बैअतो खिलाफत
सुल्तानुल मशाइख सरकार महबूबे इलाही निज़ामुद्दीन औलिया देहलवी रहमतुल्लाह अलैह, के मुरीद, हज़रत मौलाना वजीहुद्दीन पाइली रहमतुल्लाह अलैह अपने वक़्त के उल्माए किराम के मुक्तदा, सुल्हा, के पेशवा दानिशमंद, ज़ुहदो वरा तकवाओ तदय्युन, में मुमताज़ थे और आप अपने पीरो मुर्शिद सरकार महबूबे इलाही निज़ामुद्दीन औलिया देहलवी रहमतुल्लाह अलैह से कमाल दर्जे का ऐतिकाद रखते थे,
खिलाफ़तो इजाज़त
हज़रत मौलाना वजीहुद्दीन पाइली रहमतुल्लाह अलैह का असली वतन पाइली है जो सरहिंद शरीफ से तकरीबन 12/ मील के फासला पर है, आप ने हज़रत मौलाना अबुल कासिम हमीदुद्दीन ज़रीर के शागिर्द मौलाना अबुल कासिम तनूजी से तालीम हासिल की, हज़रत मौलाना वजीहुद्दीन पाइली रहमतुल्लाह अलैह! की मुलाकात हज़रत खिज़र अलैहिस्सलाम से होती रहती थी, और हज़रत खिज़र अलैहिस्सलाम से होती रहती थी और हज़रत खिज़र अलैहिस्सलाम ही के इशारे पर आप सरकार महबूबे इलाही निज़ामुद्दीन औलिया देहलवी रहमतुल्लाह अलैह के मुरीद हुए।
वो इतना इल्म नहीं रखता
एक मर्तबा आप सरकार महबूबे इलाही निज़ामुद्दीन औलिया देहलवी रहमतुल्लाह अलैह की बारगाह में हाज़री के लिए तशरीफ़ ला रहे थे के रास्ता में एक बूढ़ा आदमी मिला जो सूफियों की तरह सूरत बनाये हुए था, इस ने मौलाना को सलाम किया और इस तरह गुफ्तुगू की के में बहुत दूर से आया हूँ, मुख्तलिफ उलूम में मेरी कुछ मुश्किलात हैं इन को में आप से हल करना चाहता हूँ, मौलाना ने फ़रमाया अच्छा, उस शख्स ने निहायत दानिशमंदी से अपने सवालात शुरू किए, मौलाना ने उस के सवालात के निहायत माकूल जवाब दिए लेकिन मौलाना उस तक़रीर सुन कर हैरान थे, के ये आदमी इस शहर का रहने वाला नहीं, फिर से इतने उलूम कहाँ से हासिल कर लिए, जब वो इल्मी बहस से फारिग हुआ, तो इस ने मौलाना से पूछा के आप कहाँ जा रहे हैं?
हज़रत मौलाना वजीहुद्दीन पाइली रहमतुल्लाह अलैह ने फ़रमाया के में सरकार महबूबे इलाही निज़ामुद्दीन औलिया देहलवी रहमतुल्लाह अलैह की खिदमत में जा रहा हूँ, उस ने कहा के में इन से बारहा मिला हूँ वो इतना इल्म नहीं रखते जितना आप के पास है, फिर आप इन के पास जा रहे हैं, मौलाना ने फ़रमाया आप कैसी बातें कर रहे हैं, ला हऊला वला कुव्वता इल्ला बिल्लाह! वो तो इल्म के समंदर हैं, वो शख्स जो करीब हो कर आप से महवे गुफ्तुगू था ला हऊल सुन कर दूर हो गया, मौलाना ने बार बार ला हऊल पढ़ा, यहाँ तक के वो शख्स ग़ायब हो गया, जब मौलाना सरकार महबूबे इलाही निज़ामुद्दीन औलिया देहलवी रहमतुल्लाह अलैह की खिदमत में पहुचें तो मौलाना के बताने से पहले ही सरकार महबूबे इलाही निज़ामुद्दीन औलिया देहलवी रहमतुल्लाह अलैह ने नूरे बातिन से मालूम कर के फ़रमाया मौलाना! तुम ने इस शख्स को पहचाना के वो कौन था? अगर तुम से इस के पह्चानने में ज़रा भी गलती होती तो तुम्हारी रहज़नी कर ही चुका था, (वो शैताने लाइन था जो मौलाना को सरकार महबूबे इलाही निज़ामुद्दीन औलिया देहलवी रहमतुल्लाह अलैह के पास आने से रोकना चाहता था।
