हज़रत ख्वाजा अबू मुहम्मद चिश्ती रहमतुल्लाह अलैह की हालाते ज़िन्दगी

हज़रत ख्वाजा अबू मुहम्मद चिश्ती रहमतुल्लाह अलैह की हालाते ज़िन्दगी

विलादत बसआदत

हज़रत ख्वाजा अबू मुहम्मद चिश्ती रहमतुल्लाह अलैह की विलादत 26/ मुहर्रमुल हराम 299/ हिजरी बरोज़ चहार शम्बा यानि बुध असर के वक़्त मुल्के अफगानिस्तान के सूबा हिरात, के मशहूर क़स्बा चिश्त में हुई।

इस्म मुबारक

मशाइखो फुकरा के क़ुतुब, अइम्मा व उलमा के मुक्तदा, परवरदए कमाले अहमदी, मादर ज़ाद वली, शैख़े अकमल, हज़रते अक़दस, सरापा फ़ैज़ो बरकत, सर चश्माए इल्मो हिकमत, इमामुल उलमा, ज़ुब्दतुल आरफीन, सुलानुल औलिया, बुरहानुल वासलीन, हज़रत ख्वाजा अबू मुहम्मद चिश्ती अलैहिर रहमा! आप का इस्मे गिरामी “अबू मुहम्मद” लक़ब नासीहुद्दीन! और वलियुद्दीन है,

वालिद माजिद

आप रहमतुल्लाह अलैह के वालिद माजिद का नाम मुबारक, हज़रत ख्वाजा शैख़ अबू अहमद अब्दाल चिश्ती रहमतुल्लाह अलैह है,।

विलादते फ़रज़न्द की बशारत

आप मादर ज़ाद वली थे, जब आप वालिदा साहिबा के शिकम में थे वो फरमाती हैं के जब हज़रत ख्वाजा अबू मुहम्मद चिश्ती रहमतुल्लाह अलैह मेरे शिकम में चार माह के थे, तो हर रात तहज्जुद के वक़्त मेरे पेट में कुछ जुम्बिश होती थी, और मेरे कान में कलमे शरीफ के ज़िक्र करने की आवाज़ सुनाई देती थी, में ने इस बात का ज़िक्र हज़रत ख्वाजा अबू मुहम्मद चिश्ती रहमतुल्लाह अलैह! से किया, के या शैख़ मुझे बताएं ये क्या मुआमला है, आप रहमतुल्लाह अलैह! ने फ़रमाया के तुझे मुबारक हो के तेरे पेट में एक नेक बख्त फ़रज़न्द है, और तुम्हारे ऊपर अल्लाह पाक ने इस के सदके में रहिम किया है क्यों के वो आधी रात का वक़्त तहज्जुद का है और वो उस वक़्त ज़िक्रे इलाही करता है।

ख्वाब में हुज़ूर सलल्लाहु अलैहि वसल्लम की ज़ियारत

आप रहमतुल्लाह अलैह! की वालिदा माजिदा फरमाती हैं के जब से में हज़रत ख्वाजा अबू अहमद चिश्ती रहमतुल्लाह अलैह के पास गईं थीं, और उन से खुशखबरी सुन के आई थी उस दिन के बाद हज़रत ख्वाजा अबू अहमद चिश्ती रहमतुल्लाह अलैह कभी कभी मेरे घर भी तशरीफ़ लाने लगे, जब आप तशरीफ़ लाते तो फरमाते अस्सलामु अलयकुम या वलियुल्लाह तू मेरा खलीफा है, आप फरमाती है के मेने हज़रत ख्वाजा अबू अहमद चिश्ती रहमतुल्लाह अलैह से पूछा के आप ने सलाम किस को किया है, यहाँ तो कोई आदमी नहीं और किसे खिलाफत दी तो, हज़रत ख्वाजा अबू अहमद अब्दाल चिश्ती रहमतुल्लाह अलैह ने फ़रमाया के ऐ नेक बीबी जो फ़रज़न्द तेरे शिकम में है, में ने उसको सलाम किया है, और खिलाफत भी उसे दी है, आप की वालिदा माजिदा ने फ़रमाया के अभी तो वो शिकम में है मालूम नहीं वो लड़का है या लड़की ना वो आप का मुरीद हुआ है आप ने उसे खिलाफत कैसे दे दी?

