हज़रत सय्यदना ख्वाजा गरीब नवाज़ मोईनुद्दीन चिश्ती रहमतुल्लाह अलैह की हालाते ज़िन्दगी (Part-3)

हज़रत सय्यदना ख्वाजा गरीब नवाज़ मोईनुद्दीन चिश्ती रहमतुल्लाह अलैह की हालाते ज़िन्दगी (Part-3)

आना सागर झील का पानी खुश्क हो गया

शादी देओ का इस्लाम कबूल करना अजमेर शरीफ के हिन्दुओं और राजा पर सख्त शाक (मुश्किल, कठिन) गुज़रा और वो समझे के ये दुर्वेश फ़कीर साहिराना कुव्वतों के मालिक हैं, और इन का सरदार भी ज़बरदस्त जादू गर है, इस के जादू का तोड़ जादू ही से किया जा सकता है, उन दिनों हिंदुस्तान में एक हिन्दू जोगी जयपाल बहुत मश्हूरो माअरूफ़ था, जोगी जयपाल सेहर और इस्तदराजी कुव्वत में हिंदुस्तान के अंदर अपना सानी नहीं रखता था, इस के सैंकड़ों शागिर्द और चेले थे और हिंदुस्तान में बेपनाह असरो इक्तिदार का मालिक था, बड़े बड़े ताकतवर राजा भी उस की इज़्ज़तो तक़रीम करते थे, बयान किया जाता है के, राजा अजयपाल, भी इस का शागिर्द था, और इस के साहिराना कमालात से बा खूबी आगाह था, अपनी कोताह नज़री की वजह से वो सरकार ख्वाजा गरीब नवाज़ रदियल्लाहु अन्हु! को भी एक बा कमाल साहिर (जादूगर) समझा,

इस सोच के पेशे नज़र राजा पिरथवी राज ने फौरी तौर पर जयपाल को अमजेर शरीफ बुलाया और उसे सरकार ख्वाजा गरीब नवाज़ रदियल्लाहु अन्हु! के मुकाबले के लिए तय्यार किया, जयपाल को अपने जादू के कमालात पर बहुत भरोसा था, उसने इस काम को करने की हामी भरली और राजा को भी तसल्ली देते हुए कहा के फ़िक्र न करो ये काम तो में फ़ौरन करलूँगा और इस फ़कीर को अजमेर शरीफ से निकल भी दूंगा, चुनांचे इस मकसद के लिए उसने अपने चेलों को जमा कर के तय्यारी शुरू की,

इधर सरकार ख्वाजा गरीब नवाज़ रदियल्लाहु अन्हु! को भी जयपाल की सरगर्मियों की खबर हो गई,
आप ने वुज़ू किया और अपने साथियों के गिर्द अपने असा मुबारक से एक दायरा खींच कर इरशाद फ़रमाया के इंशा अल्लाह दुश्मन इस दायरे के अंदर दाखिल नहीं हो सकते, जयपाल ने वहां पहुंचते ही जादू के ज़ोर से ये इंतिज़ाम किया के आप के साथी किसी भी तरह तालाब से पानी ना ला सकें, जयपाल की इस हरकत का इल्म सरकार ख्वाजा गरीब नवाज़ रदियल्लाहु अन्हु! को हुआ तो आप ने शादी देओ को हुक्म दिया के जल्दी से जाओ और उस तालाब से एक प्याला पानी भर कर ले आओ, शादी देओ जो के इस्लाम कबूल कर के आप के मुरीदो में शामिल हो चुका था, आप के हुक्म के मुताबिक तालाब से एक प्याला पानी का भर लिया, उसने जैसे ही तालाब से पानी का प्याला भरा तो अल्लाह पाक ने आनासागर के तमाम पानी को ज़मीन में वक़्ती तौर पर जज़्ब कर दिया जिससे आनासागर की झील बिलकुल फ़ौरन खुश्क हो गई,

