हज़रत शैख़ अब्दुल वाहिद बिन ज़ैद रहमतुल्लाह अलैह की ज़िन्दगी

हज़रत शैख़ अब्दुल वाहिद बिन ज़ैद रहमतुल्लाह अलैह की ज़िन्दगी

तालीमों तरबियत

बानिए सिलसिलए ज़ैदिया, ज़ुबदऐ औलिया, जामिउल बरकात, साहिबे कशफो करामात, सरापा फ़ैज़ो बरकत, शैखुल इस्लाम वल मुस्लिमीन, हज़रत शैख़ अब्दुल वाहिद बिन ज़ैद रहमतुल्लाह अलैह! मुल्के ईरान के शहर बसरा! के बाशिंदे थे, ज़ाहिरी इल्मो फुनून में कामिल दस्तगाह रखते थे, आप रहमतुल्लाह अलैह ने हज़रते सय्यदना इमामे आज़म अबू हनीफा रदियल्लाहु अन्हु से भी शरफ़े तलम्मुज़ शागिर्दी का शरफ़ हासिल किया था, हज़रत शैख़ अब्दुल वाहिद बिन ज़ैद रहमतुल्लाह अलैह अनफ़वाने शबाब ही से ज़ुहदो वरा, तकवाओ तदय्युन की तरफ माइल हो गए थे, मगर आम लोगों की तरह कारोबारी ज़िन्दगी में मसरूफ रहते थे,

इन्क़िलाबे ज़िन्दगी

हज़रत शैख़ अब्दुल वाहिद बिन ज़ैद रहमतुल्लाह अलैह! ने एक गुलाम खरीदा उसे हिदायत दी थी, के रात के वक़्त हाज़िर रहे और खिदमत करे, एक मर्तबा जब रात हुई उसे तलाश किया कहीं पता ना चला सुबह के वक़्त गुलाम आया और उस ने ख्वाजा के हाथ में एक दीनार दिया, जिस पर बादशाह की मुहर के बजाए सूरह इखलास मरकूम थी, उसने अर्ज़ की अगर मुझे रात में यूं ही रुखसत दी जाए तो हर रात के एवज़ एक एक दीनार आप को देता रहूँ गा, आप रहमतुल्लाह अलैह ने शर्त कबूल करली, और एक ज़माना इसी तरह गुज़र गया, रात में गुलाम गाइब रहता, सुबह को आता और एक दीनार आप रहमतुल्लाह अलैह को देता किसी दिन हासिदो ने आप रहमतुल्लाह अलैह से कहा के ये गुलाम रात के वक़्त कफ़न चुराता है, इस लिए रात के वक़्त इसे भेजना मुनासिब नहीं है,

हज़रत शैख़ अब्दुल वाहिद बिन ज़ैद रहमतुल्लाह अलैह! ने फ़रमाया आज की शब् में इस का इम्तिहान लूँगा, जब रात में गुलाम ने आप रहमतुल्लाह अलैह के मकान से कदम बाहर निकाला आप रहमतुल्लाह अलैह ने भी इस का तअक्कुब किया, यहाँ तक के दोनों शहर से बाहर निकल गए कुछ फासले पर एक कब्रिस्तान आ गया गुलान ने वहां अपना लिबास उतार दिया, और टाट का लिबास पहिंन कर नमाज़ में मसरूफ हो गया, सुबह तक नमाज़ पढता रहा, नमाज़ के बाद उस ने आस्मान की तरफ हाथ उठा कर दुआ की इलाही मेरे ख्वाजा का हक शबीना मुझे अता फरमा, उसी वक़्त एक दीनार फ़िज़ा से ज़मीन पर गिरा गुलाम ने उठा लिया, और चल पड़ा, यहाँ तक के ख्वाजा! की निगाहों से ओझल हो गया, और इन्होने राहगीरों से अपने शहर का रास्ता दरयाफ्त किया, उन्होंने बताया के यहाँ से तुम्हारा शहर बसरा दो साल की मुसाफत पर है, ये सुनकर ख्वाजा! मज़ीद हैरतो इस्तेजाब में डूब गए, हस्बे मामूल दूसरी रात गुलाम उस मकाम पर आया और इबादते इलाही में मसरूफ हो गया, सुबह के वक़्त हस्बे साबिक दीनार ऊपर से गिरा, गुलाम ने उसे ले लिया, ख्वाजा! के हाथ में देते हुए कहा के ये दो रात की खिदमत का सिला है,