हज़रत ख्वाजा अबू अहमद अब्दाल चिश्ती रहमतुल्लाह अलैह ने फ़रमाया के ऐ पाक दामन तेरा फ़रज़न्द मश्हूरे ज़माना शीयूख में से है, और में ने उस का नाम लौहे महफूज़ पर लिखा देखा है और में ने देखा है के जो फ़रज़न्द तेरे शिकम में है और उस का नाम शैख़ अबू मुहम्मद है और वो मेरा मुरीदो खलीफा है, में तुम्हे खुश खबरि देने आया हूँ, ताके तेरे फ़रज़न्द को खबर दूँ, के वो मेरा मुरीदो खलीफा है, हज़रत ख्वाजा अबू अहमद अब्दाल चिश्ती रहमतुल्लाह अलैह फरमाते हैं के जिस रात हज़रत ख्वाजा अबू मुहम्मद चिश्ती रहमतुल्लाह अलैह की विलादत हुई थी, उसी रात हुज़ूर नबी करीम सलल्लाहु अलैहि वसल्लम को ख्वाब में देखा के आप बहुत खुश हैं और मुझ से फ़रमाया के अबू अहमद तुझे खुश ख़बरी हो के आज तेरा एक मुरीद जो के मादर ज़द वली है और उस का नाम अबू मुहम्मद होगा और वो पैदाइश के वक़्त सात मर्तबा बा आवाज़े बुलंद कलमा शरीफ पढ़ेगा, और तमाम हाज़रीन उस आवाज़ को सुनेगे ये फ़रज़न्द मेरा दोस्त भी है और अल्लाह का वली भी है।

हुज़ूर नबी करीम सलल्लाहु अलैही वसल्लम ने तुम को सलाम कहा है

जिस रात हज़रत ख्वाजा अबू मुहम्मद चिश्ती रहमतुल्लाह अलैह! पैदा हुए वो शब् आशूरा (दस मुहर्रम) की थी, आप के वालिद माजिद हज़रत ख्वाजा अबू अहमद अब्दाल चिश्ती रहमतुल्लाह अलैह ने उसी लम्हा ख्वाब में रसूले खुदा सलल्लाहु अलैही वसल्लम को देखा के आप फरमा रहे हैं के ऐ अबू अहमद! तेरे घर अभी फ़रज़न्द तवल्लुद हुआ है, उस का नाम मेरे ही नाम पर रखना और मेरा उस को सलाम कहना, हज़रत शैख़! जैसे ही ख्वाब से बेदार हुए, तो बेटे की विलादत की खबर सुनी, नज़दीक गए, तो नो मौलूद बच्चे को कलमा शरीफ पढ़ते हुए सुना, आप ने वुज़ू कर के बेटे को अस्सलामु अलैकुम कहा, लड़के ने सलाम के जवाब के साथ फ़रमाया: ऐ हज़रत आप ने आज रात ख्वाब में क्या देखा है, मुझे भी बताओ, हज़रत ख्वाजा अबू अहमद अब्दाल चिश्ती रहमतुल्लाह अलैह ने फ़रज़न्द के कान के पास जा कर फ़रमाया के हुज़ूर नबी करीम सलल्लाहु अलैही वसल्लम ने तुम को सलाम कहा है, फिर बाप बेटे दोनों सर बा सुजूद हो गए, और थोड़ी देर के बाद हज़रत ख्वाजा अबू अहमद अब्दाल चिश्ती रहमतुल्लाह अलैह ने दुआ फ़रमाई के इलाही मेरे इस बेटे को वलियुल्लाह बना दे, आवाज़ आई के ऐ अबू अहमद! में ने तुम्हारी दुआ कबूल की और तुम्हारे बेटे को में ने अपना मकबूल बंदा बना लिया है।

