हज़रत शैख़ इबने अली मक्की बदायूनी रहमतुल्लाह अलैह की ज़िन्दगी

हज़रत शैख़ इबने अली मक्की बदायूनी रहमतुल्लाह अलैह की ज़िन्दगी

सीरतो ख़ासाइल

किताब फ़वाईदुल फवाइद! में मज़कूर है के हज़रत शैख़ इबने अली मक्की बदायूनी रहमतुल्लाह अलैह! एक नेक और बा बरकत शख्स थे, और सुल्तानुल मशाइख सरकार महबूबे इलाही निज़ामुद्दीन औलिया देहलवी रहमतुल्लाह अलैह! ने फ़रमाया है के शैख़ मौसूफ़! अल्लाह पाक से जो दुआ माँगा करते थे के मेरी वफ़ात ना तो मेरे वतन बदायूं में हो और ना किसी ऐसी जगह हो जहाँ जाने का मेरा क़स्द हो चुनांचे ये दुआ आप की कुबूल हुई,
एक मर्तबा हज़रत शैख़ इब्ने अली मक्की बदायूनी रहमतुल्लाह अलैह! बदायूं से सफर के इरादे से निकले, क़स्बा निजलाना में पहुंच कर जब बदायूं की वापसी का इरादा किया और निजलाना से रवाना हुए, तो आप बीमार हो गए और निजलाना से थोड़ी दूर पर इन्तिकाल फ़रमाया: और आप बदायूं ना पहुंच सके।

सेरो सियाहत

सुल्तानुल मशाइख सरकार महबूबे इलाही निज़ामुद्दीन औलिया देहलवी रहमतुल्लाह अलैह! ने हज़रत शैख़ इबने अली मक्की बदायूनी रहमतुल्लाह अलैह! की एक हिकायत बयान की है के: एक मर्तबा हज़रत शैख़ इबने अली मक्की बदायूनी रहमतुल्लाह अलैह! सियाहत करते हुए मुल्के ईरान के शहर किरमान! पहुंचे वहां के क़ाज़ी ने एक सिमा की मजलिस काइम की, और अक्सर मशाइखे इज़ाम को दावत दी, और एक फ़कीर गरीब व ज़ईफ़ ना ख्वान्दाह मेहमान की तरह उस दावत में चला आया और एक गोशे में बैठ गया, जब सिमा शुरू हुआ, तो सब से पहले उस फ़कीर पर असर हुआ और वो वज्द के तौर पर उठा, क़ाज़ी को रऊनत व गुरूर के तौर पर ये बात नागवार गुज़री के एक गुमनाम फ़कीर से रक्स की इब्तिदा हो, फ़कीर को फ़ौरन क़ाज़ी ने आवाज़ दी, के बैठा जा! फ़कीर आज़ुर्दाह हो कर बैठा गया, जब सिमा गरम हुआ तो क़ाज़ी साहब! को खुद वज्द आ गया, और उठना चाहा के रक्स करू, इस फ़कीर ने डाँट कर कहा के “क़ाज़ी बैठ जा” ये आवाज़ कुछ इस तरह दी के सब के दिल पर हैबत तारी हो गई और क़ाज़ी साहब! फ़ौरन बैठ गए, जब मजलिस बर्ख्वस्त हुई, तो फ़कीर भी चला गया, मगर क़ाज़ी साहब! उस जगह से ना हिल सके, सात साल तक इसी हालत में रहे, 7/ साल के बाद फ़कीर का गुज़र फिर उसी जगह से हुआ और क़ाज़ी साहब की हालत रद्दी देख कर फ़कीर ने कहा के क़ाज़ी उठ जा,
मगर क़ाज़ी साहब ना उठ सके, फिर दोबारा फ़कीर ने यही कहा , मगर क़ाज़ी साहब ने उठने की कोशिश ना की, तीसरी बार फ़कीर ने खफा हो कर कहा “अच्छा अब इसी हालत में रहो” और मर जाओ” ये कह कर फिर चल दिया, अब काज़ी साहब को भी होश आया, फ़कीर की तलाश में आदमी को दौड़ाया, मगर उस का पता ना चल सका और क़ाज़ी साहब उसी हालत में चंद रोज़ बाद खत्म गए,

वफ़ात

अफ़सोस के आप की तारीखे विसाल ना मिल सकी।

मज़ार मुबारक

हज़रत शैख़ इबने अली मक्की बदायूनी रहमतुल्लाह अलैह! का और कुछ हालाते ज़िन्दगी मालूम ना हो सके, और क़स्बा निजलाना जिस के करीब आप मदफ़ून हैं ये कहाँ पर है? गालिबन बदायूं के करीब इस नाम का कोई क़स्बा कदीम ज़माने में होगा, जिस का अब नाम बदल दिया गया हो, हज़रत शैख़ इब्ने अली मक्की बदायूनी रहमतुल्लाह अलैह! का ज़माना सातवीं सदी हिजरी के निस्फ़ आखिर में मालूम होता है,

“अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त की उन पर बेशुमार रहमत हो और उन के सदके में हमारी मगफिरत हो”

रेफरेन्स हवाला

(1) मरदाने खुदा
(2) तज़किरतुल वासिलीन

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