सुल्तान शहाबुद्दीन गौरी! को फ़तेह की बशारत
जिस रोज़ सरकार ख्वाजा गरीब नवाज़ रदियल्लाहु अन्हु! की ज़बाने मुबारक से ये अलफ़ाज़ निकले “में ने इस को ज़िंदा गिरफ्तार कर के शाहे इस्लाम के हवाले कर दिया” उसी रात को सुल्तान शहाबुद्दीन गौरी! जो उस वक़्त शहर खुरासान, में था, सुल्तान! मौसूफ़ हिंदुस्तान में सरकार ख्वाजा गरीब नवाज़ रदियल्लाहु अन्हु! के सामने खड़ा है, आप रदियल्लाहु अन्हु! फरमा रहे हैं, “ऐ शहाबुद्दीन! अल्लाह पाक ने तुझे हिंदुस्तान की सल्तनत अता फ़रमाई है, जल्द हिंदुस्तान की तरफ मुजवज्जेह हो,और उस बदबख्त राजा को ज़िंदा गिरफ्तार कर के सज़ा दे” इस ख्वाब से बेदार होकर सुल्तान शहाबुद्दीन गौरी! ने अहले इल्मो फ़ज़्ल से इस ख्वाब की ताबीर पूछी वो हैरान था, इलाही ये माजरा क्या है, साहिबे दानिशो इल्म ने सुल्तान! को मुबारक बाद दी और फ़तेहो कामरानी की खुशखबरी सुनाई,
हिंदुस्तान की तरफ रवानगी
इस रूहानी बशारत से लोगों के हौसले बुलंद हो गए, इसी इसना में किला सरहिंद के सुकूत की खबर सुल्तान! को पहुंची, अब इस के लिए मुमकिन नहीं था के ताख़ीर से काम लिया जाए, ज़ेरे इताब उमरा को बुलाया, वो अपने किए पर नादिम थे, सुल्तान ने उन की खता माफ़ कर दी, और अपनी फौज में शामिल कर लिया, इस दफा सुल्तानी फौज के तमाम अमीरो ने हल्फ़ उठाया के मरजाएंगे लेकिन मैदाने जंग से मुँह नहीं मोड़ेंगे, गर्ज़ 102000/ एक लाख बीस हज़ार जंगजुओ फौजियों को ले कर पूरी तय्यारी और साज़ो सामान के साथ सुल्तान शहाबुद्दीन गौरी! हिंदुस्तान की तरफ रवाना हुआ,
राजा पिरथवी राज को पैगाम भेजा
सुल्तान शहाबुद्दीन गौरी! इस्लामी लश्कर के हमराह शहर पिशावर, पंहुचा और वहां के पठानों से मुलाकातें कीं, और उन को अपने साथ मिला लिया, और उनको मुनासिब उहदों पर तअय्युनात करने का वादा किया, फिर शहर मुल्तान का रुख किया, और वहां चंद रोज़ क़याम करने के बाद वहां के तमाम सरदारों को जमा कर के उन के सामने मुख़्तसर ख़िताब किया, और कहा के पिछले साल हिन्दुओं के हाथों मुसलमानो को जो शिकस्त उठानी पड़ी है, अब वक़्त आ गया है इस का बदला लिया जाए, तमाम सरदारों ने साथ देने का वादा किया और इस के बाद सुल्तान शहाबुद्दीन गौरी! तेज़ी से शहर लाहौर की तरफ रवाना हुआ, शहर लाहौर पहुंचने के बाद सुल्तान शहाबुद्दीन गौरी! ने अपना एक सफीर! सय्यद तवामुल मलिक रुकनुद्दीन! को राजा पिरथवी राज! के पास भेजा, सफीर ने अजमेर शरीफ पहुंच कर सुल्तान! का एक खत राजा पिरथवी राज! को दिया जिस में तहरीर था, के राय पिथोरा को जो राजगाने हिन्द का महा राजा कहलाता है लिखा जाता है के, वो इस्लाम कबूल कर ले और मुल्क को इंसानो की कत्ल गाह ना बनाए वरना ये मुल्क अल्लाह का है और उसी का हुक्म और तलवार फैसला करेगी,
राजा पिरथवी राज! ने इस खत का निहायत तल्ख़ जवाब दिया और तमाम राजगाने हिन्द के नाम तहरीर जारी करदी के सुल्तान शहाबुद्दीन गौरी! का मुकाबला करने के लिए तय्यार हो जाओ, 300000/ तीन लाख राजपूतों फौजियों का लश्कर राजा पिरथवी राज! के झंडे के नीचे जमा हो गए, इधर राजा पिरथवी राज! की फौज चली, उधर शहाबुद्दीन का लश्कर बढ़ा, सरदस्ती नदी के किनारे पर दोनों लश्कर खेमा ज़न हो गए,
इसी इसना में सुल्तान शहाबुद्दीन गौरी! को राजा पिरथवी राज! का एक खत मिला जिस में लिखा था, इस्लाम के सिपेहसालार को जासूसों के ज़रिए मालूम हो गया होगा, के सब धरम की हिफाज़त के लिए हमारे पास आसमान के सितारों से भी ज़ियादा लश्कर मौजूद है, हिंदुस्तान के कोने कोने से धरम की हिफाज़त करने वाले चले आ रहे हैं, इन में ऐसे ऐसे बहादुर हैं जिस की तलवार से काबुल! और कंधार, तक ने पनाह मांगी है, तुम इन तुर्क बच्चों और अफगान जवानो की जवानी पर रहम खाते हुए यहाँ से लोट जाओ, वरना याद रखो हमारे पास बेशुमार जंगी सामान मौजूद है, तुम्हारा एक सिपाही ज़िंदा वापस जाने में कामयाब न हो सके गए, सुल्तान शहाबुद्दीन गौरी! खत पढ़कर खामोश हो गए, उसे यकीनों ऐतिकाद था, के फ़तेह का दारोमदार अल्लाह पाक की मदद पर मबनी है।