अपनी वालिदा का दूध नहीं पिया

जिस रात हज़रत ख्वाजा अबू मुहम्मद चिश्ती रहमतुल्लाह अलैह पैदा हुए वो शब् आशूरा की थी, जब दिन निकला तो आप अलैहिर रहमा ने तमाम दिन अपनी वालिदा माजिदा का दूध नहीं पिया, आप की वालिदा माजिदा ने आप के वालिद से इस का ज़िक्र किया तो आप ने फ़रमाया तुम्हारा फ़रज़न्द मादर ज़ाद वली है, इस ने अम्बिया अलैहिस्सलाम और औलियाए किराम की पैरवी में रोज़ा रखा होगा, और यही बात भी थी क्यों के जब शाम हुई तो आप ने दूध पीना शुरू कर दिया, एक दिन आप की वालिदा साहिबा को बहुत अजीब सा मालूम हुआ इन्होने आप के वालिद माजिद से इस का ज़िक्र किया तो हज़रत ने फ़रमाया के तुम्हारे बेटे को रुलाने के लिए शैतान आया हुआ था, अल्लाह पाक ने फरिश्तों को हुक्म दिया, के शैतान को वहां से हटा दें, चुनांचे जब शैतान लईन भागा तो अबू मुहम्मद! को हंसी आ गई,

हज़रत ख्वाजा अबू मुहम्मद चिश्ती रहमतुल्लाह अलैह की वालिदा माजिदा बयान करती हैं, के पैदाइश के वक़्त से ढाई साल तक पांचों नमाज़ के वक़्त अबू मुहम्मद आसमान की तरफ देख कर बेशुमार कलमा शरीफ पढ़ा करते थे, और उस वक़्त इन के चेहरे पर ऐसा नूर ज़ाहिर होता के उससे पूरा घर रोशन हो जाता, और अक्सर घर में चिराग जलाने की ज़रुरत न होती थी।

तालीमों तरबियत

हज़रत ख्वाजा अबू मुहम्मद चिश्ती रहमतुल्लाह अलैह जब ढाई साल के हो गए, तो आप की ग़िज़ा बहुत कम हो गई, इन की वालिदा माजिदा ने वालिद माजिद से शिकायत की के अबू मुहम्मद! इन दिनों बहुत कम खाना खाते हैं, जब हज़रत ख्वाजा अबू मुहम्मद चिश्ती रहमतुल्लाह अलैह चार साल चार महीने के हुए तो आप को मकतब में बिठाया गया, यकायक एक रोज़ इन की तख्ती पर लिखा हुआ दिखा गया, बिस्मिल्लाह शरीफ लिखा हुआ है, फिर थोड़े ही दिनों में आप ने कुरआन शरीफ ख़त्म कर के दीनी उलूम में कमाल हासिल कर लिया, आप ने चार साल की उम्र से बा जमात नमाज़ पढ़नी शुरू कर दी थी।

इबादतों रियाज़त

उसी वक़्त से हज़रत ख्वाजा अबू मुहम्मद चिश्ती रहमतुल्लाह अलैह की ये करामत ज़ाहिर हो गई थी के आप रहमतुल्लाह अलैह! की ज़बान मुबारक से जो निकलता ज़रूर हो जाता, ख़लीफ़ए वक़्त और अवाम उसी वक़्त से आप के बेहद मोतक़िद हो गए थे, आप रहमतुल्लाह अलैह! की खिदमत में जो भी कोई मकसद ले कर आता वो पूरा हो जाता, तीस साल तक आप रहमतुल्लाह अलैह! हर वक़्त बा वुज़ू रहे, अगर कोई काफिर आप के सामने आ जाता तो फ़ौरन मुस्लमान हो जाता, यहाँ तक के चिश्त में कोई काफिर नहीं रहा, और जो आप के हाथ पर मुशर्रफ बा इस्लाम होता उस पर अर्श से फर्श तक रोशन हो जाता, अपने वालिद माजिद के विसाल के बाद 24/ साल की उम्र में मसनदे सज्जादगी पर रौनक अफ़रोज़ हुए, और अक्सर सलातीने ज़माना मशाहीरे वक़्त आप की खिदमत में हाज़िर हो कर ख़ुलूस के साथ हाज़िर होते थे, हज़रत ख्वाजा अबू मुहम्मद चिश्ती रहमतुल्लाह अलैह! अक्सर कुँए में नमाज़े माक़ूस अदा फरमाते थे, दिनों रात इबादतों रियाज़त में मशगूल रहते थे,