ख्वाजा! को एहसास हो चुका था, के ये गुलाम कोई आम आदमी नहीं है, इसे गुलामी से आज़ाद कर देना चाहिए, चुनांचे उससे कहा के में ने तुझ को आज़ाद कर दिया, ये सुनकर गुलाम ने ज़मीन से संगरेज़े उठाए और ख्वाजा के दामन में डालते हुए कहा के ये मुझे आज़ाद करने का सिला है और वहां से चल पड़ा, ख्वाजा भी उस के पीछे पीछे चल पड़े और चंद लम्हे बाद अपने शहर पहुंच गए और जब अपने घर पहुंचे गुलाम नज़र से गायब हो गया, उन्होंने जब गुलाम के दिए हुए संगरेज़ों को गौर से देखा तो वो बेशकीमत जवाहिरात थे, उन तमाम जवाहिरात को फरोख्त कर के राहे खुदा में लुटा दिया और तारिकुद दुनिया हो कर इबादतों रियाज़त मुजाहिदा में मसरूफ हो गए, ये वाकिया आप की ज़िन्दगी में रूहानी इन्किलाब का सबब बना, चालीस साल तक दरसो तदरीस के मुश्किल कठिन मराहिल तय करते रहे।

बैअतो खिलाफत

हज़रत शैख़ अब्दुल वाहिद बिन ज़ैद रहमतुल्लाह अलैह! क़ुत्बे वक़्त हज़रत ख्वाजा हसन बसरी रहमतुल्लाह अलैह के दामने फैज़ से वाबस्ता हुए और उन के दस्ते हक परस्त पर बैअत हुए, मुर्शिदे करीम के आसतानए करम से वाबस्ता होने के बाद अपना सारा माल राहे खुदा में लुटा दिया, गोशए उज़लत इख्तियार करली, और पूरे तौर पर यादे इलाही में मसरूफ हो गए, रूपए पैसे को हाथ न लगाते किसी फ़कीर व मुहताजी को दिरहमों दीनार देने पड़ते तो बाद में इस शिद्दत के साथ अपने हाथों को धोते के वो छिल जाते फ़रमाया करते, खुदा न करे के कोई दुर्वेश अपने हाथ में दिरहम ले कर अपने हम चश्मों में ज़लीलो ख्वार हो दुर्वेश को खाली हाथ खाली पेट और खाली जेब होना ज़रूरी है, अगर ऐसा नहीं तो वो दुर्वेश नहीं है, पीरो मुर्शिद ने हज़रत शैख़ अब्दुल वाहिद बिन ज़ैद रहमतुल्लाह अलैह! को खिरकए खिलाफत अता किया, फिर आप मुर्शिदे कामिल की इजाज़त से सज्जादए रुश्दो हिदायत पर मुतमक़्क़िन हुए, और खल्के खुदा की रहनुमाई फरमाने लगे, क़ुत्बे वक़्त हज़रत ख्वाजा हसन बसरी रहमतुल्लाह अलैह के अलावा आप ने हज़रत ख्वाजा कुमैल बिन ज़ियाद रहमतुल्लाह अलैह से भी खिरकए खिलाफत! हासिल किया था, जो हज़रते अली मुश्किल कुशा शेरे खुदा हैदरे कर्रार रदियल्लाहु अन्हु के खलीफा थे, नीज़ आप ने हज़रते ख्वाजा हबीब अजमी रहमतुल्लाह अलैह से भी फैज़ हासिल किया था।

