विलादत मुबारक
आप रहमतुल्लाह अलैह की तारीखे पैदाइश मालूम ना हो सकी।
इस्मे गिरामी
आप रहमतुल्लाह अलैह! का नाम मुबारक “ख्वाजा फ़ुज़ैल अबू अली” और कुन्नियत “अबुल फैज़” है, और बाज़ हज़रात फरमाते हैं के आप का नाम, ख्वाजा फ़ुज़ैल बिन अयाज़” और कुन्नियत “अबुल फैज़” है, और आप रहमतुल्लाह अलैह! के वालिद माजिद का नाम “अयाज़” था।
विलादत बसआदत
अल्लामा, फ़ह्हामा, मुक़्तदाए शरीअतो तरीकत, सिराजुल औलिया, वारिसुल अम्बिया, इमामे रब्बानी, आलिमे समदानी, अज़ीम मुहद्दिस, जलीलुल कद्र आबिदो ज़ाहिद, हज़रत ख्वाजा फ़ुज़ैल बिन अयाज़ रहमतुल्लाह अलैह मुल्के उज़्बेकिस्तान के मशहूर शहर “समरक़ंद” में पैदा हुए, और मुल्के ईरान के शहर “अब्यूवर्द” में नशो नुमा यानि परवरिश हुई, इबने साअद के मुताबिक आप रहमतुल्लाह अलैह मुल्के ईरान के शहर “खुरासान” में पैदा हुए, और तालीमों तरबियत इराक के शहर “कूफ़ा” में हुई, आरिफ़े बिल्लाह अल्लामा नूरुद्दीन उर्फ़ अब्दुर रहमान जामी रहमतुल्लाह अलैह ने आप की विलादत और वतन के तअल्लुक से मुतअद्दिद अक़वाल नकल किए हैं: बाज़ तज़किरा निगारों ने आप रहमतुल्लाह अलैह! को खुरासानी! कहा है, और बाज़ ने समरक़ंद! कहा है, और बाज़ हज़रात ने शहर बुखारा! में आप की विलादत बताते है।
आप के इब्तिदाई अय्याम
खुदा जाने इस में क्या मस्लिहत थी के हज़रत ख्वाजा फ़ुज़ैल बिन अयाज़ रहमतुल्लाह अलैह कई साल तक शहर खुरासान के सहराओं जंगलों में रहज़नी लूटमार करते रहे कज़्ज़ाकों लुटेरों का एक गिरोह आप रहमतुल्लाह अलैह! की क़ियादत देखरेख में सहराओं जंगलों से गुज़र ने वाले काफिलों को बेदरेग़ लूट लेते, आप रहमतुल्लाह अलैह! के नाम से बड़े बड़े बहादुर कांपते थे, जिस रास्ते पर आप होते थे किस को उधर से जाने की हिम्मत नहीं होती थी,
कज़्ज़ाकि रहज़नी चोरी करने के बावजूद हज़रत ख्वाजा फ़ुज़ैल बिन अयाज़ रहमतुल्लाह अलैह का ज़ाती किरदार ये था के वो दिन में रोज़ा रखते, नमाज़े पाजंगाना के ब कसरत नवाफिल भी अदा करते, इन के मातहत डाकूओं में अगर कोई बे नमाज़ी होता तो उसे अपनी जमात टीम से ख़ारिज कर देते,
एक मर्तबा आप रहमतुल्लाह अलैह! के गिरोह ने किसी काफ्ले को लूटा, और बैठ कर खाना खाने लगे, किसी शख्स ने उन से दरयाफ्त किया, क्या तुम्हारा कोई सरदार नहीं है? उन्होंने जवाब दिया, है, लेकिन वो इस वक़्त दरिया के किनारे नमाज़ में मसरूफ हैं, उस शख्स ने कहा ये वक़्त तो किसी नमाज़ का नहीं है, रहज़नो ने बताया, वो नवाफिल अदा कर रहे हैं, फिर उसने पूछा, क्या वो तुम्हारे साथ खाना नहीं खाते? उनहोने जवाब दिया, वो दिन रोज़ा रखते हैं उसने कहा ये रमज़ान मुबारक का महीना तो नहीं है, डाकुओने कहा, वो निफलि रोज़े रखते हैं, हज़रत ख्वाजा फ़ुज़ैल बिन अयाज़ रहमतुल्लाह