इजाज़तों खिलाफत

हज़रत ख्वाजा अबू मुहम्मद चिश्ती रहमतुल्लाह अलैह! के वालिद माजिद हज़रत ख्वाजा शैख़ अबू अहमद अब्दाल चिश्ती रहमतुल्लाह अलैह, ने अपने विसाल से क़ब्ल इन को मुरीद कर के अपना खिरका पहनाया और अपना जानशीन बना दिया था, और आप को वसीयत फ़रमाई, हमेशा फ़क्ऱो फाका को इख्तियार करे और फुकरा मसाकीन के साथ सुहबत रखें और दुनियादारों से परहेज़ करे, हज़रत ख्वाजा अबू मुहम्मद चिश्ती रहमतुल्लाह अलैह! अपने वालिद माजिद की तमाम नसीहतों पर हमेशा पूरा पूरा अमल करते रहे, आप दस साल तक मुसलसल हुजरे में बंद रहकर औरादो वज़ाइफ़ ज़िक्रे खुदा में मशगूल रहते थे, सात सात रोज़ के बाद सिर्फ एक खजूर या छुआरे से इफ्तार फरमाते थे।

खिज़र अलैहिस्सलाम से इल्म हासिल करना

अय्यामे तिफ्ली बचपन! में एक दिन हज़रत ख्वाजा अबू मुहम्मद चिश्ती रहमतुल्लाह अलैह! अपने मदरसे जा रहे थे, रास्ते में इन को हज़रत खिज़र अलैहिस्सलाम से मुलाकात हुई, इन्होने खुश खबरि दी के ऐ अबू मुहम्मद! अल्लाह पाक ने मुझे हुक्म दिया है के: में तुम्हे इल्मे सूरी और मअनवी सिखाऊं, हज़रत ख्वाजा अबू मुहम्मद चिश्ती रहमतुल्लाह अलैह! ने आप के कदम मुबारक चूम कर अर्ज़ किया के हज़रत! जो आप को हुक्म मिला है बजा लाएं, पस हज़रत खिज़र अलैहिस्सलाम ने आप को इस्मे आज़म सिखाया, और इस के सीखते ही तमाम उलूम और असरारे इलाही इन पर ज़ाहिर हो गए, इसी जगह से लोट कर जब आप घर आए, इन की वालिदा माजिदा ने पूछा के आज तुम ने क्या पढ़ा है, अपनी तख्ती लाओ ताके में देखू, हज़रत ख्वाजा अबू मुहम्मद चिश्ती रहमतुल्लाह अलैह! ने जवाब दिया के ऐ वालिदा माजिदा! आज जो कुछ पढ़ा है, वो तख्ती पर नहीं आ सकता, आप की वालिदा ने कुरान शरीफ उठा कर कहा सुनाओ, आप ने जवाब दिया के ऐ अम्मी जान! आप कुरआन मजीद अपने पास रखें में ज़बानी सुनाता हूँ, और फिर कुरआन शरीफ हिफ़्ज़ सुना दिया, आप की वालिदा माजिदा हैरान रह गईं, और सजदा शुक्र बजा लाईं।

नगमए गैबी

एक दिन आप के वालिद माजिद हज़रत ख्वाजा शैख़ अबू अहमद अब्दाल चिश्ती रहमतुल्लाह अलैह सिमअ सुन रहे थे, और कव्वाल अशआर पढ़ रहे थे, आलमे वजदो कैफ में आप की नज़रे करम साहबज़ादे हज़रत ख्वाजा अबू मुहम्मद चिश्ती रहमतुल्लाह अलैह! पर पड़ी, आप ने पुकारा चले आओ, हज़रत ख्वाजा अबू मुहम्मद चिश्ती रहमतुल्लाह अलैह! मदहोशी के आलम में मजलिसे सिमअ में शरीक हो गए, और देर तक कैफो ज़ोक में रहे, मदहोश हो कर गिर पड़े, सात दिन तक इन पर यही आलमे वजदो कैफ तारी रहा, नमाज़ का वक़्त होता तो कव्वाल रुक जाते, और आप नमाज़ अदा करते, फिर मजलिसे सिमअ शुरू हो जाती और आप पर बे खुदी तारी हो जाती, सात रोज़ तक ये हालत देख कर आप के वालिद माजिद ने कव्वालों को खामोश कर दिया, हज़रत ख्वाजा अबू मुहम्मद चिश्ती रहमतुल्लाह अलैह! को होश आ गया,