शादी देओ ने पानी से भरा हुआ प्याला ला कर सरकार ख्वाजा गरीब नवाज़ रदियल्लाहु अन्हु! की खिदमत में पेश कर दिया आप ने वो प्याला अपने पास रख लिया, और आप के साथियों को जब भी पानी की ज़रूरत होती तो उस प्याले से ले लेते, जितना भी पानी इस्तेमाल करते इस प्याले से कम नहीं होता, सरकार ख्वाजा गरीब नवाज़ रदियल्लाहु अन्हु! के कहने के से पानी का प्याला भरने से अजमेर का दीगर पानी भी खुश्क हो गया, और अजमेर में शदीद पानी की किल्लत हो गई, लोग प्यास से निढाल होना शुरू हो गए, शहर में कुहराम मच गया जयपल का जादू भी कुछ नहीं कर सका, और खुद भी प्यास की शिद्दत से तड़प रहा था, आखिरकार आप के दाईराए हिसार के पास खड़ा हो कर आप से मुखातिब हुआ, अल्लाह पाक की मखलूक प्यास की शिद्दत की वजह से तड़प रही है और आप ख़ामोशी से देख रहे हैं, आप तो फ़कीर आदमी हैं और फ़कीर रहम करते है, ज़ुल्म नही करते, जयपाल की आहोज़ारी और इल्तिजा सुनकर सरकार ख्वाजा गरीब नवाज़ रदियल्लाहु अन्हु! को रहिम आ गया, और आपने शादी देओ से फ़रमाया के जाओ और उस प्याले का पानी तालाब में डाल्दो चुनांचे तालाब में प्याले का पानी डालते ही आनासागर भर गया और लोग पहले की तरह अपनी ज़रूरियात इस पानी से पूरी करने लगे,

जयपाल जोगी मुस्लमान हो गया

आनासागर तालाब के पानी के खुश्क होने के वाकिए से जयपाल जोगी को सबक हासिल करना चाहिए था के अल्लाह पाक के वलियों की मुखालिफत नहीं करनी चाहिए, लेकिन उसे अपनी जादूगरी पर बड़ा नाज़ था इस लिए इस में इंतिकाम की आग मज़ीद भड़क गई और इस बात में अपनी बेइज़्ज़ती तसव्वुर कर रहा था, आखिरकार जयपाल जोगी अपने शागिर्दों के हमराह सरकार ख्वाजा गरीब नवाज़ रदियल्लाहु अन्हु! की क़याम गाह की तरफ बढ़ा, तमाम साहिर शेरो पर सवार थे, कुछ अपने हाथों में आग उगलने वाले सांप पकडे हुए थे, और कुछ अपने हाथों से आग के चक्कर और अंगारे बरसा रहे थे, और सारी फ़िज़ा में एक होलनाक तूफ़ान बरपा हो गया था, सरकार ख्वाजा गरीब नवाज़ रदियल्लाहु अन्हु! ने इस तूफ़ाने बदतमीज़ी को देखा और अपने साथियों के गिर्द एक हिसार खींच दिया, साहिरों की आतिशबाज़ी का सारा ज़ोर इस हिसार के बाहर ख़त्म हो जाता था, साहिरों ने बहुत जतन किए, के किसी तरह इन का जादू मुसलमानो पर असर करे, लेकिन हिसार के अंदर सरकार ख्वाजा गरीब नवाज़ रदियल्लाहु अन्हु! और इन के साथी निहायत इत्मीनान से यादे इलाही में मशगूल थे, और इन पर कुछ असर नहीं होता था, सरकार ख्वाजा गरीब नवाज़ रदियल्लाहु अन्हु! ने इन लोगों को समझाया के अपनी हरकतों से बाज़ आ जाओ और दुरवेशों के सुकून में खलल मत डालो, लेकिन जादूगर भला आप की बात को कब सुनते थे, बराबर शरंगेज़ में मसरूफ रहे,