अलैह के हालात सुनकर उसे काफी हैरत हुई, उसने आप के पास जा कर पूछा, सलातो सोम, के साथ रहज़नी का क्या तअल्लुक़है? आप ने दरयाफ्त किया, क्या तुमने कुरान शरीफ पढ़ा है? उस ने कहा जी हाँ पढ़ा है, तो हज़रत ख्वाजा फ़ुज़ैल बिन अयाज़ रहमतुल्लाह अलैह! ने कुरआन शरीफ की ये आयात तिलावत की जिस का तर्जुमा ये है: यानि दूसरों ने अपने गुनाहों का ऐतिराफ़ करते हुए अमल सालेह को इस के साथ खलत मलत कर दिया, वो शख्स आप की ज़बान से कुरानी आयात सुन कर मज़ीद हैरत में डूब गया
कज़्ज़ाकि व गारत गिरी का बे रहिमाना पेशा इख्तियार करने के बावजूद आप रहमतुल्लाह अलैह! के अंदर रहम दिली, मुरव्वतो मुहब्बत और कमज़ोरों का पासो लिहाज़ बाकी था, चुनांचे जिस काफ्ले में कोई औरत होती या जिन मुसाफिरों के पास माल कम होता उस को हाथ ना लगाते, और जिसे लूटते उस के पास कुछ न कुछ माल ज़ादे राह ज़रूर छोड़ते, ये अजीब बात है जिस दौलत को चुराने के लिए सहराओं जंगलों की ख़ाक छानते रहते थे, अगर किसी ने अपना माल आप के पास अमानत के तौर पर रख दिया, तो उसे हाथ भी नहीं लगाया।
रहज़नी से तौबा
एक बड़ा सौदा गर मुल्के तुर्किस्तान के शहर “मरू” से शहर मावर्ड! जा रहा था, जब उस ने शहर “मरू” से रखते सफर बांधा तो लोगों ने कहा के माले कसीर की हिफाज़त के लिए नोजवानो का एक दस्ता अपने साथ ले लो, क्यों के इस इलाके का नामवर कज़्ज़ाक़ फ़ुज़ैल! रहता है, जिस की लूटमार से कोई काफिला नहीं बचता, इस ने कहा मुझे किसी मुहाफ़िज़ दस्ते की हाजत नहीं, बल्कि शहर से एक खुश इल्हान कारी! अपने साथ ले लिया, और उनको काफिले के सब से आगे ऊँट पर बिठा दिया, और हुक्म दिया के जब काफिला जंगल में दाखिल हो तो तुम क़ुरआने हकीम की तिलावत शुरू करना, चुनांचे कारी ने ऐसा ही किया, करिश्माए कुदरत देखिए, हज़रत ख्वाजा फ़ुज़ैल बिन अयाज़ रहमतुल्लाह अलैह! अपनी कमींन गाह में बैठे, काफिले की यलगार की फ़िक्र में थे, के आप ने सूरह हदीद की ये आयते मुबारक सुनी, जिस का तर्जुमा! ये है: क्या ईमान के दावेदारों के लिए अभी वक़्त नहीं आया के उन के दिल खुदा की याद और उस के नाज़िल करदा हक की तरफ झुक जाएँ, और उन लोगों की तरह न हो जाए, जिन को उन से पहले किताब अता की गई, उन का हाल ये हो गया के जब किताब मिले कुछ मुद्दत गुज़र गई, तो उन के दिल सख्त हो गए, और आज भी उन में से पेश्तर नाफरमानी की राह पर गामज़न हैं, जान लो के अल्लाह ज़मीन को उस के मुरदा हो जाने के बाद ज़िन्दगी बख्शता है, देखो हमने अपनी तालीमात को तुम पर बिलकुल वाज़ेह कर दिया है, शायद के तुम अक्ल से काम लो,
