विलादत शरीफ
मुर्शिदे हज़रत ख्वाजा गरीब नवाज़, क़ुत्बुल अक्ताब, नासिरुल इस्लाम, आरिफ़े असरारे रहमानी, वासिले बिल्लाह, साहिबे कशफो करामात, साहिबे शरीअतो तरीकत, सय्यदुल औलिया, नाज़िशे चश्तिया, पीरे लासानी, क़ुत्बे रब्बानी, माहताबे चिश्तियत, हज़रत ख्वाजा उस्मान हारूनी रहमतुल्लाह अलैह! की विलादत बसआदत 13/ रमज़ानुल मुबारक 500/ हिजरी बा मुताबिक 1107/ ईसवी को मुल्के ईरान, के शहर निशापुर, के मशहूर क़स्बा हारुन, या हारवनी में हुई, आप अलैहिर रहमा क़स्बा हारुन, की वजह से हारूनी कहलाते हैं।
इस्मे गिरामी
आप अलैहिर रहमा का इस्मे गिरामी “उस्मान” कुन्नियत “अबुन नूर” ही,
तहसीले इल्म
हज़रत ख्वाजा उस्मान हारूनी रहमतुल्लाह अलैह! ने इब्तिदाई तालीमों तरबियत अपने वालिद माजिद से हासिल की फिर मज़ीद आला तालीम के लिए मुल्के ईरान के शहर निशापुर! तशरीफ़ ले गए, और वहां के मश्हूरो मारूफ जय्यद उल्माए किराम से इल्मे ज़ाहिरी और इल्मे बातनी की आला तालीम हासिल की, चूंके आप अलैहिर रहमा का खानदान उम्दा तहज़ीबो तमद्दुन का गहवारा और इल्म दोस्त था, और आप अलैहिर रहमा के वालिद माजिद भी जय्यद आलिमे दीन थे, इस लिए शऊर की दहलीज़ पर कदम रखते ही इल्म की तरफ रागिब हो गए और वालिद माजिद की बारगाह में रहकर इब्तिदाई तालीम हासिल की, कुरआन शरीफ, का हिफ़्ज़ किया, फिर आला तालीम के लिए उस ज़माने के इल्मी व फन्नी मरकज़ी शहर “निशापुर” का रुख किया और वक़्त के मशहूर उल्माए किराम से इक्तिसाबे इल्म कर के जुमला उलूमो फुनून में दस्तरस (काबिलीयत, महारत) हासिल की, जल्द ही आप का शुमार वक़्त उल्माए किराम में होने लगा।
इबादतों रियाज़त
हज़रत ख्वाजा उस्मान हारूनी रहमतुल्लाह अलैह! ने अपनी उमर के सत्तर साल इबादतों रियाज़त में गुज़ारे इस तवील मुद्दत में न तो इन्होने कभी पेट भर कर रोटी खाई न रात को सोये मुसलसल कई कई दिन तक रोज़े रखते थे, रोज़ाना रात दिन इबादते इलाही में मशगूल रहते थे, कुरआन शरीफ कसरत से पढ़ते थे, रोज़ाना एक या दो कुरआन शरीफ ख़त्म करते थे, कसरते इबादतों रियाज़त मुजाहिदा की बदौलत ज़बरदस्त रूहानी कुव्वत हासिल हो गई, और अपने ज़माने के अज़ीम औलियाए किराम में आप का शुमार होता था, अपने मुर्शिद के साथ में तनहा भी सियाहत करते थे।
बैअतो खिलाफत
हज़रत ख्वाजा उस्मान हारूनी रहमतुल्लाह अलैह! हज़रत ख्वाजा शैख़ हाजी शरीफ ज़न्दनी रहमतुल्लाह अलैह! के दस्ते हक परास्त पर शरफ़े बैअत मुरीदी से मुशर्रफ हुए, और गियारह ज़ीकाइदा बरोज़ पीर बाद नमाज़े ज़ोहर 555/ हिजरी में हज़रत ख्वाजा शैख़ हाजी शरीफ ज़न्दनी रहमतुल्लाह अलैह! ने खिरकए खिलाफत अता किया।