आखिर सरकार ख्वाजा गरीब नवाज़ रदियल्लाहु अन्हु! ने एक मुठ्ठी भर खाक ज़मीन से उठाई और अल्लाह पाक का नाम लेकर साहिरों जादूगरों की तरफ फेंक दी, फ़ौरन उन के खेल भसम हो कर रह गए, कोई शेर रहा न सांप आग के चक्कर और गोले राख के ढेर बन गए और जादूगर हैरत ज़दा होकर एक दूसरे का मुँह तकने लगे, जब जयपाल जोगी नाकाम हो गया, तो उसने कहा ऐ अल्लाह के बंदे अब मेरा और तुम्हारा मुकाबला होगा तुम्हारे लिए यही मुनासिब है के तुम अजमेर छोड़ कर चले जाओ वरना में आसमान पर जाकर तुम पर नाज़िल करूंगा के तुम से संभाला न जाएंगे, इस के साथ ही जयपाल जोगी ने हिरन की खाल बिछाई और इस पर बैठ कर आसमान की तरफ उड़ना शुरू कर दिया, सरकार ख्वाजा गरीब नवाज़ रदियल्लाहु अन्हु! ने फ़ौरन अपनी खड़ाऊँ उतारी और हवा में उछालते हुए फ़रमाया के जा, इस बदबख्त को ज़मीन पर उतार कर ला, हुक्म सुनते ही खड़ाऊँ हवा में बुलंद हुई और जयपाल के सर के ऊपर जा कर मारना शुरू कर दिया,

खड़ाऊँ की मार की शिद्दत से इस का बुरा हाल हो रहा था खड़ाऊँ ने इस को मार मार कर ज़मीन पर उतरने पर मजबूर कर दिया, ज़मीन पार आते ही, आप के कदमो पर गिर पड़ा और माफ़ी का ख़्वास्तगार हुआ, सरकार ख्वाजा गरीब नवाज़ रदियल्लाहु अन्हु! ने इसे एक प्याला पानी पीने के लिए दिया, जो इस ने पिया, जयपाल तो पहले ही संमह चुका था, के वो सरकार ख्वाजा गरीब नवाज़ रदियल्लाहु अन्हु! के मुकाबले में आजिज़ है, लेकिन दुनियावी रख रखाओ अज़ीम जादूगर होने की वजह से शुहरत इसे शिकस्त ना करने पर मजबूर कर रही थी, मगर आप से इस्लाम कबूल करने की ख्वाइश का इज़हार किया, और सच्चे दिल से आप के सामने तौबा की, आप ने भी उसे मुआफ कर दिया, और कलमा शरीफ पढ़ा कर इस्लाम में दाखिल हो गया और उस का नाम “अब्दुल्लाह” रखा, और ये भी आप के मुरीदीन मुहिब्बीन आशिक़ीन में शामिल हो गए।

शहर में क़याम

सरकार ख्वाजा गरीब नवाज़ रदियल्लाहु अन्हु! अब तक आनासागर के किनारे ठहरे हुए थे, साधू राम और जयपाल ने मुस्लमान होने के बाद सरकार ख्वाजा गरीब नवाज़ रदियल्लाहु अन्हु! की खिदमत में अर्ज़ किया के: “हुज़ूर बस्ती में क़याम फरमाएं ताके मखलूक आप के कदमो की बरकत से मुस्तफ़िज़ो मुस्तनीर हो” सरकार ख्वाजा गरीब नवाज़ रदियल्लाहु अन्हु! ने इन की ये दरख्वास्त कबूल फ़रमाई, आप ने यादगार मुहम्मद को शहर में जगह मुन्तख़ब करने के लिए हुक्म फ़रमाया, यादगार मुहम्मद ने जगह मुन्तख़ब कर के सरकार ख्वाजा गरीब नवाज़ रदियल्लाहु अन्हु! को मुत्तला किया, सरकार ख्वाजा गरीब नवाज़ रदियल्लाहु अन्हु! ने आनासागर के करीब क़याम फ़रमाया, ये वही जगह है जहाँ आज कल आप की यादगार है, क़याम के बाद जमात खाना, इबादत खाना, मतबख़ खाना, बनवाया गया।

तिरावड़ी या तराइन की पहली जंग

तिरावड़ी तराइन की पहली जंग सल्तनाते गौरी के ऊलुल अज़्म फ़रमाँ रवा सुल्तान शहाबुद्दीन मुहम्मद गौरी और राजा पिरथवी राज के दरमियान 587/ हिजरी में थानीसर से 14/ मील की दूरी पर तिरावड़ी या तराइन के मैदान में हुई, सुल्तान शहाबुद्दीन मुहम्मद गौरी! अपने बड़े भाई सुल्तान गियासुद्दीन गौरी की वफ़ात के बाद तख़्त नशीन हुआ, इस का असली नाम “मुहम्मद” था, अय्यामे शाहज़दगी में उसे शहाबुद्दीन कहते थे, तख़्त नशीनी के बाद इस ने “मुइज़्ज़ुद्दीन” का लक़ब इख़्तियार किया लेकिन आम तौर वो शहाबुद्दीन! मुहम्मद गौरी! के नाम से मशहूर है, वो बचपन ही से निहायत जरी, शुजाअ और बुलंद हिम्मत था,