रात का खौफनाक सन्नाटा तारी था, इस आयते करीमा का असर और कारी साहब की पुरसोज़ आवाज़ गफलतों सरमस्ति के परदे को चीरती हुई आप रहमतुल्लाह अलैह! के दिल की गहराईयों में उतर गई और इतना असर किया के आँखें अश्कबार हो गईं, और ज़बान से बे इख़्तियार निकला, ऐ मेरे परवरदिगार अब वक़्त आ गया है के में बहरे मुआसि से निकल कर तेरे दामने रहमत में पनाह लूँ, वहां से निकल कर सहरा में घूमते रहे, के इत्तिफाक से एक काफिले का गुज़र आप के पास से हुआ, काफिले वाले आपस मे गुफ्तुगू कर रहे थे, के फ़ुज़ैल! डाकू इसी रास्ते पर है, हम लोगों को उससे होशियासर रहना चाहिए, कहीं हमे लूटना ले, इन की इस गुफ्तुगू ने आप रहमतुल्लाह अलैह! के दिलो दिमाग को झंझोड़ डाला, सोचने लगे, मेरी राते गुनाहों में गुज़रती हैं, मुस्लमान मुझ से ख़ौफ़ज़दा और नालां हैं, मेरे खौफ से सफर नहीं कर पाते, मुझे इन मशागिल से बाज़ आना चाहिए, और आप रहमतुल्लाह अलैह! सच्ची तौबा की, ऐ मेरे परवरदिगार में तेरी तरफ पलटा हूँ और मेरी तौबा कबूल फरमा।
तालीमों तरबियत
तौबा कर ने बाद हज़रत ख्वाजा फ़ुज़ैल बिन अयाज़ रहमतुल्लाह अलैह! ने उलूमे ज़ाहिरी व बातनी की तहसीलों तकमील का इरादा किया, अपनी अहलिया मुहतरमा से कहा में ऐसे सफर पर जा रहा हूँ जिस में मुश्किलात व मसाइब से दोचार होना पड़ेगा, इस लिए तुम्हे आज़ाद करना चाहता हूँ, ताके तुम जिस तरह चाहो ज़नदगी बसर करो, नेक बख्त अहलिया ने कहा में पूरी ज़िन्दगी के लिए आप के दमन से वाबस्ता हुई हूँ, ज़िन्दगी की धुप छाऊँ में आप ही के साथ रहूंगी, चुनांचे आप ने अहलो अयाल को साथ लिया और मरकज़े इल्मों फन शहर कूफ़ा! पहुंचे, जहाँ आप ने इमामुल आइम्मा सिराजुल उम्माह काशिफ़ुल गुम्मा हज़रते सय्यदना इमामे आज़म अबू हनीफा रदियल्लाहु अन्हु और उस वक़्त के दीगर उल्माए किराम व फुज़्ला मुहद्दिसीन मशाईखिने इज़ाम से क़साबे फैज़ किया, और उलूमो फुनून में महराते ताम्मा हासिल की, हज़रत ख्वाजा फ़ुज़ैल बिन अयाज़ रहमतुल्लाह अलैह! के मुमताज़ शीयूख ये हैं: इमामुल आइम्मा सिराजुल उम्माह काशिफ़ुल गुम्मा हज़रते सय्यदना इमामे आज़म अबू हनीफा रदियल्लाहु अन्हु, हज़रत मुहम्मद बिन अबी लैला, हज़रत इमाम आमश, हज़रत सलमान तिमि, हज़रत मंसूर मुअतमर, याहया बिन सईद अंसारी, मुहम्मद बिन इसहाक, इस्माईल बिन खालिद, हज़रत सुफियान सौरी, हज़रत अता बिन साइब रिदवानुल्लाही तआला अलैहिम अजमईन।
बैअतो खिलाफत
अरसए दराज़ तक क़ुरआनो हदीस, इल्मे तफ़्सीर, व इल्मे फ़िक़्ह की तालीम हासिल करने के बाद मुर्शिदे कामिल की जुस्तुजू हुई, और हज़रते शैख़ हसन बसरी रहमतुल्लाह अलैह! से फ़ैज़याब होने के लिए बसरा का रुख किया, दौरान सफर पता चला के हज़रत विसाल फरमा चुके हैं, सख्त ग़मगीन हुए, किसी ने कहा: हज़रते शैख़ हसन बसरी रहमतुल्लाह अलैह! के खलीफाओं जानशीन हज़रत शैख़ अब्दुल वाहिद बिन ज़ैद रहमतुल्लाह अलैह! मौजूद हैं उन से रुजू करो, चुनांचे आप