सीरतो अख़लाक़
हज़रत ख्वाजा उस्मान हारूनी रहमतुल्लाह अलैह! अक्सर औकात सफर में रहते थे, और गायत तजरीदो तफ़रीद में बसर करते थे, आप अलैहिर रहमा अपने ज़माने के तमाम मशाइख़ीन की सुहबत पाई, आप अलैहिर रहमा हर फन में यकताए ज़माना थे, आप अलैहिर रहमा का तसर्रुफ़ निहायत कवी था, आप अलैहिर रहमा के कमालात का इस बात से अंदाज़ा लगाया जा सकता है, के नाइबुन नबी फिल हिन्द अतयाए रसूल ख्वाजाए खाजगान हज़रत ख्वाजा गरीब नवाज़ चिश्ती रहमतुल्लाह अलैह! जैसे अज़ीम वलिये कामिल आप के मुरीद! हैं, और आप अलैहिर रहमा ने सत्तर साल तक मुजाहिदा किया और कभी सेर हो कर खाना नहीं खाया, और न पानी पिया, चार पांच दिनों के बाद पांच लुक़मे खाते थे, आप अहले दुनिया से बेज़ार थे, और हाफिज़े कुरआन शरीफ थे, एक कुरआन शरीफ दिन में और एक रात में ख़त्म करते थे, आप की नज़र में वो असर था, के जो शख्स आप का मंज़ूरे नज़र होता, और फ़ौरन कमाल के दर्जे को पहुंच जाता, और आप साहिबे सिमआ थे और दौराने सिमआ रिक़्क़त और गिर्योज़ारी करते और नारे लगाते थे।
लड़का घर पहुंच गया
एक मर्तबा एक शख्स हज़रत ख्वाजा उस्मान हारूनी रहमतुल्लाह अलैह! की खिदमत में हाज़िर हुआ और अर्ज़ की या सय्यदी मुर्शिदी मेरा बेटा चालीस साल से मफ्कूदुल खबर (खोया हुआ, गायब) है, काफी तलाश किया मगर अभी तक नहीं मिला, कुछ आप नज़रे करम फरमाएं उसकी ज़िन्दगी का पता है ना मौत का, हम हर वक़्त उसकी आतिशे फिराक में जलते रहते हैं, आप अलैहिर रहमा को उस शख्स की हालत पर रहिम आया, आप अलैहिर रहमा ने उस के हक में दुआ की, और हाज़रीने मजलिस से फ़रमाया, के वो भी इस के लिए दुआ करें, जब सब लोग दुआ से फारिग हो गए, तो आप अलैहिर रहमा ने फ़रमाया: जा तेरा बेटा घर आ गया है, ग़मज़दाह बाप के दिल की कली खिल गई, भागा हुआ घर पंहुचा तो उस का बेटा घर पर मौजूद था, फरते मसर्रत से बे खुद हो गया और बेटे को गले से लगा लिया, और आप अलैहिर रहमा का शुक्रिया अदा किया, हाज़रीन ने लड़के से पुछा के तू कहाँ था? उसने बताया के मुझे जिन्नात पकड़ कर ले गए थे, और एक जज़ीरे में कैद कर दिया था, आज यकायक इन बुज़रुग हज़रत ख्वाजा उस्मान हारूनी रहमतुल्लाह अलैह! को में ने इस जज़ीरे में देखा इन्होने मुझ से फ़रमाया, अपनी ऑंखें बंद करो, और अपना पाऊ मेरे पाऊं पर रखो में ने ऐसा ही किया चंद ही लम्हों के बाद मुझे हुक्म मिला के ऑंखें खोलो, में ने ऑंखें खोलीं तो में ने अपने आप को अपने घर में पाया।
दरिया पार कर लिया