तिरावड़ी या तराइन की जंग क्यों हुई

तिरावड़ी या तराइन की पहली का सबब ये हुआ था के, सुल्तान महमूद ग़ज़नवी के दौरे हुकूमत में पंजाब के एक हाकिम राजा जयपाल ने सरहद पर हमला कर दिया, इस्लामी लश्कर ने राजा जयपाल को ज़बरदस्त शिकस्त से हमकिनार किया इस जंग में राजा जयपाल को गिरफ्तार कर लिया गया, बड़ी मुश्किल से उस ने इस शर्त पर मुआफी हासिल की के वो तावाने जंग नकद रकम की सूरत में और अभी देगा, चुनांचे इस शर्त पर इसे रिहा कर दिया गया, मगर जब वो वापस पंजाब में आया तो अपनी रिवायती मक्कारी और अय्यारी से काम लेते हुए अपने वादे से मुकर गया, इस पर शहर गज़नी से एक इस्लामी लश्कर राजा जयपाल को सज़ा देने की गर्ज़ से पंजाब पर हमला आवर हुआ,

हिंदुस्तान में तमाम हिन्दू राजाओं ने मुत्तहिद हो कर इस्लामी लश्कर का मुकाबला किया मगर उन को शिकस्ते फाश हुई राजा गिरफ्तार हो गया और पंजाब हुकूमत गज़नी का एक सूबा बन गया मगर ये सूबा ज़ियादा अरसा तक हुकूमते गज़नी के मातहत ना रह सका और सुल्तान शहाबुद्दीन गौरी के फ़ातिहाना हमले से पहले ही अजमेर के राजा पिरथवी राज ने छीन लिया, सुल्तान शहबुद्दीब गौरी ने तख़्त पर बैठते ही लाहौर पर चढाई कर दी और लाहौर पर कब्ज़ा कर लिया इस के साथ ही इस ने पिरथवी राजा को लिखा के वो फ़ौरन सल्तनत गज़नी के फ़तेह किये हुए इलाके वापस कर दे और जिस तरह सुल्तान महमूद ग़ज़नवी की क़ियादत को तस्लीम किया जाता था, इसी तरह अब भी हमारी किया दत्त तस्लीम की जाए, फ़ातिहाना हमले से राजा पिरथवी राज ने सुल्तान महमूद ग़ज़नवी के खत को कोई अहमियत नहीं दी, बल्के बहादुरी का मुज़ाहिरा करते हुए तकरीबन 150/ राजाओं की फौज आप के साथ लेकर लाहौर की तरफ रवानगी इख़्तियार की लश्करे कुफ्फार अभी भटिंडा के नज़दीक ही पंहुचा था, के सुलतान शहाबुद्दीन गौरी को इत्तिला मिल गई,

इस इत्तिला के मिलते ही, सुल्तान शहाबुद्दीन गौरी! भटिंडा पंहुचा ओर पिरथवी राज को शिकस्त से दोचार किया, इस तरह भटिंडा पर भी सुल्तान शहाबुद्दीन गौरी! ने कब्ज़ा कर लिया, एक दिन सुल्तान शहाबुद्दीन गौरी! अपनी काबीना (किसी हुकूमत के वज़ीरों की जमात) के ज़िम्मेदार अफ़राद के साथ इस मसले पर मीटिंग में मसरूफ था, के किस तारिख को दारुल हुकूमत गज़नी के लिए रवानगी इख़्तियार की जाए के इसी इसना में सरहद से कासिद खुतूत लेकर पंहुचा के अजमेर का हुक्मरान पर पिरथवी राज अपने भाई खांडेराव जो के दिल्ली का हुक्मरान को साथ ले कर दो लाख फौजी और तीन हज़ार जंगी हाथियों से भटिंडा को छुड़ाने के लिए चला आ रहा है, इस इत्तिला पर सुल्तान शहाबुद्दीन गौरी! ने उसी वक़्त मुनादी करादी के जब तक इस मुहिम के बारे में फैसला न हो जाए, उस वक़्त गज़नी के किसी सिपाही को वापसी हराम है लिहाज़ा फौरी तौर पर जंग की तय्यारी की जाए, सुल्तान शहाबुद्दीन गौरी! के हुक्म पर फ़ौरन अमल किया गया, और इस्लामी फौज ने दुश्मन के मुकाबले के लिए रवानगी इख़्तियार करली, जब अम्बाला पहुंचे तो मालूम हुआ के पिरथवी राज की फौज पानीपत पहुंच गई है और फील खाना करनाल पहुंच गया है, चुनांचे इस्लामी लश्कर तिरावड़ी या तराइन के मैदान में पंहुचा तो दोनों फौजो का आमना सामना हो गया,

