हज़रत शाह जलालुद्दीन शिराज़ी देहलवी रहमतुल्लाह, “गुलशने राज़” के शारेह, हज़रत शैख़ मुहम्मद नूर बख्श रहमतुल्लाह अलैह से मुरीद थे, बादशाह सिकंदर के दौरे हुकूमत में आप हिजाज़े मुकद्द्स से दिल्ली तशरीफ़ लाए, आप बड़े साहिबे नज़र बुज़रुग थे, हज़रत मौलाना जलालुद्दीन रूमी रहमतुल्लाह अलैह की मसनवी को बड़ी अक़ीदतों मुहब्बत से पढ़ा करते थे, आप का कद मियाना और चेहरा नूरानी था, जब से आप दिल्ली में तशरीफ़ लाए उस वक़्त से आखिर तक कभी भी आप के बावर्ची खाना की आग ठंडी नहीं हुई, हर वक़्त महमानो के लिए रोटी फीरनि, तय्यार रहती थी,हर मेहमान को और खाने के अलावा रोटी और फीरनि भी खिलाई जाती थी,
आप फ़रमाया करते थे एक मर्तबा में ने हरम शरीफ में एक दुर्वेश से ऐसी बात सुनी जो शरीअत के खिलाफ थी, मेने चाहा के इस को इस बात की सज़ा दूँ, जब उसने महसूस किया के में उसे को सज़ा देने का इरादा रखता हूँ तो वो पहाड़ों की तरफ भागने लगा, में भी उस के पीछे चला लेकिन वो मेरे हाथ न आया, अलबत्ता जब वो भाग रहा था तो एक बार उसने मेरी तरफ मुड़ कर देखा ये शेर पढ़ा
तर्जुमा
एक नामालूम हाथ मेरा गिरिबान खींच रहा है और में इस हाथ और गिरिबान के पीछे भाग रहा हूँ, बुखारा के सादाते किराम से भी आप के बहुत करीबी तअल्लुक़ात हो गए थे, यहाँ तक के आप ने अपनी लड़की की शादी हज़रत हाजी अब्दुल वहाब बुखारी के साहबज़ादे हज़रत शैख़ मुदस्सिर से की।
वफ़ात
आप रहमतुल्लाह अलैह ने हुमायूँ के दौरे हुकूमत में 944/ हिजरी में वफ़ात पाई।
मज़ार शरीफ
आप रहमतुल्लाह अलैह का मज़ार मुबारक, दिल्ली मालविये नगर दिल्ली 17/ में था, मगर अफ़सोस हम को नहीं मिला।
“अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त की उन पर बेशुमार रहमत हो और उन के सदके में हमारी मगफिरत हो”
रेफरेन्स हवाला
रहनुमाए मज़ाराते दिल्ली