मक्का मुकर्रमा ज़ादा हल्लाहु शरफऊं व तअज़ीमा तशरीफ़ लाए, और शैख़े तरीकत पीरे अकमल हज़रत शैख़ अब्दुल वाहिद बिन ज़ैद रहमतुल्लाह अलैह! से मुरीद हुए और खिरकाए खिलाफत हासिल किया, मुजाहिदा व रियाज़त की ज़िन्दगी बसर करने लगे, एक दिन आप के मुर्शिद! ने फ़रमाया: ऐ फ़ुज़ैल! तमाम चीज़ों से परहेज़ करो क्यों के दुरवेशीख़ामुशी, और बेखुशी का नाम है, अपने को भुला देना, और ख़ामुशी इख्तियार कर लेना ही, दुरवेशी है, इसे तुम अपना लो, और अपने पिछले गुनाहों से दूर रहो, खुदाए पाक को याद करते रहो, तुम्हारा नाम मुहिब्बाने खुदा की फहरिस्त में शामिल कर लिया गया है।
आप का इल्मी मकामो मर्तबा
हज़रत ख्वाजा फ़ुज़ैल बिन अयाज़ रहमतुल्लाह अलैह! ने इनहिमाक और लगन से इल्मे दीन हासिल किया और आप इमामत के दर्जे पर फ़ाइज़ हो गए थे, अकलीमे विलायत के बादशाह होने के साथ साथ वो मुमलिकत इल्म के भी अमीर थे, इल्मे हदीस और इल्मे फ़िक़्ह में इन से इस्तिफ़ादा करने वालों की बहुत बड़ी जमात है, हज़रत अब्दुल्लाह बिन मुबारक, हज़रत याहया बिन सईद कत्तान, हज़रत इमाम शाफ़ई, हज़रत असद बिन मूसा, हज़रत बिश्र हाफी, हज़रत याहया बिन याहया, अहमद बिन मिक़्दाम, हज़रत सुफियान बिन उईना रिदवानुल्लाही तआला अलैहिम अजमईन,
अइम्माए हदीस ने हज़रत ख्वाजा फ़ुज़ैल बिन अयाज़ रहमतुल्लाह अलैह! की रिवायतों को कबूल किया है, हज़रत ख्वाजा फ़ुज़ैल बिन अयाज़ रहमतुल्लाह अलैह! का इल्मी मकामो मर्तबा कितना बुलंद था इस का अंदाज़ा अइम्माए इल्मो फन के अक़वाल व आरा की रौशनी में लगाना आसान होगा, हज़रत इबने सईद रहमतुल्लाह अलैह लिखते हैं: के आप रहमतुल्लाह अलैह! सिका, आकिल, फ़ाज़िल, आबिद, और कसीरुल हदीस थे, हज़रत इमाम रहमतुल्लाह अलैह फरमाते हैं: के हज़रत ख्वाजा फ़ुज़ैल बिन अयाज़ रहमतुल्लाह अलैह! सिका, और मामून हैं, हज़रत इमाम नव्वी रहमतुल्लाह अलैह लिखते हैं: के इन की तौसीक पर तमाम अइम्मा का इत्तिफाक है, वो सहीहुल हदीस और सुदूक़ुल लिसान थे, इन की रिवायतें सही और सच्ची होती थीं, इन के इल्मो फ़ज़ल की तौसीक के लिए ये बात काफी है के हज़रत सुफियान सौरी रहमतुल्लाह अलैह, हज़रत याहया बिन सईद कत्तान रहमतुल्लाह अलैह, हज़रत इमाम बुखारी रहमतुल्लाह अलैह, हज़रत इमाम मुस्लिम रहमतुल्लाह अलैह, जैसे अइम्माए हदीस ने इन से रिवायते की है,
यहूदी ईमान ले आया