दोनों तरफ सफबन्दी हो गई सारी रात दोनों लश्कर एक दूसरे का मुकाबला करने के लिए तय्यारी में मसरूफ रहे जब रात गुज़र गई और सुबह का सूरज तुलु हुआ तो दोनों तरफ की फौजें लड़ाई के लिए बिलकुल तय्यार थीं उस मोके पर पिरथवी राज, ने अपनी फौज के सामने एक पुरजोश तकरीर की जिससे उस के लश्करियों का खून गरम हो गया पिरथवी राज ने कहा,
ऐ राजपूतो के बेटों! तुम्हारा मुकाबला पहाड़ों के अफगानो, और तातार खानियों, के तुरकों, से है, मलिच्छ मुस्लमान हमारे धरम को भरष्ट करने के लिए आए हैं तुम्हारे मुकाबले पर खड़े हैं, अगर तुम हिम्मत करो तो कोई बड़ी बात नहीं के तुम इन को खरगोश की तरह भगा भगा कर मारलोगे और ये अच्छी तरह सुनलो के अगर तुम्हारा एक कदम भी पीछे हटा तो फिर इन के कदम हमारे घरों में घुस जाएंगे, आज धरम को तुम्हारी तलवार की ज़रुरत है मारो मारो इन को दम ना लेने दो, खबर दार देखो इन में से कोई भी भागने न पाए, पिरथवी राज की तकरीर अभी जारी थी के इस्लामी लश्कर के अगले दस्ते में हरकत पैदा हुई ये देख कर हिन्दू राजपूत सूरमा भी हाथियों की सफों को चीरते हुए आगे बड़े और उन्होंने तीर चलाने शुरू कर दिए, राजपूतों का एक दस्ता इस्लामी लश्कर में घुस गया, और उसने बर्छियों के वार शुरू कर दिए, हिन्दू राजपूत बड़े बेजिगरी से लड़ रहे थे मुस्लमान भी उन पर ताबड़ तोड़ हमले कर रहे थे, सुल्तान शहाबुद्दीन गौरी! के लश्कर के क्लब पर तीरों की बारिश हो रही थी के इसी दरमियान में सुल्तान शहाबुद्दीन गौरी! के एक साथी ने बादशा को इत्तिला दी के अफगान और खिलजी पुश्त दिखा कर भाग गए हैं, इस लिए आप भी घोड़े का रुख वापस करलें दुश्मन का दबाओ बहुत ज़ियादा बढ़ गया है, सुल्तान शहाबुद्दीन गौरी! ने ये बात सुनी तो बिजली की तरह लपका और जो फौज इस के इर्द गिर्द मौजूद थी उस को इकठ्ठा कर के दुश्मन पर हमलाआवर हुआ घमसान की लड़ाई शुरू हो गई,

