हज़रत ख्वाजा हुबैरा बसरी रहमतुल्लाह अलैह की हालाते ज़िन्दगी

हज़रत ख्वाजा हुबैरा बसरी रहमतुल्लाह अलैह की हालाते ज़िन्दगी

विलादत बसआदत

हज़रत ख्वाजा हुबैरा बसरी रहमतुल्लाह अलैह! का लक़ब अमीनुद्दीन! था, आप रहमतुल्लाह अलैह अकाबिर उल्माए किराम व मशाईखिने इज़ाम में से थे, सूफ़ियाए किराम आप को ताजुल आरफीन, नासिरे शरीअत, इमामे तरीकत, हुज्जतुल असफिया, के क्लब से याद करते हैं, आप की विलादत मुल्के ईराक के मशहूर शहर इराक, में हुई,

रोज़ाना दो कुरआन शरीफ ख़त्म करना

हज़रत ख्वाजा हुबैरा बसरी रहमतुल्लाह अलैह! ने एक सौ बीस साल की हयात पाई, आप ने सतराह 17/ साल की उम्र में उलूमे ज़ाहिरी में माहिर हो गए थे, और अपने वक़्त के उल्माए किराम, और दानिशमंदों में शुमार होते थे, कुरआन शरीफ हिफ़्ज़ किया, और उलूमे दीनिया में महारत हासिल की, और आप रोज़ाना दो कुरआन शरीफ ख़त्म करते थे, कभी बे वुज़ू नहीं रहते थे, तीस साल तक शदीद रियाज़तो मुजाहिदा में मशगूल रहे, ख़ौफ़े खुदा से रोते और अर्ज़ करते ऐ अल्लाह! बेचारा हुबैरा तेरी राह पर गामज़न है और तमाम शाकिस्ता दिली के बावजूद उस ने तुझ से दिल लगाया है, इस को बख्श दे और रहिम फरमा।

बैअतो खिलाफत

एक मर्तबा आप रहमतुल्लाह अलैह! गिर्योज़ारी कर रहे थे, के ग़ैब से आवाज़ आई ऐ हुबैरा! में ने तुझ को बख्शा और अपने मख़सूस बंदों में शामिल कर लिया, तू जा हुज़ैफ़ा! मरअशी, की खिदमत में हाज़िर हो कर उन के हल्काए इरादत में शामिल हो, चुनांचे वो फ़ौरन हज़रत ख्वाजा हुज़ैफ़ा मरअशी रहमतुल्लाह अलैह की खिदमत में हाज़िर हो कर कदम बोस हुए, हज़रत ख्वाजा हुज़ैफ़ा मरअशी रहमतुल्लाह अलैह ने आप को उठा कर सीने से लगा लिया और बहुत इज़्ज़तो शफकत से पेश आए, और फ़रमाया ऐ हुबैरा! तुम अल्लाह के हुक्म से तीस साल तक पहले ही रियाज़त और मुजाहिदा कर चुके हो, इस लिए इस के असरात होना ज़रूरी हैं, एक साल बाद आप के मुर्शिद ने खिरकए खिलाफत से नवाज़ा, पीराने सलासिल के नक़्शे कदम पर चलने की नसीहत फ़रमाई, हज़रत ख्वाजा हुबैरा बसरी रहमतुल्लाह अलैह! ने खिरकए खिलाफत पहिनने के बाद कभी शकर, और नमक, ज़बान पर नहीं रखा, और रफ्ता रफ्ता इस बुलंद मक़ाम पर पहुंच गए, के आप के खादिमो पर भी अर्श से फर्श तक रोशन हो जाता था।

गिर्योज़ारी

हज़रत ख्वाजा हुबैरा बसरी रहमतुल्लाह अलैह! फरमाते हैं के जिस वक़्त में ने खिरकए खिलाफ़तो इरादत ज़ेबेतन किया, हुज़ूर नबी करीम सलल्लाहु अलैही वसल्लम और तमाम बुज़ुर्गों की रूहों ने मुझ को दुआओं से नवाज़ा, मेरा उस वक़्त शदीद गिर्योज़ारी से बुरा हाल था, क्यों के दुरवेशी बहुत मुश्किल काम है, में अल्लाह! पाक से डर रहा था, के खिरका तो में ने पहिंन लिया है, लेकिन खुदा ना ख्वास्ता कोई ऐसी हरकत ना मुझ से सरज़द हो जाए जो मेरी रुस्वाई का बाइस हो,