कव्वालों को खामोश देख कर आप ने आस्मांन की तरफ नज़र की और फ़रमाया कहो, कहो, बस उसी दम आलमे ग़ैब से नग्मे की आवाज़ आने लगी, हज़रत ख्वाजा अबू मुहम्मद चिश्ती रहमतुल्लाह अलैह! फिर सिमअ में मशगूल हो गए, और हाज़रीन भी इस आवाज़ को सुनकर मुक़य्यफ हो गए, यहाँ तक के मुतावातिर तीन रोज़ इसी तरह आलमे ग़ैब से नगमा की आवाज़ आती रही और हज़रत ख्वाजा अबू मुहम्मद चिश्ती रहमतुल्लाह अलैह! सिमअ सुनते रहे, फिर होश में आए तो अपने वालिद माजिद और शैख़ के कदमो को चूम कर फ़रमाया के हज़रत! जो फतेहयाब सिमअ में होता है किसी शुग्ल में नहीं, हज़रत ख्वाजा शैख़ अबू अहमद अब्दाल चिश्ती रहमतुल्लाह अलैह ने फ़रमाया के ऐ अबू मुहम्मद! सिमअ राज़े सर बस्ता है उसे पोशीदा ही रखना चाहिए, बेचारे अवाम इस की ताब नहीं ला सकते, अगर में सिमअ के राज़ को ज़ाहिर कर दूँ तो सारी दुनिया सिमअ में मुब्तला हो जाएगी और खुदा के अलावा किसी और नेमत की तलबगार नहीं होगी।

बेशुमार मछलियां अशर्फियाँ ले आईं

एक मर्तबा हज़रत ख्वाजा अबू मुहम्मद चिश्ती रहमतुल्लाह अलैह! दरियाए दजला के किनारे बैठ कर अपना कुरता सिल रहे थे, इसी इसना में खलीफा के साहबज़ादे वहां पर पहुंचे और घोड़े से उतर कर अदब से बैठ गए, हज़रत ख्वाजा अबू मुहम्मद चिश्ती रहमतुल्लाह अलैह! ने फ़रमाया के हुज़ूर नबी करीम सलल्लाहु अलैही वसल्लम का इरशाद है के अगर किसी बादशाह की हुकूमत में एक बूढ़ी औरत भी एक रात फाके से रह जाए तो उसे क़यामत के दिन उस बादशाह का दामन पकड़ने का हक हासिल होगा, जब अल्लाह पाक ने तुम लोगों को बादशाहत अता की है, और इस में फुकरा और बे सहारा, मजबूर लोग भी रहते हैं, तुम को तो एक लम्हा भी ला परवाहि से काम नहीं करना चाहिए, कहीं ऐसा ना हो कल क़यामत के दिन शर्मिंदाह होना पड़े, हज़रत! जब नसीहत फरमा चुके तो खलीफा! के साहबज़ादे ने कुछ नकद तोहफे तहाइफ़ के तौर पर आप की खिदमत में पेश किए, आप ने मुस्कुरा कर फ़रमाया, के ऐ शहज़ादे! हमारे ख्वाजगान में से किसी ने भी इन चीज़ों को कबूल नहीं किया है, में भी कबूल नहीं कर सकता, मेरे लिए फक्र की नेमत मलिक सुलेनाम से ज़ियादा बेहतर है, खलीफा के लड़के ने जब बहुत ज़ियादा इसरार किया तो आप ने उसे समझाया के खुदा के बन्दों के लिए गैब का खज़ाना खुला हुआ है, इस लिए तुम्हारे अतियात तहाइफ़ की हाजत नहीं, शहज़ादा फिर भी नहीं माना और इसरार करने लगा, के कुछ कबूल ही कर लीजिए तब आप ने आस्मांन की तरफ मुँह कर के फ़रमाया के ऐ अल्लाह पाक! दिखा जो कुछ हमने इन लोगों को भी दिख ला दे, इतना कहना था के दरियाए दजला की बेशुमार मछलियां मुँह में एक एक अशर्फी लिए हुए पानी की सतह के ऊपर आ गईं, शहज़ादा हैरान रह गया और हज़रत के कदमो पर सर रख कर माफ़ी मांगी और वापस चला गया।