उस दौरान दिल्ली के राजा खांडेराओ! की नज़र सुल्तान शहाबुद्दीन गौरी! पर पड़ी तो अपने फील बान को ज़ोरदार आवाज़ दी के खबर दार जाने ना पाए, फील बान ने भी मुनासिब मौका समझा और हाथ से ना निकलने दिया, फ़ौरन हाथी का रुख सुल्तान शहाबुद्दीन गौरी! की तरफ मोड़ दिया सुल्तान! ने भी देख लिया था, चुनांचे वो अपने घोड़े के साथ इस तरह हमला आवार हुआ के घोड़े के दोनों अगले पाऊं हाथी की सूंड पर पड़े और उस का नेज़ा उसके सामने मुँह पर पड़ा लेकिन इस हमले में वो खुद भी शदीद ज़ख़्मी हो गया घोड़े से भी गिरने ही लगा था, के चानक उस का एक वफादार गुलाम अपने घोड़े से जस्त (कूदना) लगा कर सुल्तान शहाबुद्दीन गौरी! के घोड़े पर सुल्तान! के पीछे जा बैठा और देखते ही देखते घोड़े को भगाते हुए निगाहों से गाइब हो गया,

सुल्तान! की हालत देख कर इस की फौज बदज़न शाकिस्ता खातिर हो गई, और उसने मैदान छोड़ दिया, बचे खुचे मुस्लमान सिपाही लाहौर में जमा हुए, सुल्तान भी वहां कई हफ्ते ज़ेरे इलाज रहा, जब फायदा हुआ तो अपनी बाकी फौज के साथ शहर गज़नी चला गया, हिन्दूओं को लाहौर का रुख करने की जुरअत तो नहीं हुई लेकिन उस ने फ़तेह न होने के हौसले बड़ा दिए, और पिरथवी राज की ताकत और वकार में इज़ाफ़ा कर दिया, इस लड़ाई के बाद इसने किला सरहिंद का मुहासिरा कर लिया, किला, का हाकिम उस वक़्त क़ाज़ी ज़ियाउद्दीन तूलकी, वो एक निहायत बहादुर और बुलंद हिम्मत शख्स था, पिरथवी राज का ख़याल था के किला सरहिंद पर कब्ज़ा करना चंद दिन की बात है, लेकिन क़ाज़ी ज़ियाउद्दीन तूलकी और उस के गिनती के मुस्लमान साथियों ने डट कर मुकाबला किया, जब कई हफ्ते तक किला फ़तेह होने में नहीं आया तो पिरथवी राज मुहासिरे पर अपने लड़के गोला को छोड़ कर अजमेर चला आया, महसूरीन ने 13/ महीने के जान तोड़ मुकाबले के बाद मजबूरन किला खाली कर दिया, क्यों के इस अरसे में इन्हें किसी तरफ से कोई मदद ना पहुंचे।

दावते इस्लाम

शहर में क़याम ठहरने के बाद सरकार ख्वाजा गरीब नवाज़ रदियल्लाहु अन्हु! ने पिरथवी राज को मज़हबे इस्लाम कबूल करने की दावत भेजी, जिस का मज़मून ये था, ऐ संग दिल राजा तेरा ऐतिकाद जिन लोगों पर था, वो अल्लाह पाक के हुक्म से मुस्लमान हो गए, हैं, अगर अपनी बहबूदी (कामयाबी) चाहता है, तो तू भी मुस्लमान हो जा, वरना ज़लीलो ख्वार होगा, पिरथवी राज सरकार ख्वाजा गरीब नवाज़ रदियल्लाहु अन्हु! की दावते इस्लाम का कोई असर न हुआ, कासिद वापस आ गया, उस के बाद सरकार ख्वाजा गरीब नवाज़ रदियल्लाहु अन्हु! ने मुराकिबा किया, बड़ी देर तक ऑंखें बंद किए बैठे रहे फिर ऑंखें खोल कर फ़रमाया: अगर ये बदबख्त खुदा पर ईमान नहीं लाया तो इसे ज़िंदा गिरफ्तार कर के इस्लामी लश्कर के हवाले कर दूंगा, पिरथवी राज की हज़रत से दुश्मनी, पिरथवी राज का जब सरकार ख्वाजा गरीब नवाज़ रदियल्लाहु अन्हु! पर कोई बस न चला तो उसने मुसलमानो पर ज़ुल्म करना शुरू कर दिए, पिरथवी का एक दरबारी भी मुस्लमान हो गया था, पिरथवी राज ने उस को तरह तरह की सज़ा दी, उस दरबारी मुसलमान ने सरकार ख्वाजा गरीब नवाज़ रदियल्लाहु अन्हु! से दरख्वास्त की आप राजा, से मेरी शिफारिस कर दीजिए ताके मुसीबतों से निजात मिले, सरकार ख्वाजा गरीब नवाज़ रदियल्लाहु अन्हु! ने अपने एक खास कासिद के ज़रिए राजा के पास सिफारिशी पैगाम भेजा तो आग बगोला हो गया सरकार ख्वाजा गरीब नवाज़ रदियल्लाहु अन्हु! को बुरा भला कहने लगा,

