वालिद माजिद
हज़रत मौलाना शोएब देहलवी रहमतुल्लाह अलैह आप के वालिद मुकर्रम हज़रत मौलाना मिन्हाज रहमतुल्लाह अलैह हैं, जो के बचपन ही में शहर लाहौर से इल्मे दीन हासिल करने के लिए दिल्ली तशरीफ़ ले गए थे, आप ने तालिबे इल्मी के ज़माने में बेहद तकालीफ़ उठाईं, आप रहमतुल्लाह अलैह बाज़ औकात दुकानों से आटा और घी मांग लाते, और उसी का चिराग बनाकर मुताला करते और सुबह को उसी की रोटी पका कर खा लिया करते थे, एक ज़माने तक आप ने यही अमल किया, यहाँ तक के आप ने तालीम मुकम्मल हासिल करली, फरागत पाने के बाद सुल्तान बहलूल ने आप को दिल्ली का मुफ़्ती, मुकर्रर कर दिया, चुनांचे आप यहीं रहने लगे।
हज़रत मौलाना शोएब देहलवी रहमतुल्लाह अलैह
ऐसी अज़ीम और ज़ी इल्म हस्ती के चश्मों चिराग थे, आप ने अपने इल्म पर अमल किया और सीरतो अख़लाक़ में फरिश्ता सिफ़त मालूम होते थे, हज़रत मौलाना शोएब देहलवी रहमतुल्लाह अलैह के वाइज़ो नसीहत में ऐसी तासीर थी के चलता हुआ आदमी रुक जाता था, अगरचे उस के सर पर बोझ ही क्यों न होता, वो बराबर खड़ा हो कर आप की तिलावत और वाइज़ को सुनता रहता, वाइज़ के दौरान खुशखबरी और अज़ाब के मुख्तलिफ मक़ामात पर आप की हालत खुदबखुद गैर हो जाती थी, शहर के बड़े बड़े उल्माए किराम और मशाइखे उज़्ज़ाम आप के वाइज़ बयान में शरीक होते थे और शहर के अक्सरो बेरशतर लोग आप के शगिर्द थे,
जिस दुर्वेश से हज़रत युसूफ क़त्ताल रहमतुल्लाह अलैह जिन का मज़ार शरीफ (खिड़की गाँव दिल्ली में है) ने नेमतें हासिल की थीं वो दुर्वेश पहले हज़रत मौलाना शोएब देहलवी रहमतुल्लाह अलैह के पास आए थे, और इन से कहा था के में तुम को एक काम बताता हूँ लेकिन आप को अपना ये पढ़ाने के काम छोड़ना पड़ेगा, हज़रत मौलाना शोएब देहलवी रहमतुल्लाह अलैह ने फ़रमाया के में ने इल्म को बड़ी तकलीफें उठा कर हासिल किया है, और आख़िरत की निजात भी इसी रास्ते में है, इस का छोड़ना मेरी ताकत से बाहर अलबत्ता जो कुछ आप इरशाद फरमाएं गे में उस पर अमल करूंगा फिर अगर आप का बताया काम मुझ पर ग़ालिब आ जाएगा तो ये तालीम देना खुद बखुद छूट जाएगी, वो दुर्वेश इस पर राज़ी ना हुए और आप को छोड़ कर हज़रत युसूफ क़त्ताल रहमतुल्लाह अलैह के पास चले गए।
वफ़ात
आप रहमतुल्लाह अलैह ने बाबर के दौरे हुकूमत में 936/ हिजरी मुताबिक 1526/ ईसवी को वफ़ात पाई।
मज़ार शरीफ
आप का मज़ार मुबारक, महरूली दिल्ली 30/ में हज़रत शैख़ अब्दुल हक मुहद्दिसे देहलवी रहमतुल्लाह अलैह के मज़ार मुबारक से पच्छिम की जानिब एक गुंबद में था मगर अब कुछ भी नहीं है।
“अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त की उन पर बेशुमार रहमत हो और उन के सदके में हमारी मगफिरत हो”
रेफरेन्स हवाला
रहनुमाए मज़ाराते दिल्ली