सोमनात के हमले में रूहानी मदद

जब सुल्तान महमूद ग़ज़नवी बिन सुबुक्तिगीन! सोमनात के किले! पर हमला आवर हुआ, तो हज़रत ख्वाजा अबू मुहम्मद चिश्ती रहमतुल्लाह अलैह को भी हुक्म मिला के आप भी इस की तरफ तवज्जुह दें, और मदद करें उस वक़्त आप की उमर मुबारक सत्तर साल की थी, चुनांचे आप दुरवेशों के साथ इस की तरफ मुतवज्जेह और बा नफ़्से नफीस खुद वहां गए, और मुशिरीकीन के खिलाफ जिहाद किया, एक दिन काफिरों ने इस ज़ोर से हमला किया के मुसलमानो को घर बार छोड़ कर जंगल में पनाह ली, आप का एक मुरीद था जिस का नाम काकू था, वो चक्की चलाया करता था, आप ने उसे आवाज़ दी काकू! जल्दी आओ, चुनांचे काकू फ़ौरन पंहुचा और लश्करे इस इस्लाम के साथ मिलकर ऐसा हमला किया के दुश्मन भाग खड़े हुए, और लश्करे इस्लाम मुसलमानो को हज़रत ख्वाजा अबू मुहम्मद चिश्ती रहमतुल्लाह अलैह के तुफैल और अल्लाह पाक के करमो फ़ज़्ल से कामयाबी मिल गई,

ऐन उसी वक़्त लोगों ने देखा के मुहम्मद काकू चक्की का पाठ उठा कर चला रहा है, जब लोगों ने मुहम्मद काकू से इस का सबब पूछा तो उन्होंने बताया के मुझे मेरे शैख़ ने लशकरे इस्लाम की मदद का हुक्म मिला में उन काफिरों को मार के रहूंगा, सुल्तान महमूद ग़ज़नवी ने सोमनाथ का किला फ़तेह करने के वक़्त आप की ज़ाहिरी और बातनी इमदाद अपनी आँखों से देखि तो वो मोतक़िद हो गया और हाज़िरे खिदमत हो कर कदम बोस हो कर आप से बैअत की।

हज़रत ख्वाजा अबू अहमद को ख्वाब में हिदायत

हज़रत ख्वाजा अबू मुहम्मद चिश्ती रहमतुल्लाह अलैह! की एक हकीकी आबिदा ज़ाहिदा आरिफा बहिन थीं, जिन्होंने शादी नहीं की थी, भाई के साथ रहती थीं, अल्लाह पाक की इबादत और भाई की खिदमत में अपना वक़्त सर्फ़ करती थीं, सूत कात कात कर अपनी गुज़र औकात करती थीं, और भाई को भी खिलाती थीं, आप ने चालीस साल की उम्र तक शादी नहीं की, आप अक्सर अपनी हमशीरा से फ़रमाया करते थे, के आप के वतन से एक बच्चा पैदा होगा जो क़ुत्बुल अक्ताब होगा, और ये बात शादी के बगैर नामुमकिन है, लेकिन आप की हमशीरा साहिबा को आप की जुदाई गवारा नहीं थी, इस लिए वो हरगिज़ शादी के लिए तय्यार न थीं, और हर वक़्त इबादतों रियाज़त में रहती थीं, हत्ता के एक वक़्त वो आया, के आप ने अपने शैख़े कामिल और वालिद माजिदा हज़रत ख्वाजा अबू अहमद अब्दाल चिश्ती रहमतुल्लाह अलैह को ख्वाब में ये कहते हुए सुना के ऐ अबू मुहम्मद! जो कुछ तुम ने अपनी हमशीरा से कहा है वो दुरुस्त है, फुला शहर और फुला मकाम पर एक सय्यद ज़ादा मुहम्मद समआन! नामी रहता है वो जवान नेक सालेह और कामिल दुर्वेश है तुम उस को तलाश कर के अपनी बहन का निकाह कर दो, उसी रात को इन की बहिन ने भी यही ख्वाब देखा और अपने वालिद माजिद से यही हिदायत पाई, और आप राज़ी हो गईं।