नाइबुन नबी फिल हिन्द, अताये रसूल, सुल्तानुल हिन्द, ख्वाजाए ख्वाजगान, हज़रत ख्वाजा गरीब नवाज़ मुईनुद्दीन चिश्ती रहमतुल्लाह अलैह फरमाते हैं के में और हज़रत ख्वाजा उस्मान हारूनी रहमतुल्लाह अलैह! सेरो सियाहत करते हुए दरिया के किनारे पहुंचे तो वहां पर कोई कश्ती मौजूद नहीं थी, और दरिया पार करने की कोई सूरत ना थी, में परेशान हुआ, अचानक हज़रत ख्वाजा उस्मान हारूनी रहमतुल्लाह अलैह! ने मुझ से मुख़ातब हो कर फ़रमाया के ऐ मोईनुद्दीन चिश्ती! अपनी ऑंखें बंद कर लो, में ने हस्बे इरशाद ऑंखें बंद कर लीं, एक लम्हे बाद आप ने फ़रमाया ऑंखें खोल दो में ने ऑंखें खोलीं तो अपने आप को दरिया के पार दूसरे किनारे पर खड़ा पाया।
आतिश परिस्तों ने इस्लाम कबूल कर लिया
मन्क़ूल: है के एक दिन हज़रत ख्वाजा उस्मान हारूनी रहमतुल्लाह अलैह! एक ऐसी जगह पहुंचे जहाँ आतिश परिस्तों की बस्ती थी वहां एक आतिश कदा (आग का घर) था, जिस की आग किसी दिन भी सर्द नहीं हुई थी, आप अलैहिर रहमा ने लोगों से कहा के तुम लोग खुदा की परिस्तिश क्यों नहीं करते, जिस ने इस आग को पैदा किया है, उन्होंने जवाब दिया के हमारे मज़हब में आग को बड़ा माना गया है, आप अलैहिर रहमा ने फ़रमाया क्या तुम अपने हाथ पाऊं को आग में डाल सकते हो, उन्होंने कहा के आग का काम जलाना है ये किस की मजाल है के इस के करीब भी जाए, ये बात सुनकर आप अलैहिर रहमा ने एक बच्चा जो एक आतिश परस्त की गोद में था उस को लिया, और बच्चे समीत आग में कूद गए और चार घंटे के बाद बाहर आए, ना तो आप का खिरका आग से जला और नाही बच्चे पर आग का कोई असर हुआ, आप अलैहिर रहमा की ये करामत देख कर तमाम आतिश परस्त मुसलमान हो गए ईमान ले आए, और आप की मुरीदी में शामिल हो गए, आप अलैहिर रहमा ने उनके सरदार का नाम अब्दुल्लाह और उस छोटे बच्चे का नाम इब्राहीम रखा।
उस की गर्दन टूट गई
हज़रत ख्वाजा उस्मान हारूनी रहमतुल्लाह अलैह! का एक मुरीद परेशानी के आलम में बैठा हुआ था, आप अलैहिर रहमा ने पूछा क्या बात है तुम परेशान क्यों हो, मुरीद ने अर्ज़ की हुज़ूर मेरा एक पड़ौसी है जिस ने मेरे मकान से ऊंचा मकान तामीर कर लिया है जिससे मेरी बेपर्दगी और परेशानी होती है, उससे कई बार कहा मगर वो कुछ परवाह ही नहीं करता, में इस वजह से परेशान हूँ, आप अलैहिर रहमा ने फ़रमाया के उसे मालूम नहीं के तुम हमारे साथ तअल्लुक़ रखते हो, मुरीद ने अर्ज़ की हुज़ूर इस बात का उसे इल्म है के में आप का गुलाम हूँ, ये सुनते ही आप अलैहिर रहमा ने फ़रमाया के वो मकान से गिर क्यों नहीं जाता उस की गर्दन टूट क्यों नहीं जाती, इस के बाद आप अलैहिर रहमा खामोश हो गए और मजलिस से उठ कर घर चले गए, तमाम हाज़रीन भी वापस अपने अपने घर चले गए, जब ये मुरीद वापस अपने घर की तरफ पंहुचा तो रास्ते में सुना के उसका पड़ौसी मकान से गिर कर मर गया है और इस की गर्दन टूट गई, है।