सरकार ख्वाजा गरीब नवाज़ रदियल्लाहु अन्हु! का मुकाबला पिरथवी राज ने सेहरो साहिरी से किया, इस का अंजाम सिवाए शिकस्ते फाश के और कुछ न हुआ, शादी देओ (जो बाशिंदगाने अजमेर का एक मअबूद था) और जयपाल जोगी! दोनों मुस्लमान हो गए, और सैंकड़ों कुफ़्फ़ारो मुशरिकीन गैरमुस्लिम, सरकार ख्वाजा गरीब नवाज़ रदियल्लाहु अन्हु! की ज़िंदह करामात देख कर ईमान ले आए, सरकार ख्वाजा गरीब नवाज़ रदियल्लाहु अन्हु! के करीब जम्मेगफीर लगने लगा, रोज़बरोज़ मोतक़िदीन, मुहिब्बीन, आशिकी, और मुसलमानो की जमात में इज़ाफ़ा होने लगा, राज, दिल ही दिल में कुढ़ा करता था के इस फ़कीर! को अजमेर शरीफ से निकलना चाहिए किसी तरकीब से, हैरान था के क्या करूँ कोई तदबीर काम नहीं कर रही है, एक रोज़ पिरथवी राज किले पर खड़ा हुआ नज़ारा कर रहा था के सामने सदा बहार पहाड़ी पर, सरकार ख्वाजा गरीब नवाज़ रदियल्लाहु के इर्दगिर्द लोगों की बहुत बड़ी भीड़ लगी हुई है, पिरथवी राज ने इंतिहाई गुस्से की हालत में एक राजपूत सरदार को हुक्म दिया के पुलिस का एक दस्ता हमराह लेकर इस पूरे मजमे को गिरफ्तार कर के लाओ, और फ़कीर से कहो के कल तक अजमेर खाली कर दे, और तमाम शहर में ऐलान करा दिया, के इस ऐलान के बाद मुस्लमान फ़कीर के पास जाना सख्त मना है, जो शख्स इस हुक्म की खिलाफ़ वरज़ी करेगा उस को सख्त सज़ा दी जायेगी,

राजपूत सरदार ने सदाबहार पहाड़ी का मुहासिरा कर के तमाम मजमे को गिरफ्तार कर लिया और सरकार ख्वाजा गरीब नवाज़ रदियल्लाहु को राजा का हुक्म सुनाया के कल तक अजमेर शरीफ से निकल जाओ, राजपूत सरदार की ज़बान से राजा का हुक्म सुनकर सरकार ख्वाजा गरीब नवाज़ रदियल्लाहु ने फ़रमाया: के हम मखलूके खुदा के गमख्वारी के लिए आए हैं, राए पिथोरा, हमारे काम में क्यों दखल अंदाज़ होता है, राजा से कह देना के तीन दिन के अंदर मालूम हो जाएगा के अजमेर शरीफ से तू निकलता है या में,

सरकार ख्वाजा गरीब नवाज़ रदियल्लाहु अन्हु! रोज़ा से थे, आप के साथी हाज़रीन की गिरफ़्तारी आप को शाक दुशवार गुज़री, मगरिब तक मुसल्ले पर मुराकिब रहे, रोज़ा इफ्तार किया, नमाज़ से फारिग होकर फिर मुराकिब हो गए, अल्लाह पाक ने दौरे इस्तिब्दाद के खात्मे की बशारत दी, मुराकिबे से सर उठाया, मखलूक से दरयाफ्त करने पर फ़रमाया के: अल्लाह पाक ने पिरथवी राज के इख़्तियारात की बाग़ डोर शहाबुद्दीन गौरी! के हाथ में दे दी,