हज़रत ख्वाजा अबू मुहम्मद चिश्ती की हमशीरा का अक़्द मसनून

चुनांचे इसी बिना पर हज़रत ख्वाजा अबू मुहम्मद चिश्ती रहमतुल्लाह अलैह ने मुहम्मद समआन अलैहिर रहमा को एक रुक्का खत भेजा के अगर एक पैर में जूता पहने हुए हो तो मेरा खत देखते ही दूसरे पैर में जूता पहने बगैर फ़ौरन उसी हाल में चले आओ, कासिद जब मुहम्मद समआन अलैहिर रहमा के घर पंहुचा तो उस वक़्त वाकई वो सिर्फ एक पैर में जूता पहने हुए थे और दूसरा नग्गा था, ये खत देख कर उसी हाल में रवाना हो गए, और हज़रत ख्वाजा अबू मुहम्मद चिश्ती रहमतुल्लाह अलैह की खिदमत में हाज़िर हो कर मुलाकात की, हज़रत ख्वाजा अबू मुहम्मद चिश्ती रहमतुल्लाह अलैह ने अपनी हमशीरा का निकाह मुहम्मद समआन अलैहिर रहमा के साथ कर दिया, कुछ दिनों के बाद इन के बतन से अबू युसूफ! नामी एक फ़रज़न्द पैदा हुए, जिन की नशो नुमा हज़रत ने अपने फ़रज़न्द की तरह खुद की और उलूमे ज़ाहिरी व बातनी से आरास्ता कर के दुरवेशी के आला मकाम तक पंहुचा दिया और अपनी खिलाफ़तो इजाज़त से नवाज़ा।

पीर का दीदार कर लेता

क़स्बा संजान के रहने वाले हज़रत उस्दात मरदान अलैहिर रहमा जो आप के महबूब मुरीद थे, बयान फरमाते हैं के हज़रत! ने मुझे खिलाफ़तो इजाज़त अता फरमा कर मुझे अपने वतन वापस जाने की हिदायत की, में जुदाई बरदाश्त ना कर के रोने लगा, और अर्ज़ किया के गुलाम को जुदाई गवारा नहीं है, हज़रत! ने फ़रमाया जाओ अल्लाह पाक से में ने इल्तिजा की है, जिस वक़्त भी तुम को मुझे देखने की ख्वाइश होगी, हिजाबे जिस्मानी और सल्तनाते मकानी दूर हो जाएगी, आप के फरमाने से मुझे तसल्ली हुई और में चला गया, और फिर संजान से चिश्त मुझे साफ नज़र आने लगा, और में जब भी चाहता अपने मुर्शिदे करीम को देख लेता था।

आप के खुलफाए किराम

हज़रत ख्वाजा अबू मुहम्मद चिश्ती रहमतुल्लाह अलैह के तीन जय्यद खुलफ़ा थे, (1) हज़रत ख्वाजा नासिरुद्दीन अबू युसूफ चिश्ती, (2) हज़रत ख्वाजा मुहम्मद काकू चश्ती, (3) हज़रत उस्ताद मर्दान रिदवानुल्लाही तआला अलैहिम अजमईन।

विसाल

आप रहमतुल्लाह अलैह का विसाले बा कमाल 4/ रबीउल अव्वल 411/ हिजरी को हुआ।

मज़ार

आप रहमतुल्लाह अलैह का मज़ार मुबारक: मुल्के अफगानिस्तान के सूबा हिरात, के क़स्बा चिश्त में मरजए खलाइक है,

“अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त की उन पर बेशुमार रहमत हो और उन के सदके में हमारी मगफिरत हो”

रेफरेन्स हवाला

मिरातुल असरार
सीयरुल अक्ताब
ख़ज़ीनतुल असफिया
सवानेह शैखुल आलम
सफ़िनतुल औलिया,
सीयरुल औलिया

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