मआरका जंग
27/ मुहर्रमुल हराम 588/ हिजरी को दोनों लश्कर लड़ाई के लिए तय्यार हो कर एक दूसरे के सामने आ गए, राजा पिरथवी राज! ने अपनी फौज इस तरह तरतीब दी के आगे एक लाख तीर अंदाज़, इन पीछे 150/ डेढ़ सौ राजाओं की फौजें और उन के पीछे पिरथवी राज पचास हज़ार सवारों के साथ मौजूद था, और इस के पीछे जंगी हाथियों की कतार थी, सुल्तान शहाबुद्दीन गौरी! ने फौज के पांच हिस्से किए, एक हिस्से को जिस में बीस हज़ार सवार, और तीस हज़ार पैदल थे कमाल की शक्ल में तरतीब दिया, और इसे सब से आगे रखा, तीन हिस्सों को एक एक तजुरबेकार सिपेहसालार के सुपुर्द कर के हिदायत की, के वो लड़ाई के शुरू में खामोश खड़े रहे हैं, और थोड़े थोड़े वक्फे के बाद मुख्तलिफ सिम्तों से हमला करें चीदा चीदा सवार सुल्तान शहाबुद्दीन गौरी! ने अपनी खास फौज में रखे और एक ऊँचे टीले पर खड़ा हो गया, तबले जंग बजते ही हिन्दू लश्कर के तीर अंदाज़ों ने तीरों की बारिश शुरू कर दी, इधर से सुल्तान शहाबुद्दीन गौरी! की फौज ने अपने नेज़े सभाल कर बिजली की तरह हिन्दू लश्कर पर जा पड़ी और जंग शुरू हो गई,
जंग शुरू हो गई
राजपूत जांबाज़ और मुस्लमान मुजाहिदों में इस ज़ोर का रन पड़ा के ज़मीन काँप उठी, सुल्तान! तेज़ रफ़्तार सवारों के ज़रिए अपनी फौज को हिदायत भेजता रहा, जंग शुरू होने के बाद सुल्तान! की महफूज़ फौज के दस्ते बारी बारी मुख्तलिफ सिम्तों से हमला करने लगे, इस अंदाज़े जंग से हिन्दू लश्कर बोखला गया, लेकिन राजाओं के जोश दिलाने पर राजपूत जांबाज़ों ने निहायत साबित कदम रहकर मुकाबला किया, सुल्तान! की हिदायत के मुताबिक मुस्लमान फौज ने लड़ाई को बहुत वसी रकबे तक फैला दिया, और हिन्दू लश्कर जो एक सीसा पिलाई दीवार की तरह खड़ा था, मुख्तलिफ सिम्तों में फ़ैल कर बिखर गया, मुस्लमान फौज का मकसद लड़ाई को तूलदेकर हिन्दू लश्कर को थकाना था, इस मकसद में पूरी कामयाबी मिली और से पहर तक हिन्दू फौज पर थकावट के आसार नुमाया होने लगे, सुल्तान शहाबुद्दीन गौरी! के फौजी मुजाहिदीन ने फलक शिगाफ़ नाराए तकबीर लगाए हिन्दू लश्कर को अपने नैज़ों पर रख लिया ये हमला इतना खौफनाक और शदीद था के हिन्दू लश्कर हज़ार कोशिश के बावजूद साबित कदम न रहे सके, बीसियों हिन्दू राजा जो अपनी फौज को लड़ाई पर उभार रहे थे, खाको खून में लोट गए, और हिन्दू फौज अपने हज़ार मक़तूलों को मैदाने जंग में छोड़ कर भाग गई, राजा पिरथवी राज! और खांडे राओ ने भी मजबूर हो कर राहेफारार इख़्तियार की,
खांडे राओ, लड़ाई में मारा गया या बचकर निकल गया इस के मुतअल्लिक़ मुअर्रिख़ीन में इख्तिलाफ है, राजा पिरथवी राज! भागते हुए दरिया सरसती के किनारे मुस्लमान फौज के हाथ गिरफ्तार हो गया और फिर क़त्ल कर दिया गया, सरकार ख्वाजा गरीब नवाज़ रदियल्लाहु अन्हु! ने उसे बहुत नसीहतें कीं, के यहाँ के बाशिंदों को न सताना और अदलो इंसाफ से हुकूमत करना, सुल्तान शहाबुद्दीन गौरी! ने अजमेर शरीफ में तीन दिन क़याम किया, इन तीनो दिन सरकार ख्वाजा गरीब नवाज़ रदियल्लाहु अन्हु! की इक़्तिदा में नमाज़ अदा करता रहा और आप के फीयूज़ो बरकात से मुस्तफ़ीज़ होता रहा, एक रिवायत में है के सरकार ख्वाजा गरीब नवाज़ रदियल्लाहु अन्हु! की सिफारिश पर राजा पिरथवी राज! के लड़के को अजमेर शरीफ की हुकूमत अता फ़रमाई, इस ने इस्लामी हुकूमत की इताअत का अहिद किया,