आप की तवाज़ो इंकिसारी

तरके माल और तरके दुनिया के बावजूद अहलुल्लाह बुज़ुर्गों की ज़ियारत के लिए बुज़ुर्गों से मिलते आम लोगों से भी राहो रस्म रखते कोई आप की खिदमत में आता तो ताज़ीम करते सलाम करने में सबक़त पहिल करते, और फरमाते थे जो शख्स किसी से मुहब्बत करता है, हज़रत शैख़ अब्दुल वाहिद बिन ज़ैद रहमतुल्लाह अलैह! इससे तअल्लुक़ रखने वालों की भी इज़्ज़त करता है तुम बन्दगाने खुदा हो मुझे अल्लाह पाक से मुहब्बत है फिर में तुम्हारी इज़्ज़त क्यों करूँ।

कशफो करामात

हूर से निकाह करता है

हज़रत शैख़ अब्दुल वाहिद बिन ज़ैद रहमतुल्लाह अलैह! ने एक दिन अपने वाइज़ में फ़रमाया जो शख्स अपने साज़ो सामान और इमलाको जायदाद राहे हक में खर्च करता है, अल्लाह पाक जन्नत में उसको बुलंद दर्जा आता करता है, और “ऐनुल मर्ज़िया” नामी हूर से इस की तजवीज़ (निकाह) फरमाता है बल्कि वो दुनिया ही में वो मकाम जो उस के लिए जन्नत में मुकर्रर हुआ और उस को हूर जो उस की ज़ौजाह होगी अपनी ज़ाहिरी आँखों से देखता है,

ये सुनकर एक शख्स मजलिस से उठा और उसने कहा के में अपना सारा मालो असबाब राहे खुदा में देता हूँ, आप ने इरशाद फ़रमाया जा कर अपना सारा मालो असबाब राहे खुदा में लुटा दो फिर मेरे पास आओ, वो शख्स घर गया और अपना सारा मालो असबाब राहे खुदा में में लुटा दिया फिर खिदमत में हाज़िर हुआ आप ने उसे इस्मे आज़म! की तालीम दी और उसे मुराकिबा में मशगूल कर दिया, उस ने ऐन मुराकिबा में देखा के एक इंतिहाई दिलकश बाग़ है और उस में एक बुलंद कस्र (महल) है जो मरवारेद से बना हुआ है, महल के सेहन में एक हूर जिस का हुसनो जमाल, ब्यान नहीं हो सकता, तख्ते ज़र्रीं पर बैठी हुई है, इस शख्स ने जब हूर को देखा उस पर आशिक हो गया उसने हाथ बढ़ा कर अपनी आगोश में लेना चाहा उस हूर ने कहा में तेरी ज़ौजाह (बीवी) हूँ और तू मेरा शोहर है, लेकिन मेरे और तेरे वस्ल मिलने में सिर्फ एक पहर का फासला है, परेशांन होने की ज़रूरत नहीं, जब वो बेदार हुआ अपनी महबूबा को करीब ना पा कर हैरानो मुज़्तरिब हुआ, मुर्गे बिस्मिल की तरह तड़पने लगा, आप ने जब उसे इस हाल में देखा फ़रमाया, ये इज़्तिराब कैसा है, दरसअल तुम दोनों के मिलने में एक पहिर का फासला बाकी है, मुत्मइन रहो, मुराद को पहुंचोगे,

उसी दौरान कुफ्फार का लश्कर इसी शहर पर हमला आवर हुआ और मुस्लमान शहर से बाहर निकले वो शख्स भी इस्लामी लश्कर के साथ जंग में शरीक हुआ, और उसी दिन शहीद हुआ, आप ने जब उस की खबरे शहादत सुनी तशरीफ़ ले गए, और अपने हाथ मुबारक से उस की तज्हीज़ो तद्फीन की और उस के हक में दुआए खेर फ़रमाई।