दफा हज़रत मौलाना वजीहुद्दीन पाइली रहमतुल्लाह अलैह सरकार महबूबे इलाही निज़ामुद्दीन औलिया देहलवी रहमतुल्लाह अलैह की खिदमत में हाज़िर हुए और जब जमात खाना में दस्तर ख्वान पर बैठे तो इन के जूते कोई उठा कर ले गया, सरकार महबूबे इलाही निज़ामुद्दीन औलिया देहलवी रहमतुल्लाह अलैह को जब इस की खबर हुई तो आप ने अपने खास जूते मौलाना को अता फरमाए, मौलाना इन जूतों को बोसा देते हुए बाहर आए और जूतों को अपनी दस्तर में रख लिया और नग्गे पैर अपने घर को रवाना हुए, मुरीदों ने जब आप को नग्गे पैर देखा तो कहा के हज़रत ने ये जूते इस लिए इनायत फरमाए थे के आप नग्गे पैर न जाएं लेकिन आप नग्गे पैर जा रहे हैं, मौलाना ने फ़रमाया के ये जूते तो मेरे सर का ताज हैं जो आज हज़रत की तरफ से मुझे इनआम में मिले हैं, मेरी किया मजाल है के में इन को पाऊं में पहनू, जब सरकार महबूबे इलाही निज़ामुद्दीन औलिया देहलवी रहमतुल्लाह अलैह को इस की खबर हुई के मौलाना इन जूतों को सर पर रख कर जा रहे हैं तो सरकार महबूबे इलाही निज़ामुद्दीन औलिया देहलवी रहमतुल्लाह अलैह ने फ़रमाया के मौलाना से कहो वो पहले यहाँ से क़ुत्बुल अक्ताब हज़रत ख्वाजा कुतबुद्दीन बख्तियार काकी देहलवी रहमतुल्लाह अलैह के मज़ार शरीफ की ज़ियारत के लिए जाओ, चुनांचे मौलाना आप के हुक्म के मुताबिक हज़रत ख्वाजा कुतबुद्दीन बख्तियार काकी देहलवी रहमतुल्लाह अलैह के मज़ार मुबारक की ज़ियारत के लिए गए, जब आप क़ुत्बुल अक्ताब हज़रत ख्वाजा कुतबुद्दीन बख्तियार काकी देहलवी रहमतुल्लाह अलैह के मज़ार मुबारक पर पहुंचे तो वहां अपने जूतों को रखा पाया।
मन्क़ूल
एक बार हज़रत मौलाना वजीहुद्दीन पाइली रहमतुल्लाह अलैह शैखुल इस्लाम हज़रत बाबा फरीदुद्दीन मसऊद गंजे शकर रहमतुल्लाह अलैह की ज़ियारत के लिए पाकपटन तशरीफ़ ले गए, जब आप मज़ार मुबारक के करीब बैठे तो मज़ार मुबारक से आवाज़ आई खूब बाए हो अबू हनीफा पाइली,
सीरतो ख़ासाइल
हज़रत मौलाना वजीहुद्दीन पाइली रहमतुल्लाह अलैह अपनी मेहनत से रोज़ी हासिल करते थे, मोटा लिबास और दरमियानी दस्तार, बांधते थे, आप अक्सर सफ़ेद रंग का लिबास पहिनते थे, आप इल्मो अक्ल में निहायत कामिल, आप अपने पास कोई किताब नहीं रखते थे और पढ़ाते वक़्त आप के सामने बड़े बड़े उल्माए किराम अदब से दो ज़ानों हो कर बैठे थे, और हर दफा जब किसी मसले को दोबारा बयान फरमाते तो उसे नए अंदाज़ में बयान फरमाते थे, आप के शागिर्दों में अल्लामा सिराजुद्दीन उमर, इबने इसहाक ग़ज़नवी, क़ाज़ी कमालुद्दीन हांसवी, और इन के दामाद कतलुग खान और दूसरे मशहूर उल्माए किराम हैं।
वफ़ात
आप रहमतुल्लाह अलैह ने 729/ हिजरी में आगे पाई।
मज़ार शरीफ
आप का मज़ार मुबारक, महरूली दिल्ली 30/ में शम्शी होज़ के पच्छिमी जानिब था, मगर अब निशान भी नहीं है, वहीँ,
“अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त की उन पर बेशुमार रहमत हो और उन के सदके में हमारी मगफिरत हो”
रेफरेन्स हवाला
रहनुमाए मज़ाराते दिल्ली