हज़रत ख्वाजा हुबैरा बसरी रहमतुल्लाह अलैह! पांच पांच, छेह छेह, रोज़ के बाद इफ्तार करते थे, और इतना रोते थे के बाज़ वक़्त लोगों को खौफ होता के कहीं इन की जान न निकल जाए, हज़रत ख्वाजा हुबैरा बसरी रहमतुल्लाह अलैह! खशीयते इलाही से बहुत ज़ियादा रिक़्क़त तारी हुई, आप ज़ारो कतार रोते जाते थे, और फरमाते थे के ऐ अल्लाह पाक अगर तूने हुबैरा से इफ्तार का हिसाब लेना शुरू किया तो इस का हाल क्या होगा, आवाज़ आई के ऐ हुबैरा में ने तुम पर हिसाब आसान कर दिया और तुम को बख्श दिया, फिर अल्लाह पाक का ख़ास लुत्फ़ो करम नाज़िल हुआ।

सीरतो ख़ासाइल

हज़रत ख्वाजा हुबैरा बसरी रहमतुल्लाह अलैह! अक्सर अपने हुजरे में रहते थे, हुजरे से बहुत कम बाहर निकलते थे, दुनियादार लोगों से बिलकुल नहीं मिलते थे, यहाँ तक के आप ने बादशाहे वक़्त की भी सूरत नहीं देखि, दुनियादार लोगों की दी हुई कोई चीज़ नहीं खाते थे, फरमाते थे के दौलतमंदों के यहाँ का खाना ज़हर की मानिंद है, इस खाने से दिल सियाह होता है, और ताबाही आती है, आप रात को बहुत कम सोते शब् बेदारी कर के यादे खुदा में मसरूफ रहते, हमेशा रिज़्के हलाल खाते और फुकरा के साथ बैठ कर खाने को पसंद करते थे, खाना खाते वक़्त अपने बुज़ुर्गों सूफ़ियाए किराम की रविश के मुताबिक तीन लुक़मे से ज़ियादा नहीं खाते, आप का कौल है: दुरवेशों को सारे जहाँ से बेगाना होना चाहिए, न किसी की तारीफ से खुश होना चाहिए न किसी की मज़म्मत से ना खुश हो ।

दौलत से नफरत

एक दिन दौलत मंदों में से एक शख्स हज़रत ख्वाजा हुबैरा बसरी रहमतुल्लाह अलैह! की खिदमत में एक हज़ार दिरहम नज़राना लाया, आप इसे देख कर बेहोश हो गए, थोड़ी देर के बाद जब होश आया, तो आप बहुत घबराए हुए थे, और चेहरे का रंग ज़र्द पड़ गया था, लोगों ने पूछा हज़रत ये क्या हुआ? आप ने फ़रमाया आह! इस गरीब का क्या हाल पूछते हो जो हुब्बे इलाही यादे मौला में मशगूल हो, और उस के पास इस के बरअक्स इस को तबाह कर देने वाली चीज़ लाइ जाए इससे पहले तो मरजाना ही बेहतर है, दुर्वेश को दिरहमों दीनार से क्या काम, इस को तो फ़क्ऱो फाका और शाकिस्ताग़िये दिल चाहिए जिस में ये बातें नहीं वो दुर्वेश दरवेशी के लाइक नहीं।

आप का विसाल 14/ शव्वालुल मुकर्रम 252/ हिजरी में हुआ।

मज़ार मुबारक

आप का मज़ार शरीफ, मुल्के इराक के शहर बसरा में मरजए खलाइक है।

“अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त की उन पर बेशुमार रहमत हो और उन के सदके में हमारी मगफिरत हो”

रेफरेन्स हवाला

मिरातुल असरार
सीयरुल अक्ताब
ख़ज़ीनतुल असफिया

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