सरकार ख्वाजा गरीब नवाज़ रदियल्लाहु अन्हु से मुलाकात
अक्सर तारीखें! सुल्तान शहाबुद्दीन गौरी! और सरकार ख्वाजा गरीब नवाज़ रदियल्लाहु अन्हु! की मुलाकात के बारे में खामोश हैं और उन्होंने सुल्तान! के अजमेर शरीफ पहुंचने का ज़िक्र ही नहीं किया, बाज़ तज़किरा निगारों का बयान है के के सुल्तान शहाबुद्दीन गौरी! को अजमेर शरीफ में सरकार ख्वाजा गरीब नवाज़ रदियल्लाहु अन्हु के क़याम का इल्म नहीं था, अजमेर शरीफ पहुंच कर जब उसे वहां मुस्लमान दुरवेशों की मौजूदगी का इल्म हुआ तो फ़ौरन उन से मुलाकात की और ये देख कर हैरान रह गया के सरकार ख्वाजा गरीब नवाज़ रदियल्लाहु अन्हु! वही बुज़रुग हैं जिन्होंने ख्वाब में हिंदुस्तान के फ़तेह की बशारत दी थी, बाज़ कहते हैं के, सुल्तान शहाबुद्दीन गौरी! सरकार ख्वाजा गरीब नवाज़ रदियल्लाहु अन्हु! के क़याम से अजमेर शरीफ से नुजूमी आगाह था और वो सिर्फ हज़रत की कदम बोसी के लिए अजमेर शरीफ गया था, इस तरह सरकार ख्वाजा गरीब नवाज़ रदियल्लाहु अन्हु! की पेशन गोई पूरी हुई के “पिथोरा रा ज़िंदा गिऱफ्तेंम व दा दैम”
हिंदुस्तान में इस्लामी हुकूमत
अजमेर शरीफ से हो कर सुल्तान शहाबुद्दीन गौरी! रहमतुल्लाह अलैह शहर गज़नी! वापस चला गया, और हिंदुस्तान में कुतबुद्दीन ऐबक! को अपना नाइब मुकर्रर कर दिया, कुतबुद्दीन ऐबक! निहायत बहादुर बुलंद हिम्मत शख्स था, और सुल्तान शहाबुद्दीन गौरी! रहमतुल्लाह अलैह की खिदमत में रहकर उस की फ़ितरी सलाहियतों के जोहर चमक उठे, सुल्तान शहाबुद्दीन गौरी! के जाने के बाद इस ने इस्लामी फुतूहात का सिलसिला जारी रखा, और थोड़े ही अरसे में गुजरात, गोवलियार, बियाना, वगेरा के इलाके फ़तेह कर लिए, इसी तरह बख्तियार खिलजी, ने बिहार, बंगगाल, और आसाम के सूबा फ़तेह कर के वहां मुसलमानो का इक्तिदार काइम कर दिया, दो साल बाद कन्नौज के राजा जय चंद, ने और कई हिन्दू राजाओं को साथ मिलकर मुसलमानो के खिलाफ लड़ाई पर कमर बाँधी, कुतबुद्दीन ऐबक! ने सुल्तान शहाबुद्दीन गौरी! को जय चंद, की सरकशी की इत्तिला दी, वो बर्क रफ़्तार से हिंदुस्तान पंहुचा और एक ही हमले में जयचंद और उस के हलीफ़ों की कुव्वत को पाश पाश कर डाला और जयचंद लड़ाई में मारा गया, अब हिंदुस्तान में इस्लामी इक्तिदार हुकूमत की जड़ें निहायत मज़बूत हो गईं और सुल्तान शहाबुद्दीन गौरी! इत्मीनान से अफगानिस्तान के शहर गज़नी वापस चला गया,
दिल्ली को राजधानी बनाया
सुल्तान शहाबुद्दीन गौरी! के नाइब कुतबुद्दीन ऐबक! ने पहले कुहराम, और फिर दिल्ली को अपना दारुल हुकूमत राजधानी बनाया, और निहायत काबीलियत से कारोबार हुकूमत चलाया, बाज़ मुअर्रिख़ीन के बयान के मुताबिक सुल्तान शहाबुद्दीन गौरी! ने अजमेर शरीफ की हुकूमत राजा पिरथवी राज! के बेटे को सौंप दी थी, सुल्तान शहाबुद्दीन गौरी! के जाने के बाद उस के चचा ने जो तराइन या तरावड़ी की शाकिस्त के बाद रूपोश हो गया था, अजमेर शरीफ पर हमला कर के अपने भतीजे को निकाल दिया और अजमेर शरीफ पर कब्ज़ा कर लिया, कुतबुद्दीन ऐबक! को इत्तिला मिली तो उस ने फ़ौरन अजमेर शरीफ का रुख किया और एक मुख़्तसर सी लड़ाई के बाद उसे फिर फ़तेह कर लिया, अब उस ने हज़रत मीर खुंग सवार को अजमेर शरीफ का हाकिम मुकर्रर किया, हज़रत मीर खुंग सवार रहमतुल्लाह अलैह, नाइबुन नबी फिल हिन्द, अताये रसूल, सुल्तानुल हिन्द, ख्वाजाए ख्वाजगान, हज़रत ख्वाजा गरीब नवाज़ मुईनुद्दीन चिश्ती रहमतुल्लाह अलैह के मुरीदी में शामिल हो गए, और तबलीगो इशाअत दीने इस्लाम के सिलसिले में अताये रसूल, सुल्तानुल हिन्द, ख्वाजाए ख्वाजगान, हज़रत ख्वाजा गरीब नवाज़ मुईनुद्दीन चिश्ती रहमतुल्लाह अलैह की बहुत मदद की, 602/ हिजरी में कुतबुद्दीन ऐबक! की वफ़ात की बे बुनियाद अफवाह उड़ा दी अजमेर शरीफ और गिरदो नवाह के बहुत से हिन्दूओं ने मुत्तहिद हो कर हज़रत हज़रत मीर खुंग सवार पर हमला कर दिया,