दरिया खुश्क हो गया

एक दिन हज़रत शैख़ अब्दुल वाहिद बिन ज़ैद रहमतुल्लाह अलैह! दरियाए दजला के किनारे तशरीफ़ ले गए लोगों की एक जमात दरिया पार करने के लिए कश्ती पर सवार हो रही थी, मल्लाह ने उजरत अदा कर ने वालों को तो कश्ती पर सवार किया, मगर फुकरा की एक जमात जो उजरत अदा ना कर सकी उन्हें दरिया के किनारे छोड़ कर कश्ती रवाना करदी, ये लोग दिल शाकिस्ता साहिल पर हैरानो परेशान खड़े रहे हज़रत शैख़ अब्दुल वाहिद बिन ज़ैद रहमतुल्लाह अलैह! को इन तबाह हाल लोगों पर रहिम आया और उन्होंने उन से कहा, तुम लोग गम न करो मेरी जानिब से दरिया से कहो के अब्दुल वाहिद! तुझे हुक्म देता है के तू खुश्क हो जा, लोगों ने हज़रत शैख़ अब्दुल वाहिद बिन ज़ैद रहमतुल्लाह अलैह! का पैगाम दरिया को पहुंचाया देखते ही देखते दरिया का पानी ख़त्म हो गया और गम ज़दा मिस्कीनों ने दरिया में कदम रखा और आसानी के साथ दरिया पार कर गए।

गुरबा मसाकीन खुशहाल हो गए

एक दिन कुछ मिस्कीन हज़रत शैख़ अब्दुल वाहिद बिन ज़ैद रहमतुल्लाह अलैह! की खिदमत में हाज़िर हुए, और उन्होंने अपनी मफ्लूकुल हाल गरीबी और अहलो अयाल की फाका कशी का तज़किरा करते हुए मदद तलब की, आप ने इरशाद फ़रमाया, अच्छा है आज तुम्हारे घरों में रिज़्क़ पहुंच जाएगा, इत्मीनान रखो, फुकरा अपने अपने घर गए, और देखा के उनके घरों में किस्म किस्म के लज़ीज़ खाने तय्यार हो रहे हैं, घर वालों से पूछा के ये दौलत कहाँ से आई उन्होंने जवाब दिया, आज हमारे पास एक शख्स आया उसने हमको बेशुमार दीनार दिए, और ये कहाँ ये दौलत शैख़ अब्दुल वाहिद! ने भेजी है, तुम इसे खर्च करो चुनांचे उस ने ये मालो ज़र हमारे दिया है, और चला गया, ये फुकरा खुश हाल हो गए, और अच्छी ज़िन्दगी बसर करने लगे, उनकी बीविया अक्सर कहा करती अफ़सोस है के एक मर्दे कामिल पा कर के, हमने दुनियावी दौलत पर इक्तिफा किया, हालांके हमें तो दींन की दौलत चाहिए थी, जो पाइदार हमेशा रहे।

फुकरा की हलवा की ख्वाइश पूरी करना

एक दफा हज़रत शैख़ अब्दुल वाहिद बिन ज़ैद रहमतुल्लाह अलैह! की मजलिस में चंद फुकरा हाज़िर हुए जो काफी भूके थे, उन्होंने हलवा खाने की ख्वाइश ज़ाहिर की के हलवा खाने को मिल जाए तो अच्छा हो, और हाल ये था के हज़रत के पास कुछ भी नहीं था, जब दुरवेशों का इसरार बड़ा तो आप ने असमान की तरफ रुख कर के अल्लाह पाक से इस जमात की ख्वाइश के लिए दुआ फ़रमाई, दुआ करते ही असमान से सुर्ख दीनारों की बारिश शुरू हुई, हज़रत ने फ़रमाया, हलवे के लिए जितने दीनार दरकार हों ले लो, और हलवा खरीद लाओ, हलवा लाया गया, और तमाम फुकरा ने शिकम सेर हो कर हलवा खाया मगर हज़रत ने उसे हाथ तक नहीं लगाया, फुकरा के साथ हलवा तनावुल न फरमाने का सबब ये था के हलवा चूंके आप की करामत के ज़रिये से हासिल हुआ, दीनार से खरीदा गया आप ने गवारा न किया जो चीज़ करामत से हासिल हो, उसे बतौरे ग़िज़ा इस्तेमाल करें क्यों के आप उन मशाइख से थे जो अपनी मेहनतों मशक्कत से रोज़ी हासिल करते थे,