अय्यामे रहज़नी (लूटमार, चोरी करना) में बाग्दाद् शरीफ का एक यहूदी भी आप की कज़्ज़ाकि का निशाना बना था, तौबा के बाद जब हज़रत ख्वाजा फ़ुज़ैल बिन अयाज़ रहमतुल्लाह अलैह! ने उस का बचा हुआ माल वापस किया और उससे माफ़ी मांगी तो उस ने माफ़ करने से इंकार कर दिया, जब आप रहमतुल्लाह अलैह! ने शदीद इसरार किया तो उस ने कह में इस शर्त पर माफ़ कर सकता हूँ, के तुम सामने वाले मिटटी के टीले को साफ़ कर डालो, आप राज़ी हो गए, और सुबह से शाम तक मिटटी खोदते रहते, काफी कोशिश के बावजूद मिटटी ख़त्म ही न होती, खुदा की शान देखिये, एक दिन सख्त आंधी आई, और पूरे टीले को उड़ा ले गई, इस मंज़र से यहूदी मुतअस्सिर हुआ, और आप की अदावत दिल से निकाल दी, मगर एक आज़माइश और करनी चाही, कहा में ने कसम खाई है के जब तक तुम मेरा सारा माल वापस न करोगे तुम को माफ़ न करूंगा, आप सिर्फ इतना करें, के मेरे तकिये के नीचे अशर्फियों की एक थैली रखी हुई है, उसे ला कर मुझे दे दें, ताके मेरी कसम का कफ़्फ़ारा हो जाए चुनांचे आप ने वो थैली उसे दे दी, फिर उस ने कहा पहले तुम मुझे मुस्लमान कर लो, फिर में माफ़ करूंगा, आप ने कलमा शरीफ पढ़ा कर मुस्लमान कर लिया,
इस्लाम कबूल कर ने के बाद उस ने ये हकीकत ज़ाहिर की के में ने तौरैत में पढ़ा था के अगर सच्चे दिल से तौबा करने वाला मुस्लमान ख़ाक को हाथ लगा दे वो सोना बन जाए, लेकिन मुझे यकीन नहीं था, मेरी थैली में मिटटी भरी हुई थी और आप ने जब मुझ को उठा कर दी वो सोना बन गई, मुझे यकीन आ गया के आप ने सिद्क़ सच्चे दिल से तौबा की है, और ये खाक सिर्फ आप की बरकत तौबा से असली सोना बन गई, और मुझे दीने इस्लाम की सदाकत सच्चाई पर भी यकीन आ गया।
खलीफा हारुन रशीद और ख्वाजा फ़ुज़ैल बिन अयाज़
खलीफा हारुन रशीद! के वज़ीर फ़ुज़ैल बिन रबी एक मर्तबा खलीफा हारुन रशीद! के साथ मक्का मुकर्रमा ज़ादा हल्लाहु शरफऊं व तअज़ीमा गया, फ़रीज़ाए हज अदा करने के बाद खलीफा ने मुझ से पूछा के यहाँ मर्दाने खुदा यानि किसी बुज़रुग अल्लाह के वली को जानते हो, तो बताओ में उन से मुलाकात करने की सदाअत हासिल करूंगा, में ने कहा एक बुज़रुग हज़रत अब्दु रज़्ज़ाक अलैहिर रहमा हैं, खलीफा मुझे साथ ले कर उन के पास पहुंचे, थोड़ी देर गुफ्तुगू के बाद खलीफा ने मेरे ज़रिये उन से दरयाफ्त कराया आप के ज़िम्मे किसी का क़र्ज़ तो नहीं है, उन्होंने जवाब दिया जी हाँ, खलीफा ने फ़ौरन हुक्म दिया के शाही ख़ज़ाने से इन के ज़िम्मे जो कुछ क़र्ज़ है,
अदा किया जाए, फिर हम वहां से उठे और हज़रते सुफियान बिन उतबा रहमतुल्लाह अलैह! के पास पहुंचे, वहां भी थोड़ी देर गुफ्तुगू के बाद खलीफा ने सवाल किया के क़र्ज़ वगेरा तो नहीं है, तो उन्होंने बताया हाँ कुछ लोगों का क़र्ज़ है, खलीफा ने फ़ौरन इस की भी अदाएगी का हुक्म दिया, और वहां से रवाना हो गए, फिर मुझ से फ़रमाया फ़ुज़ैल मेरी तशफ्फी नहीं हुई, किसी और बुज़रुग के पास ले चलो में ने अर्ज़ किया अब हज़रत ख्वाजा फ़ुज़ैल बिन अयाज़ रहमतुल्लाह अलैह! बाकी रह गए हैं, जिन को लोग सिराजुल वासलीन! के लक़ब से मशहूर हैं, हुक्म हो तो उन की खिदमत में ले चलूँ, चुनांचे में और खलीफा हज़रत