उस वक़्त मुस्लमान फौज अजमेर शरीफ से बहार थी और, हज़रत हज़रत मीर खुंग सवार, के साथ गिनती के चंद आदमी थे, उन्होंने निहायत साबित कदमी से हिंदूंओ का मुकाबला किया और लड़ते लड़ते शहीद हो गए, ये वाक़िआत रात के वक़्त पेश आया, सुबह को ये खबर फैली तो नाइबुन नबी फिल हिन्द, अताये रसूल, सुल्तानुल हिन्द, ख्वाजाए ख्वाजगान, हज़रत ख्वाजा गरीब नवाज़ मुईनुद्दीन चिश्ती रहमतुल्लाह अलैह बा नफ़्से नफीस तशरीफ़ लाए और शुहदा की नमाज़े जनाज़ा पढाई, हज़रत हज़रत मीर खुंग सवार का मज़ार अजमेर शरीफ में तारा गढ़ की पहाड़ी पर है, उसी साल पंजाब में खोखरों ने बगावत शोरिश बरपा की सुल्तान शहाबुद्दीन गौरी! ने हिंदुस्तान आ कर इन्हें शिकस्ते फाश दी, ये बगावत कुचल कर सुल्तान शहाबुद्दीन गौरी! वापस गज़नी जा रहा था के दरियाए झेलम के किनारे धमीक के मकाम पर किसी खोखर ने (और बाज़ रिवायात के मुताबिक एक इस्माइली फिदाई ने) रात के वक़्त सुल्तान शहाबुद्दीन गौरी! के खेमे में घुस कर इस्लाम के इस मुजाहिदे आज़म को शहीद कर डाला।
अख़लाक़ो आदात
हुज़ूर नबी करीम सलल्लाहु अलैही वसल्लम से इश्क
सरकार ख्वाजा गरीब नवाज़ रदियल्लाहु अन्हु! को हुज़ूर नबी करीम सलल्लाहु अलैही वसल्लम की ज़ाते गिरामी से मुहब्बत और इश्क था आप रदियल्लाहु अन्हु! अक्सर वाइज़ो नसीहत की महफ़िलो में हुज़ूर नबी करीम सलल्लाहु अलैही वसल्लम की बातें सुनाते और जब हुज़ूर नबी करीम सलल्लाहु अलैही वसल्लम का नाम आता तो आप रदियल्लाहु अन्हु! पर अजीब कैफियत तारी हो जाती, आप रदियल्लाहु अन्हु! की आँखें नम हो जातीं, बाज़ औकात आप हुज़ूर नबी करीम सलल्लाहु अलैही वसल्लम की मुहब्बत में गिरयाओ ज़ारी करते, अक्सर हदीसे नबवी बयान फरमाकर रोने लगते थे, मोईनुल हिन्द! में लिखा है के आप रदियल्लाहु अन्हु! हुज़ूर नबी करीम सलल्लाहु अलैही वसल्लम के नक़्शे कदम पर चलते थे और सुन्नत के बेहद पाबंद थे यानि आप शरीअत पर सख्ती से अमल करते थे,
हिल्म नर्म दिली व अफू
सरकार ख्वाजा गरीब नवाज़ रदियल्लाहु अन्हु! बड़े ही हलीमुत तबआ थे, आप रदियल्लाहु अन्हु! की तबीयत में बड़ी नरमी थी दूसरों से तकालीफ़ मिलने के बावजूद उन से अच्छा सुलूक करते थे, अजमेर शरीफ में आप रदियल्लाहु अन्हु! को बे पनाह तकालीफ़ दी गईं रात दिन हुक्काम के कारिंदों ने परेशानियों में मुब्तला क्या ज़िन्दगी भर कदम कदम पर दुःख उठाने पड़े अजमेर शरीफ में आप रदियल्लाहु अन्हु! के दुश्मनो ने आप के लिए बुरे अल्फ़ाज़ इस्तेमाल किए लेकिन इन तमाम तकालीफ़ पर ज़रा भी गुस्सा नहीं आया आप बड़ी दिल जमई के साथ तबलीग़े इस्लाम में मसरूफ रहे, आप की तबियत बड़ी ही नरम थी लोग आप के हिल्म से गरवीदा हो जाते अगर कोई शख्स सख्त बात कह देता तो आप उसे दरगुज़र फरमाते,
15/ बार हज की सआदत
बज़्मे सूफ़िया! में लिखा है के: एक बार एक बद बातिन शख्स सरकार ख्वाजा गरीब नवाज़ रदियल्लाहु अन्हु! को क़त्ल करने के इरादे से आया, आप रदियल्लाहु अन्हु! ने उस के इरादे को नूरे बातिन से पहचान लिया, लेकिन वो शख्स जब नज़दीक आया तो बहुत ही अख़लाक़ से पेश आए, और अपने पास बिठाकर फ़रमाया के जिस इरादे से आ रहे हो उसको पूरा करो, ये सुनते ही वो शख्स कांपने लगा और सर बा सुजूद होकर आजिज़ी से बोला के मुझ को लालच दे कर आप को हलाक कर ने के लिए भेजा था, ये कहकर बगल से छोरी निकाली और सामने डालदी, फिर कदम मुबारक पर गिर कर कहने लगा, के आप मुझ को इस की सज़ा दीजिये बल्के मेरा काम ही तमाम कर दीजिए, आप रदियल्लाहु अन्हु! ने फ़रमाया के हम दुरवेशों का शेवा है के हम से कोई बदी भी करता है तो हम उस के साथ नेकी से पेश आते हैं, तुमने तो मेरे साथ कोई बुराई नहीं की, उसको आप ने दुआ दी, वो शख्स बहुत मुतअस्सिर हुआ, और उसी वक़्त से खिदमत में रहने लगा, और आप रदियल्लाहु अन्हु! की दुआओं की बदौलत उस को 45/ बार हज की सआदत हासिल हुई, और उसी मुकद्द्स सर ज़मीन में पेबंदे ख़ाक भी हुआ।