दुआ कबूल हो गई

हज़रत शैख़ अब्दुल वाहिद बिन ज़ैद रहमतुल्लाह अलैह! एक बार किसी सहरा में तशरीफ़ ले जा रहे थे, देखा के एक बूढ़ा ज़ईफ़ धूप में पड़ा हुआ है, उठने की ताकत नहीं है, आप ने बदल को इशारा किया वो इस बूढ़े पर साया फ़िगन हो गया, इस बूढ़े ने जब ये मंज़र देखा रोकर अर्ज़ की हुज़ूर आप दुआ फ़रमादें के में तंदुरुस्त हो जाऊं आप ने हाथ उठा कर दुआ फ़रमाई, वो बूढ़ा फ़ौरन तंदुरुस्त हो गया और खुद ही उठ कर चला गया,

ईशा के वुज़ू से फजर की नमाज़

साहिबे मिरातुल असरार! लिखते हैं के आप के करामातों कमलातो बेशुमार हैं, आप मुरीदों की तरबियत में कामिल दस्तरस रखते थे, रियाज़तो मुजाहिदा, तरको तजरीद, और ज़ोको इश्क में बेनज़ीर थे, हज़रत इमाम अब्दुल्लाह याफ़ई रहमतुल्लाह अलैह ने तारीखे याफ़ई! में लिखा है के आप ने चालीस साल तक ईशा के वुज़ू से फजर की नमाज़ अदा की,

आप के खुलफाए किराम

हज़रत शैख़ अब्दुल वाहिद बिन ज़ैद रहमतुल्लाह अलैह! से फैज़ पाने वाले इरादत मंदों और मुरीदों की तादाद काफी है, आप के नामवर खुलफ़ा तीन हुए हैं, (1) हज़रत ख्वाजा फ़ुज़ैल बिन अयाज़, (2) हज़रत ख्वाजा अबुल फ़ज़्ल बिन जरीं, (3) ख्वाजा अबू इसहाक मूसा रहमतुल्लाह अलैहिम, हज़रत शैख़ अब्दुल वाहिद बिन ज़ैद रहमतुल्लाह अलैह! का वक्ते आखिर आया तो आप ने वो खिरकए खिलाफत जो हज़रत ख्वाजा हसन बसरी रहमतुल्लाह अलैह से हासिल किया था, हज़रत ख्वाजा फ़ुज़ैल बिन अयाज़ रहमतुल्लाह अलैह को अता फ़रमाया, और दूसरा खिरकए खिलाफत जो हज़रत ख्वाजा कुमैल बिन ज़ियाद रहमतुल्लाह अलैह से हासिल किया था, हज़रत अबू याकूब सूसी रहमतुल्लाह अलैह को आता किया, और ये दो सिलसिले इन दोनों बुज़ुर्गों से जारी हुए, हज़रत शैख़ अब्दुल वाहिद बिन ज़ैद रहमतुल्लाह अलैह! से आलमे इस्लाम में सिलसिलए ज़ैदिया! की नशरो इशाअत हुई, ये सिलसिला हज़रत ख्वाजा हसन बसरी रहमतुल्लाह अलैह के वास्ते से अमीरुल मोमिनीन हज़रते अली शेरे खुदा रदियल्लाहु अन्हु तक पहुँचता है,

वफ़ात

हज़रत शैख़ अब्दुल वाहिद बिन ज़ैद रहमतुल्लाह अलैह! के उमर के आखरी अय्याम में फालिज की बीमारी का असर हुआ और इसी बिमारी में आप की वफ़ात हुई, 27/ सफारुल मुज़फ्फर 177/ हिजरी में।

मज़ार

आप रहमतुल्लाह अलैह का मज़ार मुबारक: मुल्के ईराक के शहर बसरा में मरजए खलाइक है,

“अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त की उन पर बेशुमार रहमत हो और उन के सदके में हमारी मगफिरत हो”

रेफरेन्स हवाला

मिरातुल असरार
कशफ़ुल महजूब
ख़ज़ीनतुल असफिया
मशाइखे इज़ाम जिल्द अव्वल
सीयरुल अक्ताब
तज़किरतुल औलिया

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