर थे के इन पर भूक का ग़लबा हुआ जिस के सबब वो सबक पढ़ाने के काबिल ना रहे, अपने घर वालों से पूछा कोई खाने की चीज़ मौजूद है? उन्होंने कहा के हाँ बच्चों के लिए थोड़ा खाना बनाया है, फ़रमाया उस में से थोड़ा सा ले आओ, चुनांचे पियाली में बहुत ही थोड़ा खाना लाया गया, आप ने हाथ धोए और हाज़रीन से कहा आओ मिलकर खाएं, सब को काफी है, सब लोग तअज्जुब में आ गए, दूसरे चले गए, हम तीनो ने मिल कर खाया, यहाँ तक से सब का पेट भर गया और पियाली में भी कुछ बच गया जो बच्चे के लिए भेज दिया गया।

उर्से ख्वाजा बाकी बिल्लाह

हज़रत ख्वाजा अब्दुल्लाह अल्मारूफ़ ख्वाजा खुर्द रहमतुल्लाह अलैह! कभी कभार अपने वालिद मुहतरम हज़रत ख़्वाजा बाक़ी बिल्लाह नक्शबंदी देहलवी रहमतुल्लाह अलैह! का उर्स भी किया करते थे, हज़रत मौलाना शाह अब्दुर रहीम देहलवी रहमतुल्लाह अलैह फ़रमाया करते थे के हमने बारहा देखा के कोई शख्स इन के सामने आ कर कहता है, हज़रत चावल मेरे ज़िम्मा, दूसरा कहता हुज़ूर, गोश्त मेरे ज़िम्मा, तीरसा कहता हज़रत फुलां कव्वाल को में ला रहा हूँ और इसी तरह दूसरे इन्तिज़ामत भी हो जाते, हज़रत ख्वाजा अब्दुल्लाह अल्मारूफ़ ख्वाजा खुर्द रहमतुल्लाह अलैह! उस दौरान कोई तकल्लुफ नहीं करते थे।

वफ़ात

आप ने हज़रत औरंगज़ेब आलमगीर रहमतुल्लाह अलैह के दौरे हुकूमत में 25/ जमादीयुल ऊला 1074/ हिजरी बरोज़ बुध 63, साल दस महीने 19, दिन की उमर में वफ़ात पाई।

मज़ार शरीफ

आप का मज़ार मुबारक दिल्ली शरीफ में हज़रत ख़्वाजा बाक़ी बिल्लाह नक्शबंदी देहलवी रहमतुल्लाह अलैह! के मज़ार मुबारक से पच्छिम की जानिब बराबर में मरजए खलाइक है।    

“अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त की उन पर बेशुमार रहमत हो और उन के सदके में हमारी मगफिरत हो” 

रेफरेन्स हवाला                                                                            

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