मुरीदों से शफकत
सरकार ख्वाजा गरीब नवाज़ रदियल्लाहु अन्हु! अपने मुरीदों खुलफ़ा, मोतक़िदीन, मुहिब्बीन, आशिक़ीन मुतअल्लिक़ीन, चाहने वालों से बड़ी शफकत फरमाते थे, और उन्हें अपने बातनी फैज़ान से मुस्तफ़िज़ो मुस्तनीर फरमाते, आप के मुरीदों की तादाद बे इंतहा थी, आप रदियल्लाहु अन्हु! के खुलफाए किराम बड़ी कसीर तादाद में थे, मगर हर एक को यही महसूस होता था, के सरकार ख्वाजा गरीब नवाज़ रदियल्लाहु अन्हु! सब से ज़ियादा मुहब्बतों उल्फत मुझ से ही करते हैं आप रदियल्लाहु अन्हु! का हुसने सुलूक बहुत मुश्फिकाना था,मोईनुल हिन्द! में लिखा है के: आप रदियल्लाहु अन्हु! अपने मुरीदों का बहुत ख़याल रखते थे, आप अपने मुरीदों की हिमायत पर हमेशा तय्यार रहते, आप रदियल्लाहु अन्हु! फ़रमाया करते थे, के मुईनुद्दीन! उस वक़्त तक जन्नत में कदम नहीं रखेगा जब तक अपने मुरीदों और मुरीदों के मुरीदों को जो क़यामत तक सिलसिले में होंगे जन्नत में ना ले जाएगा।
हुक़ूक़े हमसाया की अदाएगी
पड़ोसियों में किसी का इन्तिकाल हो जाता तो जनाज़े के हमराह ज़रूर तशरीफ़ ले जाते, नमाज़े जनाज़ा और तद्फीन के बाद जब तमाम लोग वापस हो जाते तो तनहा उस की कब्र के पास बैठे रहते, दुआ और दुरूद वगेरा पढ़ते रहते, एक बार एक हमसाए का इन्तिकाल हुआ तो हस्बे मामूल जनाज़े के साथ गए, क़ुत्बुल अक्ताब हज़रत ख्वाजा कुतबुद्दीन बख्तियार काकी देहलवी रहमतुल्लाह अलैह भी साथ में थे, जब तमाम लोग लोट गए, तो सरकार ख्वाजा गरीब नवाज़ रदियल्लाहु अन्हु! हमसाया की कब्र पर ठहर गए, क़ुत्बुल अक्ताब हज़रत ख्वाजा कुतबुद्दीन बख्तियार काकी देहलवी रहमतुल्लाह अलैहफरमाते हैं के में ने देखा के आप के चेहराए मुबारक मुतग़य्यर हो गया, फिर उसी वक़्त असली रंग पर आ गया, और आप अल्हम्दुलिल्लाह फरमाते हुए खड़े हो गए, हज़रत ख्वाजा कुतबुद्दीन बख्तियार काकी देहलवी रहमतुल्लाह अलैह ने चेहरे के रंग के तग़य्युर की वजह पूछी तो फ़रमाया कब्र में अज़ाब के फ़रिश्ते आए थे, लेकिन फिर रहमते इलाही नाज़िल हुई, खुद भी अज़ाबे कब्र से बेहद ख़ाइफ़ रहते थे, और जब कभी कब्र का ज़िक्र आता तो गिरया तारी हो जाता था।
जूदो सखावत
सरकार ख्वाजा गरीब नवाज़ रदियल्लाहु अन्हु! की सखावत भी मश्हूरो मअरूफ़ है क्यों के आप बड़े आला दर्जे के फ़कीर थे, और फ़कीर अपने पास दुनिया का मालो मतअ नहीं रखते, बल्के अल्लाह पाक की जानिब से जो कुछ आता है उसे मखलूके खुदा ही में तकसीम कर देते हैं, सरकार ख्वाजा गरीब नवाज़ रदियल्लाहु अन्हु! ने उमर भर कोई मालो दौलत जमा नहीं की जो कुछ मौजूद होता वो अल्लाह की राह में निसार कर देते आप की हमेशा ये कोशिश रही के कभी कोई साइल खाली वापस ना जाए जब भी कोई साइल आता तो उसे कुछ न कुछ ज़रूर दे देते खुदा न ख्वास्ता कुछ मौजूद न होता तो उससे कह देते के इन्तिज़ार करो फिर जब अल्लाह पाक की तरफ से कुछ मुयस्सर आता तो निहायत एहतिराम से साइल को दे देते, अल्लाह पाक ने आप के दिल को बड़ा ही शाहाना बनाया था हिन्दुओं की कसीर तादाद आप के जूदो सखा से भी मुतअस्सिर हो कर मुस्लमान हुए।
गरीब नवाज़ की गरीबनवाज़ी