ख्वाजा फ़ुज़ैल बिन अयाज़ रहमतुल्लाह अलैह! के घर तशरीफ़ ले गए, आप रहमतुल्लाह अलैह! घर में कुरआन शरीफ की तिलावत में मशगूल थे, खिलाफ ने आप से अर्ज़ किया हज़रत में अपने नफ़्स की शफ़ाअत के लिए हाज़िर हुआ हूँ, फिर अमीर की इताअत भी ज़रूरी है, ये सुनकर आप रहमतुल्लाह अलैह! ने चिराग बुझा दिया और दरवाज़ा खोल कर एक कोने में खड़े हो गए, खलीफा अंदर जा कर आप रहमतुल्लाह अलैह! को अँधेरे में तलाश कर ने लगे, इत्तिफाक से खलीफा! का हाथ हज़रत ख्वाजा! के जिस्म से छूआ गया, आप रहमतुल्लाह अलैह! ने बड़ी बड़ी ग़मनाक आवाज़ में आह कर कर के कहा कैसा नर्म हाथ है, काश के दोज़ख की आग से बच जाए, खलीफा! रोने लगे, और फ़रमाया, हज़रत मुझे कुछ नसीहत कीजिये, आप रहमतुल्लाह अलैह! ने फ़रमाया: ऐ खलीफा आप के वालिद बुज़रुग ने जो हुज़ूर नबी करीम सलल्लाहु अलैही वसल्लम के चचा थे, एक मर्तबा हुज़ूर नबी करीम सलल्लाहु अलैही वसल्लम से किसी सूबे की गवर्नरी मांगी थी, तो आप को मालूम है उनोहोने जवाब दिया था, आप ने फ़रमाया था के चचा जान! आप की एक लम्हे की बंदगी, हज़ार साला इमारते ख़ल्क़ से ज़ियादा बेहतर है, क्यों के अमीर को क़यामत के दिन निदामत उठानी पड़ती है,
खलीफा हारुन रशीद! ने कहा: हज़रत कुछ और बताएं, हज़रत ख्वाजा फ़ुज़ैल बिन अयाज़ रहमतुल्लाह अलैह! ने जवाब दिया, मुझे डर है के कहीं आप का ये प्यारा चेहरा दोज़ख की आग की ईंधन न बने, खुदा से डरो, और पूरी मुस्तअद्दी से उस का हुक्म मानो, फिर खलीफा हारुन रशीद! ने पूछा हज़रत किसी का आप के ज़िम्मे कुछ क़र्ज़ बाकि है जवाब दिया हां खुदा! का कर्ज़दार हूँ, उस की अदाएगी में मशगूल हूँ, अल्लाह पाक कबूल फरमाए, आखिर में खलीफा हारुन रशीद! ने एक हज़ार दीनार की थैली आप की खिदमत में बतौरे नज़राना पेशा की, हज़रत! ने फ़रमाया बड़े अफ़सोस की बात है, के मेरी नसीहतों का आप पर कुछ असर नहीं हुआ, आप की निजात की राह दिखा रहा हूँ, और आप मुझे बला में फसां रहे हैं, खलीफा हारुन रशीद! ज़ार ज़ार रोने लगे, और रोते हुए वहां से निकले बाहर आ कर मुझ से फ़रमाया के बादशाह तो दरअसल हज़रत ख्वाजा फ़ुज़ैल बिन अयाज़ रहमतुल्लाह अलैह! हैं।
यादे इलाही और कुरआन से शग़फ़
हज़रत ख्वाजा फ़ुज़ैल बिन अयाज़ रहमतुल्लाह अलैह! के खादिम इब्राहीम इबने अशअस! का बयान है के में ने आप रहमतुल्लाह अलैह! से बढ़ कर कोई ऐसा शख्स नहीं देखा जिस के दिल में खुदा का खौफ पैदा हो गया हो, आप रहमतुल्लाह अलैह! की मजलिस में जब अल्लाह पाक का ज़िक्र किया जाता, ये वो क़ुरआने पाक सुनते तो उन पर ख़ौफ़ो हुज़्न ग़ालिब आजा ता, आ आँखों से आंसूं जारी हो जाते हैं, और ज़ारो कतार रोते हैं के हाज़रीने मजलिस इन की हालत पर तर्स खाने लगते, शबो रोज़ इबादतों रियाज़त और