मेरे इस मुरीद को बख्श दे
नाइबुन नबी फिल हिन्द, अताये रसूल, सुल्तानुल हिन्द, ख्वाजाए ख्वाजगान, हज़रत ख्वाजा गरीब नवाज़ मुईनुद्दीन चिश्ती रहमतुल्लाह अलैह फरमाते हैं है के मेरे एक पीर भाई का इन्तिकाल हो गया वो मेरा हमसाया भी था, जब उसे दफ़न कर चुके तो तमाम लोग मेरे अलावा वापस आ गए, में उसकी कब्र पर बैठ कर तिलावत ज़िक्रे इलाही करने लगा, उसी वक़्त फ़रिश्ते जवाब में “तेरा रब कौन है? तेरा दीन क्या है? पूछने के लिए कब्र में आए, उसी वक़्त मेरे पीरो मुर्शिद हज़रत ख्वाजा उस्मान हारूनी रहमतुल्लाह अलैह! भी कब्रिस्तान में तशरीफ़ ले आए, और अल्लाह पाक की बारगाह में दुआ की या इलाही मेरे इस मुरीद को बख्श दे, इससे बेशक गुनाह सरज़द हुआ हैं, लेकिन इस ने मेरा दामन थामा था, अल्लाह पाक ने आप अलैहिर रहमा की दुआ कबूल फ़रमाई और फरिश्तों को हुक्म हुआ के इस शख्स को छोड़ दो, में ने इस को अपने दोस्त के तुफैल बख्श दिया।
हज़रत ख्वाजा उस्मान हारूनी रहमतुल्लाह अलैह! के चार खुलफ़ा थे, (1) नाइबुन नबी फिल हिन्द, अताये रसूल, सुल्तानुल हिन्द, ख्वाजाए ख्वाजगान, हज़रत ख्वाजा गरीब नवाज़ मुईनुद्दीन चिश्ती रहमतुल्लाह अलैह (2) हज़रत ख्वाजा नजमुद्दीन सुगरा रहमतुल्लाह अलैह (3) हज़रत शैख़ सअद गंगोही रहमतुल्लाह अलैह (4) हज़रत ख्वाजा शैख़ मुहम्मद तुर्क नारनूली रहमतुल्लाह अलैह, आप का मज़ार शरीफ हरयाना के क़स्बा नारनूल में है।
मुर्शिद की इनायात
जिस दिन हज़रत ख्वाजा उस्मान हारूनी रहमतुल्लाह अलैह! को खिरकए खिलाफत मिला तो आप अलैहिर रहमा के पीरो मुर्शिद ने कुलाहे चार तुर्की! (टोपी) भी आप अलैहिर रहमा के सर पर रखी और फ़रमाया के इस चार तुर्की कुलाह से मुराद चार चीज़ों को तर्क कर देना है:
(1) तरके दुनिया,
(2) तरके उक़्बा यानि अल्लाह की ज़ात के सिवा कोई भी मक़सूद न हो,
(3) तर्क खाना पीना, इससे मुराद कम खाना और कम सोना है,
(4) तरके ख्वाइशे नफ़्स यानि जो कुछ नफ़्स कहे इस के खिलाफ किया जाए।
विसाल
आप रहमतुल्लाह अलैह! का विसाल 5/ शव्वाल 617/ हिजरी को हुआ।
मज़ार
आप रहमतुल्लाह अलैह का मज़ार मुबारक: मुल्के मुल्के सउदिया अरबिया के मश्हूरो मअरूफ़ शहर मक्का शरीफ में में मरजए खलाइक है।
“अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त की उन पर बेशुमार रहमत हो और उन के सदके में हमारी मगफिरत हो”
रेफरेन्स हवाला
मिरातुल असरार
सीयरुल अक्ताब
ख़ज़ीनतुल असफिया
सवानेह शैखुल आलम
सफ़िनतुल औलिया,
सीयरुल औलिया
साबरी इंसाइकिलोपीडिया