सरकार ख्वाजा गरीब नवाज़ रदियल्लाहु अन्हु! की गरीबनवाज़ी मश्हूरे ज़माना है आप गरीबों और मिस्कीनों के साथ बड़ी शफकत से पेश आते थे आप के चाहिने वालों में अगरचे अमीरो गरीब यानि हर तरह के लोग थे, मगर गरीबों और मिस्कीनों की तादाद बहुत ज़ियादा थी, सरकार ख्वाजा गरीब नवाज़ रदियल्लाहु अन्हु! का ये आलम था के आप अपनी ज़रूरियात को पसे पुश्त रखते हुए भी गरीबों की इमदाद करते मुरीदों और अकीदतमंदों से हमेशा शफकत फरमाते, सरकार ख्वाजा गरीब नवाज़ रदियल्लाहु अन्हु! की गरीबनवाज़ी ही का असर था के हिन्दू समाज में जकड़े हुए गरीबों ने इस्लाम की दावत को कबूल किया हर आने वाले शख्स को आप से ऐसी हमदर्दी और शफकत मुयस्सर आती थी, के वो मुश्फिकाना अंदाज़ से मुतअस्सिर हो कर
दाईरए इस्लाम में दाखिल हो जाता, सरकार ख्वाजा गरीब नवाज़ रदियल्लाहु अन्हु! फाका ज़दो को खाना खिलाते अगर किसी को लिबास की ज़रुरत होती तो उसे लिबास देते ते, गर्ज़ के सरकार ख्वाजा गरीब नवाज़ रदियल्लाहु अन्हु! की गरीब नवाज़ी बड़ी मशहूर थी हत्ता के आप गरीब नवाज़ ही के लक़ब से मशहूर हुए।
सरकार ख्वाजा गरीब नवाज़ रदियल्लाहु अन्हु और नमाज़ से मुहब्बत
सरकार ख्वाजा गरीब नवाज़ रदियल्लाहु अन्हु! फरमाते हैं नमाज़ रुकने दीन है, अगर सुतून पिलर खड़ा है तो घर भी खड़ा रहेगा और जब सुतून गिर जाएगा तो घर भी सलामत नहीं रहेगा, जिस ने नमाज़ में खलल डाला उस ने अपने दीन और ईमान को खराब किया, नमाज़ की अहमियत की तलकीन करते हुए। सरकार ख्वाजा गरीब नवाज़ रदियल्लाहु अन्हु! ने फ़रमाया के: मेरा गुज़र मुल्के शाम के करीब एक शहर के बाहर एक गार था जिस में एक बुज़रुग सुकूनत पज़ीर थे ख़ौफ़े खुदा और हैबते इलाही से उन के बदन का गोश्त पोश्त पिघल गया था पूरे जिस्म पर सिर्फ हड्डिया ही रह गईं थीं, एक सज्जादा पर मुतमक़्क़िन यानि तशरीफ़ फरमा थे, में अदब से करीब जाकर बैठ गया, बुज़रुग ने दरयाफ्त फ़रमाया कहा से आए हो?
में ने जवाब दिया बाग्दाद् से आया हूँ, फ़रमाया खूब आए लेकिन मुनासिब ये है के दुरवेशों की खिदमत करते रहो ताके तुम ज़ोके दुरवेशी हासिल हो, मुझे इस गार में रहते हुए कई साल गुज़र गए पूरी दुनिया से अलैहदीगी इख्तियार कर के इस गार में छुपा हुआ बैठा हूँ, एक बात से ऐसा डरता हूँ के रात दिन रोते हुए गुज़र जाते हैं, में ने पूछा के “हज़रत वो कोन सी बात है” फ़रमाया नमाज़! है जिस वक़्त अदा करता हूँ खौफ मालूम होता है के कहीं कोई शर्त फरगुज़ाश्त न हुई, और मेरी सारी मेहनत इकारत हो कर यही नमाज़ मूजिब बे इताबे खुदा वन्दी न हो जाए, जिस तरह हदीसे पाक में नमाज़ को मोमिनो को मेराज बताया गया है, इसी की रौशनी में सरकार ख्वाजा गरीब नवाज़ रदियल्लाहु अन्हु! ने फ़रमाया है के: जब वो मोमिन नमाज़ पढ़े तो इस तरह के गोया अनवारो तजल्लियात का मुशाहिदा कर रहा है,
सरकार ख्वाजा गरीब नवाज़ रदियल्लाहु अन्हु! के नज़दीक नमाज़ के साथ साथ रोज़े और हज की भी बड़ी अहमियत थी, आप खुद साईमुद दहर (हमेशा रोज़ा दार) रहे, और आप ने काबा शरीफ की ज़ियारत भी बा कसरत की, “फ़वाईदुस सालिकीन” में है के अजमेर शरीफ से हर साल हज के लिए तशरीफ़ ले जाते थे, मुमकिन है ये ख़याल हो के हर साल अजमेर शरीफ से हज के लिए जाना और वापस आना उस ज़माने में इतना आसान नहीं था बक्ले दूसरे लफ़्ज़ों में यही मुमकिन था तो उससे ये मुराद है के उन्होंने खानए काबा की ज़ियारत इतनी बार फ़रमाई के इस का शुमार नहीं किया जा सकता।
मजलिसे सिमआ कव्वाली
