हज़रत ख्वाजा मुअइयेदुद्दीन चिश्ती देहलवी रहमतुल्लाह अलैह की ज़िन्दगी

हज़रत ख्वाजा मुअइयेदुद्दीन चिश्ती देहलवी रहमतुल्लाह अलैह की ज़िन्दगी

खिलाफ़तो इजाज़त

आप हज़रत ख्वाजा मुअइयेदुद्दीन चिश्ती देहलवी रहमतुल्लाह अलैह के वालिद माजिद का इस्मे गिरामी “मुविदुद्दीन” है, और आप रहमतुल्लाह अलैह का नाम मुबारक नूरुद्दीन मुहम्मद! है, मुअइयेदुद्दीन अंसारी! के नाम से मशहूर हुए, आप हज़रत ख्वाजा मुअइयेदुद्दीन चिश्ती देहलवी रहमतुल्लाह अलैह सरकार महबूबे इलाही निज़ामुद्दीन औलिया देहलवी रहमतुल्लाह अलैह के मुरीद हैं, जब आप सरकार महबूबे इलाही निज़ामुद्दीन औलिया देहलवी रहमतुल्लाह अलैह से मुरीद हुए तो आखरी दमतक किसी की तरफ इल्तिफ़ात नहीं करते थे, सिवाए औलादे रसूल करीम सलल्लाहु अलैही वसल्लम के, बिलख़ुसूस हज़रत सय्यद हुसैन रहमतुल्लाह अलैह से बहुत मुहब्बत करते थे, हज़रत ख्वाजा मुअइयेदुद्दीन चिश्ती देहलवी रहमतुल्लाह अलैह सिमा में बहुत ज़ियादा गिर्याओ ज़ारी करते थे, इस बारे में आप दूसरे मुरीदों में मुमताज़ थे।

ये सब सरकार महबूबे इलाही निज़ामुद्दीन औलिया देहलवी रहमतुल्लाह अलैह का फैज़ान था क्यों के मंज़ूरे नज़र थे, और आप रहमतुल्लाह अलैह ने इन को अपना लिबास अता फ़रमाया था, इन के वालिद मुकर्रम फरमाते हैं के मेरे घर में कोई लड़का नहीं होता था, चूंकि बच्चों की वालिदा भी सरकार महबूबे इलाही निज़ामुद्दीन औलिया देहलवी रहमतुल्लाह अलैह की मुरीदा थीं, इन होने मुझ से कहा के सरकार महबूबे इलाही निज़ामुद्दीन औलिया देहलवी रहमतुल्लाह अलैह से अर्ज़ करूँ के मेरे कोई लड़का पैदा नहीं होता, उस वक़्त हम क़स्बा रोपड़ में रहते थे, जब में सरकार महबूबे इलाही निज़ामुद्दीन औलिया देहलवी रहमतुल्लाह अलैह की खिदमते बा फैज़ में हाज़िर हुआ, तो मेने आप से इस बारे में अर्ज़ किया, तो आप ने ख्वाजा इकबाल को हुक्म दिया के एक रोटी और खजूर लाओ, फिर मुझ से फ़रमाया के इस रोटी में से थोड़ा थोड़ा खाओ, यहाँ तक के जब तुम अपने घर पहुचों तो ये रोटी ख़त्म हो जाए, और ये खजूर अपनी बीवी को खिलाओ, अल्लाह पाक तुम को बेटा अता फरमाएगा, में ने आप के इरशाद के मुताबिक़ अमल किया, इस की बरकत से अल्लाह पाक ने मुझे बेटा अता फ़रमाया यानि हज़रत मौलाना नूरुद्दीन मुहम्मद मुअइयेदुद्दीन अंसारी! पैदा हुए।

वफ़ात

आप रहमतुल्लाह अलैह ने आखरी उमर में चंद दिन बीमारी की ज़हमत उठाई, इस बीमारी में भी आप ने कोई फर्ज़ो सुन्नत नहीं छोड़ा, आखिर में 716/ हिजरी में वफ़ात पाई।

मज़ार

आप रहमतुल्लाह अलैह का मज़ार मुबारक, सरकार निज़ामुद्दीन औलिया देहलवी रहमतुल्लाह अलैह की दरगाह में था।

“अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त की उन पर बेशुमार रहमत हो और उन के सदके में हमारी मगफिरत हो”

रेफरेन्स हवाला

रहनुमाए मज़ाराते दिल्ली

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