हज़रत मलिक ज़ैनुद्दीन देहलवी रहमतुल्लाह अलैह

हज़रत मलिक ज़ैनुद्दीन देहलवी रहमतुल्लाह अलैह

हज़रत मलिक ज़ैनुद्दीन देहलवी रहमतुल्लाह अलैह

इन के बाप दादा यकेबाद दीगरे शाहाने दिल्ली के मुलाज़िम थे, ये भी सुल्तान सिकंदर के चचाज़ाद भाई खान जहाँ के वकील थे, अक्सरो बेश्तर उल्माए किराम, और औलियाए किराम हज़रत मलिक ज़ैनुद्दीन देहलवी रहमतुल्लाह अलैह को दोस्त रखते थे, और आप की तरफ रुजू करते थे, क्यों के ये आलिमो सूफियों और नेक लोगों की क़द्र करते थे और इन के साथ अच्छा सुलूक करते थे और दिल्ली और इस के अतराफ़ के मकबरों और ज़ियारत गाहों की निगरानी फरमाते थे,

कुरआन शरीफ की तिलावत

हज़रत मलिक ज़ैनुद्दीन देहलवी रहमतुल्लाह अलैह हमेशा खड़े होकर कुरआन शरीफ की तिलावत करते थे, आप ने एक रहिल बनवाई थी जिस की ऊँचाई आप के सीने तक थी, इस पर कुरआन शरीफ रख कर तिलावत किया करते थे, साथ ही छत में एक रस्सी लटका कर इस का फंदा अपने गले में डाल लिया करते थे ताके अगर नींद आए तो इस के फंदे से गला दब जाए और आप सोने ना पाएं, आप के तमाम मुलाज़िम नौकर आधी रात के बाद तहज्जुद के लिए उठते थे, उस वक़्त से ले कर नमाज़े चाशत तक इन के महल में कोई शख्स इशारे के सिवा कोई बात ज़बान से नहीं कहता था, इस लिए के तमाम लोग ज़िक्रो इबादत में मशगूल रहते थे,

मीलाद की महफ़िल का लंगर

हज़रत मलिक ज़ैनुद्दीन देहलवी रहमतुल्लाह अलैह हर जुमेरात की रात को कई मन चावलों पर तीन तीन मर्तबा सूरह इखलास पढ़ कर हुज़ूर नबी करीम सलल्लाहु अलैही वसल्लम की बारगाह में इसाले सवाब किया करते थे, जिन की दिन के वक़्त यानि जुमा को कबूली पक्ति थी और वो गरीबों में तकसीम की जाती थी, 1/ रबीउल अव्वल शरीफ से 12/ रबीउल अव्वल शरीफ ईद मिलादुन नबी सलल्लाहु अलैही वसल्लम तक रोज़ाना एक हज़ार रूपये बा गर्ज़ हुज़ूर सलल्लाहु अलैही वसल्लम की बारगाहे आलिया में सवाब पेश करने में इस तरह खर्च किया जाता के रोज़ाना एक हज़ार रूपया इस पर बढ़ाते रहते यानि रबीउल अव्वल शरीफ की 1/ एक हज़ार 2/ हज़ार 3/ हज़ार, 12/ रबीउल अव्वल शरीफ जो के हुज़ूर नबी करीम सलल्लाहु अलैही वसल्लम रूहे ईमान हुज़ूर नबी करीम सलल्लाहु अलैही वसल्लम की पैदाइश मुबारक का दिन है, 12/ हज़ार रूपया खर्च करते थे, ये उन दिनों का वाकिया है जब के महंगाई का ज़माना था।

शहादत

आप रहमतुल्लाह अलैह हर बुद्ध को ग़ुस्ल कर के खत्मे क़ुरआने करीम कराया करते थे, अल्लाह पाक की बारगाह में ये दुआ करते थे, के मुझे शहादत की मोत नसीब फरमा, चुनांचे आप की ये दुआ कबूल हो गई, आप के ना फरमान गुलाम ने सहर के वक़्त दूध में ज़हर मिला कर आप को पिला दिया जिससे आप की शहादत हो गई।

मज़ार शरीफ

आप का मज़ार मुबारक महरोली दिल्ली 30/ शम्शी तालाब के पास था, मगर अब निशान भी नहीं है।

“अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त की उन पर बेशुमार रहमत हो और उन के सदके में हमारी मगफिरत हो”

रेफरेन्स हवाला

रहनुमाए मज़ाराते दिल्ली

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