सिमआ कव्वाली का मसला मिल्लते इस्लामिया में हमेशा से मुख्तलिफ फ़ीह रहा है, मुसलमानो के बाज़ तबके उल्माए किराम, मुफ्तियाए इज़ाम, सूफ़ियाए किराम, हर किस्म के सिमआ (कव्वाली) को हराम करार देते हैं, और कुछ तबके कुछ शराइत के साथ सिमआ (कव्वाली) को जाइज़ बताते हैं, बुज़ुर्गाने चिश्त के अशग़ाल में सिमआ (कव्वाली) को हमेशा ख़ास अहमियत हासिल रही है, लेकिन उन बुज़ुर्गों ने सिमआ (कव्वाली) के जो उसूल आदाब मुकर्रर किए हैं, उन उसूल आदाब को बरकरार रख कर सिमआ (कव्वाली) सुनना आसान काम नहीं है, मौजूदा दौर में आजकल सिमआ (कव्वाली) की मजलिसें महफिले बहुत मुनअकिद होती हैं, और आम तौर पर लोग सिमआ (कव्वाली) को मनोरंजन खेल तमाशा तफरीह का ज़रिया बना लिया है, क्यों के आजकल जो कव्वाली सिमआ (कव्वाली) होती है उस में मरदो औरत का खलत मलत मेलमिलाप मर्द दुनियावी शेरो शायरी करता है, जो बिलकुल हराम है, यहाँ ये बात भी अच्छी तरह समझलें के जो बुज़ुर्गाने चिश्त माजिलसे सिमआ (कव्वाली) सुनते थे उन्होंने कभी अपने मुरीदों अकीदतमंदों के लिए सिमआ (कव्वाली) सुनना ज़रूरी करार नहीं दिया, बल्के सिमआ (कव्वाली) के लिए ऐसी शदीद कड़ी शराइत कियूद आइद की हैं, के एक आम आदमी के लिए सिमआ (कव्वाली) का सुनना मुमकिन नहीं,
हज़रत ख्वाजा नसीरुद्दीन चिराग देहलवी और सिमआ (कव्वाली)
सिमआ (कव्वाली) से मुतअल्लिक़ हज़रत ख्वाजा नसीरुद्दीन महमूद रोशन चिराग देहलवी रहमतुल्लाह अलैह के नज़रिया ज़िक्र करना दिलचस्पी से खाली न होगा, आप सुल्तानुल मशाइख सरकार महबूबे इलाही निज़ामुद्दीन औलिया देहलवी रहमतुल्लाह अलैह के ख़लीफ़ए आज़म थे, और सुल्तानुल मशाइख सरकार महबूबे इलाही निज़ामुद्दीन औलिया देहलवी रहमतुल्लाह अलैह के ज़ोके सिमआ (कव्वाली) से तमाम तज़किरे भरे पड़े हैं, लेकिन हज़रत ख्वाजा नसीरुद्दीन महमूद रोशन चिराग देहलवी रहमतुल्लाह अलैह दिल्ली के हर किस्म के सिमआ (कव्वाली) से इज्तिनाब परहेज़ करते थे,
बयान किया जाता है के एक दिन हज़रत ख्वाजा नसीरुद्दीन महमूद रोशन चिराग देहलवी रहमतुल्लाह अलैह के एक पीर भाई के यहाँ सिमआ (कव्वाली) की मजलिस मुनअकिद हुई आप रहमतुल्लाह अलैह भी वहां मौजूद थे, जब ढोल बाजे के साथ सिमआ (कव्वाली) की महफ़िल शुरू हुई तो आप रहमतुल्लाह अलैह वहां से उठ कर चल दिए लोगों ने रोका तो आप रहमतुल्लाह अलैह ने फ़रमाया के “ये बात ख़िलाफ़े सुन्नत है” लोगों ने कहा क्या आप ने अपने बुज़ुर्गों का मसलक तर्क (छोड़ना) कर दिया है और सिमआ (कव्वाली) के मुनकिर हो गए? हज़रत ख्वाजा नसीरुद्दीन महमूद रोशन चिराग देहलवी रहमतुल्लाह अलैह ने फ़रमाया ये कोई दलील नहीं है क़ुरआनो हदीस से सनद लाओ, लोग खामोश हो गए और हज़रत ख्वाजा नसीरुद्दीन महमूद रोशन चिराग देहलवी रहमतुल्लाह अलैह अपने घर तशरीफ़ ले गए, लोगों ने आप रहमतुल्लाह अलैह, सरकार महबूबे इलाही निज़ामुद्दीन औलिया देहलवी रहमतुल्लाह अलैह से इस वाकिए का ज़िक्र किया तो वो मुस्कुरा दिए और सिर्फ इतना फ़रमाया “शैख़ नसीरुद्दीन का तक़वा बहुत ऊंचा है,
किताब “खेरुल मजालिस” में लिखा है के: हज़रत ख्वाजा नसीरुद्दीन महमूद रोशन चिराग देहलवी रहमतुल्लाह अलैह से अर्ज़ किया हज़रत! के सिमआ (कव्वाली) की मजलिस में मज़ामीर ढोल बाजे! और सूफ़ियाए किराम रक्स करें, ये कहाँ तक जाइज़ है तो आप रहमतुल्लाह अलैह से इरशाद फ़रमाया के मज़ामीर बा इज्मआ मुबाह नहीं है, अगर एक शख्स तरीकत से गिर जाए तो शरीअत पर तो रहेगा और अगर शरीअत से गिर जाए तो कहाँ जाएगा, अव्वल तो ये है के सिमआ (कव्वाली) में इख्तिलाफ है उलमा के नज़दीक चंद शर्तों के साथ इस के अहिल के लिए मुबाह है लेकिन मज़ामीर ढोल बाजे! तो बा इज्मा हराम है, यानि मज़ामीर ढोल बाजे! किसी के नज़दीक भी सुन्ना जाइज़ नहीं है,
सिमआ (कव्वाली) के शराइत
जो मशाइख़ीने इज़ाम सिमआ (कव्वाली) को जाइज़ बताते हैं उन्होंने इस के उसूलो आदाब शराइत मुकर्रर किए हैं, जो भी इन शराइत की पाबंदी नहीं करेगा वो सिमआ (कव्वाली) का हरगिज़ अहिल नहीं है, मश्हूरो मअरूफ़ किताब “फवाईदुल फवाइद” में सुल्तानुल मशाइख सरकार महबूबे इलाही निज़ामुद्दीन औलिया देहलवी रहमतुल्लाह अलैह से मन्क़ूल है के सिमआ (कव्वाली) के लिए मुन्दर्जा ज़ैल शर्तें लाज़मी हैं,