ज़िक्रो फ़िक्र में मसरूफ रहते थे, हज़रते इमाम अहमद बिन हम्मबल रहमतुल्लाह अलैह का बयान है के: एक बार हम लोग हज़रत ख्वाजा फ़ुज़ैल बिन अयाज़ रहमतुल्लाह अलैह! के पास गए और उन से अंदर आने की इजाज़त तलब की तो इजाज़त नहीं मिली, किसी ने कहा के वो अगर कुरआन शरीफ की आवाज़ सुनलें तो निकल आएंगे, हमारे साथ एक बुलंद आदमी था, हम ने उससे कहा के क़ुरआने पाक की कोई आयात पढ़ो, उस ने बुलंद आवाज़ से सूरह तकासुर पढ़ना शुरू की आप फ़ौरन निकल आए, उस वक़्त उन का हाल ये था के दाढ़ी आंसुओं से तर थी, वो खुद कुरआन पढ़ते तो उन की आवाज़ निहायत ग़मगीन और पसन्दीदाह होती, और ठहर ठहर के पढ़ते ऐसा मालूम होता के किसी इंसान को मुखातिब कर रहे हैं।
आप के मलफ़ूज़ात मुबारक
दुनिया का तलब गार रुस्वा और ज़लील होता है, जिस तरह जन्नत में रोना अजीब सी बात है इसी तरह दुनिया में हसना भी अजीब तअज्जुब है, क्यों के ना जन्नत रोने की जगह है और ना दुनिया हसने की जगह, आजिज़ी को अल्लाह पाक पसंद करता है, जिस दिल में ख़ौफ़े खुदा होता है उससे हर चीज़ खौफ ज़ादा रहती है,
दीन की बुनियाद
एक मर्तबा लोगों ने हज़रत ख्वाजा फ़ुज़ैल बिन अयाज़ रहमतुल्लाह अलैह! से पूछा के दींन की बुनियाद किया है, आप ने जवाब दिया, अक्ल, लोगों ने पूछा अक्ल की बुनियाद किया है, फ़रमाया हिल्म, लोगों ने पूछा हिल्म की बुनियाद किस पर है, फ़रमाया: सब्र, पर है, फिर फ़रमाया तमाम बुराईयों को एक जगह जमा कर के उस की कुंजी दुनिया की दोस्ती को बनाया है, तवक्कुल के बारे में लोगों ने पूछा तो आप ने फ़रमाया के तवक्कुल! के ये माने हैं के अल्लाह पाक के सिवा किसी से उम्मीद वाबस्ता न रखें,और मुतावक्किल उस को कहते हैं, जो ज़हीरो बातिन हर हाल में राज़ी रहे।
आप के खुलफाए किराम
हज़रत ख्वाजा फ़ुज़ैल बिन अयाज़ रहमतुल्लाह अलैह! के नामवर खुलफाए किराम पांच हुए हैं, जो अपने वक़्त के साहिबे बातिन क़ुत्बे! ज़माना हैं, जिन में ये सब से ज़ियादा मशहूर हैं: हज़रत शैख़ सुल्तान इब्राहीम बिन अदहम, हज़रत शैख़ मुहम्मद शीराज़ी, हज़रत शैख़ बिश्र हाफी, हज़रत ख्वाजा अबू रजा अत्तारी, हज़रत ख्वाजा अब्दुल्लाह सय्यारी रिदवानुल्लह तआला अलैहिम अजमईन। जिन से सिलसिलए अयाज़ीया! की इशाअतो तरवीज हुई है।
वफ़ात
आप रहमतुल्लाह अलैह की वफ़ात, 3/ रबीउल अव्वल 187/ हिजरी में हुई।
मज़ार
आप रहमतुल्लाह अलैह का मज़ार मुबारक: मक्का मुकर्रमा ज़ादा हल्लाहु शरफऊं व तअज़ीमा में मरजए खलाइक है,
“अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त की उन पर बेशुमार रहमत हो और उन के सदके में हमारी मगफिरत हो”
रेफरेन्स हवाला
- मिरातुल असरार
- कशफ़ुल महजूब
- ख़ज़ीनतुल असफिया
- मशाइखे इज़ाम जिल्द अव्वल
- सीयरुल अक्ताब
- तज़किरतुल औलिया