सरकार ख्वाजा गरीब नवाज़ रदियल्लाहु अन्हु! को शहर से बहार निकल जाने का हुक्म देने के अगले रोज़ पिरथवी राज किला पर ये देखने के लिए चढ़ा के सरकार ख्वाजा गरीब नवाज़ रदियल्लाहु अन्हु! यहाँ से चले गए या नहीं, गोगरा घाटी की तरफ से दो सांडनी सवार तेज़ी से आते दिखाई दिए, राजा पिरथवी राज, समझ गया, ये दोनों सवार खांडे राओ के कोई खास खबर ले कर आए हैं, राजा पिरथवी राज, को सरकार ख्वाजा गरीब नवाज़ रदियल्लाहु अन्हु! का देखना भी याद न रहा वो फ़ौरन ही उतर कर महल में आ गया, और कासिदों की आमद का इन्तिज़ार करने लगा, थोड़ी देर में इन दोनों कासिदों ने दरबार में राजा, की खिदमत में खांडे राओ, के खत के साथ सुल्तान शहाबुद्दीन गौरी! का ऐलान जंग पेश किया, राजा पिरथवी राज ने खत और ऐलान जंग पढ़ कर अपनी जंगी तैयारियां शुरू करदीं, हिंदुस्तान के तमाम हिन्दू राजाओं को इस ने अपनी मदद के लिए बुलाया सिवाए एक आध हिन्दू राजा के तमाम राजा अपनी अपनी फौज लेकर राजा पिरथवी राज, की मदद के ले चल पड़े,

तज़किरा निगारों ने लिखा है के: राजा पिरथवी राज और खांडे राओ की कोशिशों से थोड़े ही दिनों में तक़रीबन डेढ़ सौ राजा, अपनी फोजों के साथ पिरथवी राज के झंडे के नीचे जमा हो गए, राजा पिरथवी राज की फौज तीन लाख सवारों और तीन हज़ार जंगी हाथियों पर मुश्तमिल थी, बाज़ मुअर्रिख़ीन लिखते हैं के: राजा पिरथवी राज, डेढ़ लाख सवार, एक लाख पियादे, तीन हज़ार जंगी हाथी, और सौला हज़ार समाने जंग लाद कर सुल्तान सहाबुद्दीन गौरी! के मुकाबले के लिए आए थे,

राजा पिरथवी राज से दूसरी जंग

  1. जब सरकार ख्वाजा गरीब नवाज़ रदियल्लाहु अन्हु और राजा पिरथवी राज के दरमियान कश्मकश हो रही थी, सुल्तान शहाबुद्दीन गौरी! रहमतुल्लाह अलैह गज़नी में हिंदुस्तान पर दोबारा हमला कर ने की तय्यारी में मशगूल थे, सुल्तान शहाबुद्दीन गौरी! को तिरावड़ी या तराइन, की पहली जंग में शाकिस्त खाने से सख्त सदमा पंहुचा था, वो एक गय्यूर बुलंद हिम्मत और हस्सास बादशाह था, बुत्परस्तों के हाथों मुसलमानो की हज़ीमत को उस ने बुरी तरह महसूस किया, उसने कसम खाई के जब तक इस शिकस्त का बदला नहीं ले लूँगा आराम से नहीं बैठूंगा, यहाँ इस बात की वज़ाहत कर देना ज़रूरी है के सुल्तान शहाबुद्दीन गौरी! खुद पहली जंग से नहीं भागा था, बल्के एक खिलजी गुलाम उसे बेहोशी के आलम में मैदाने जंग से निकाल लाया था, सुल्तान! होश में होता तो मैदाने जंग से हटने के बजाए मर जाना कबूल करता, यही तवक्को उसे अपनी फौज से थी लेकिन सिवाए अफगान उमरा सरदार के दूसरे उमरा ने इस की पूरी तवक़्क़ोआत न की, इन में अक्सरियत गौर, ख़ालिज, और खुरासान, के लोगों की थी, इन उमरा के मैदाने जंग से फरार होने की वजह से आम सिपाही हौसला हार बैठे और मैदान राजा पिरथवी राज के हाथ रहा, साल भर तक सुल्तान शहाबुद्दीन गौरी! पूरी तेज़ी से दूसरे हमले की तय्यारी करता रहा, हत्ता के एक लाख बीस हज़ार के करीब मुसल्लह सवार इस के झंडे तले जमा हो गए।

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