(1) महफिले सिमआ (कव्वाली) में औरतें न हों,
(2) सुनाने वाला कव्वाल अमरद यानि बगैर दाढ़ी मूंछ का लड़का न हो,
(3) मज़ामीर ढोल बाजे वगेरा न हो,
(4) जो भी सुनाया जाए पढ़ा जाए अल्लाह पाक की रज़ा के लिए ही सुनाए,
(5) जो कुछ सुनाए वो फाहिश और फ़ुज़ूल बातों से पाक हो,
मशहूर चिश्ती सिलसिले के बुज़रुग मुजद्दिदे वक़्त हज़रत अल्लामा शैख़ कलीमुल्लाह शाहजहां बादि चिश्ती देहलवी रहमतुल्लाह अलैह ने अपनी किताब में सिमआ (कव्वाली) के बारे काफी मुफ़स्सल बहस की है, और आप रहमतुल्लाह अलैह ने बुजुर्गाने दीन सल्फ़ सालिहीन के हवाले से सिमआ (कव्वाली) के उसूलो आदाब शराइत तहरीर किए हैं उन में से कुछ ये हैं:
(1) महफिले सिमआ (कव्वाली) में जो लोग शरीक हों वो बा वुज़ू हों, और जबतक मजलिस में रहें बा वुज़ू ही रहें,
(2) महफिले सिमआ (कव्वाली) आम रास्ते पर ना हो और ना ऐसी जगह पर हो जिस की ज़ाहिरी सूरत से कराहत महसूस हो और उस जगा कोई ऐसी चीज़ भी न हो जिस तरफ क्लब मुतवज्जेह हो जाए,
(3) महफिले सिमआ (कव्वाली) का इन ईकाद ऐसे वक़्त में होना चाहिए के ना वो नमाज़ का वक़्त हो ना खाने का और ना कोई काम वगेरा का,
(4) महफिले सिमआ (कव्वाली) के मुनकिर को महफिले सिमआ (कव्वाली) में शरीक नहीं होना चाहिए,
(5) महफिले सिमआ (कव्वाली) के आगाज़ से पहले एक दफा सूरह फातिहा और तीन बार सूरह इखलास पढ़ें और हुज़ूर नबी करीम सलल्लाहु अलैही वसल्लम पर कसरत के साथ दुरूद भेजें,
(6) महफिले सिमआ (कव्वाली) में आलती पालती मारकर बैठना या लेटना जाइज़ नहीं बल्के दो ज़ानों बैठे,
(7) महफिले सिमआ (कव्वाली) के वक़्त बात चीत और हंसी मज़ाक से एहतिराज़ लाज़िम है, इसी तरह खाँसना थूकना, जमाई लेना, और इधर उधर देखने से इज्तिनाब करना चाहिए,
(8) कव्वाल लालची हरीस न हो बा वुज़ू रहे और जो कुछ उन को दिया जाए उसे एहसान समझें,
(9) महफिले सिमआ (कव्वाली) के वक़्त सर झुकाए रहे और जो कुछ कव्वाल कहें पढ़ें उस को सुनकर क्लब में मशगूल रहे,
(10) जब अपने दिल में महफिले सिमआ (कव्वाली) की अदम हुज़ूरी पाएं यानि अपने दिल को महफिले सिमआ (कव्वाली) की तरफ मुतवज्जेह न पाएं तो फ़ौरन महफिले सिमआ (कव्वाली) से बहार आ जाएं ऐसी हालत में राग मुसीकी सुन्ना महिज़ नजाइज़ो हराम है,
(11) जब महफिले सिमआ (कव्वाली) के बरख्वास्त हो तो फिर सब हाज़रीन सूरह फातिहा और सूरह इखलास तीन बार पढ़कर, बा कसरत दुरुद शरीफ पढ़ें और इस का सवाब हुज़ूर नबी करीम सलल्लाहु अलैही वसल्लम सहाबाए किरा, ताबईन, तबे ताबईन, सालेहीन, और तमाम सलासिल के औलियाए किराम की बारगाहों में सवाब पेश करे, जो शख्स इन आदाब को तर्क (छोड़ना) कर के महफिले सिमआ (कव्वाली) में शरीक होगा उस को नफ़ा के बजाए नुकसान होगा।
सरकार ख्वाजा गरीब नवाज़ रदियल्लाहु अन्हु! फ़क्ऱो गिना, तजरीदो तफ़रीद ज़ुहदो वरअ, में यकताए रोज़गार थे, सरकार ख्वाजा गरीब नवाज़ रदियल्लाहु अन्हु! ने अपनी तमाम उमर इबादात व मुजाहिदात में गुज़ारी, सत्तर बरस तक शब् में आराम नहीं किया, और पहलूए मुबारक ज़मीन से नहीं लगाया, इस दरमियान में सिवाए क़ज़ाए हाजात के बराबर बा वुज़ू रहे, आप रदियल्लाहु अन्हु ईशा के वुज़ू से सुबह की नमाज़ अदा करते थे, सफ़रों हज़र में आप रदियल्लाहु अन्हु दो कुरआन शरीफ रोज़ाना ख़त्म करते थे, एक दिन में और एक रात में पढ़ लेते थे, जो इरफ़ान में कामिल होता है वो इबादत में भी कामिल होता है, आप! इबादतों रियाज़त में कामिलो अकमल थे।
रेफरेन्स हवाला
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