मुहम्मद आज़म खान बरेलवी

हज़रत मौलाना मुहम्मद आज़म खान बरेलवी रदियल्लाहु अन्हु की ज़िन्दगी

नाम व नसब

आप का नामे नामी व इस्मे गिरामी “मौलाना मुहम्मद मुअज़्ज़म खान” सिलसिलए नसब इस तरह है: मौलाना मुहम्मद आज़म खान बिन, जनाब सआदत यार खान बिन, जनाब मुहम्मद सईदुल्ल्ह खान बिन, अब्दुर रहमान बिन, युसूफ कंधारी बिन, दौलत खान बिन दाऊद।

वालिद माजिद

आप के वालिद का नाम “हज़रत सआदत यार खां” है। 

आप के सीरतो ख़ासाइल

हज़रत मौलाना मुहम्मद आज़म खान! हज़रत सआदत यार खां, के साहबज़ादे थे, आप भी दरबारे शाही से वाबस्ता थे, आप को दरबारे शाही से मनसब मिला था, लेकिन आप का मैलान तबअ दरबारे शाही से लगाओ नहीं रखते थे, इस लिए आप ने जल्द ही दरबारी मुराआत (तवज्जुह) व मनसब से किनारा कशी इख्तियार करली, चूंके आप की तबियत माइल बा ज़ाहिद थी, इस लिए आप उमूरे दुनिया से सबक दोशी इख्तियार कर के ज़ुहदो इत्तिका तदय्युन, रियाज़तो रूहानियत की जानिब मुकम्मल तौर पर माइल हो गए, और यहीं से एक अलग तारीख़ मुरत्तब हुई, यानी जो खानदाने फन सिपहगिरी और दुनियावी जाहो हशमत के लिए जाना जाता था, अब इस की जगह औरादो वज़ाइफ़, तकवाओ तहारत, विलयतो करामत, तज़कियाए नफ़्स, इबादतों रियाज़त, और ज़िक्रो फ़िक्र में लग गए थे, हज़रत मौलाना मुहम्मद मुअज़्ज़म खान! रहमतुल्लाह अलैह! अपनी मूर्सी इज़्ज़तो अज़मत और मंसबे वजाहत के बावजूद जो निहायत शरीफुन नफ़्स, मुन्कसिरुल मिजाज़, गरीब परवर और दीनियात में हद दर्जा शग़फ़ रखते थे।

लो अपनी दोशाला (चादर) ले जाओ

“कश्फ़े बातनि” हज़रत मौलाना मुहम्मद आज़म खान! रहमतुल्लाह अलैह! के ज़ुहदो वरा और कश्फे बातनि का अंदाजा इस वाकिये से लगाया जा सकता है: आप मोहल्ला शहज़ादे का तकिया! मेमाराने बरैली में रहते थे, और दुनिया से मुँह मोड़ कर एक गोशे में अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त की इबादत किया करते थे, आप के साहबज़ादे हाफ़िज़ काज़िम अली खान! अपनी मसरूफियात और ज़िम्मेदारियों की अंजाम दही के लिए अक्सरो बेश्तर बदायूं में रहते लेकिन अपने वालिद माजिद हज़रत मौलाना मुहम्मद मुअज़्ज़म खान! रहमतुल्लाह अलैह! की कदम बोसी और शरफ़े ज़ियारत से मुशर्रफ होने के लिए हर जुमेरात को बरैली तशरीफ़ लाते और जुमे के बाद बदायूं लोट जाते,

एक मर्तबा जाड़े सर्दियों के मौसम में हाज़िर हुए तो देखा के वालिद माजिद आग जलाए तशरीफ़ फरमा हैं और जिस्म पर कोई शाल वगेरा नहीं तो फ़ौरन अपना बेश कीमत दोशाला उतार कर वालिद माजिद के कन्धों पर डाल दिया, उन्होंने निहायत इस्तगना से दोशाला उतार कर भड़कती हुई आग में डाल दिया, साहबज़ादे के दिल में ख़याल आया काश जलाने की बजाए किसी और को अता फ़रमा देते, दिल में ये ख्याल आना ही था के वालिद माजिद ने आग में से दोशाला खींचा “जिस पर आग ने कुछ असर ना किया, और साहबज़ादे की तरफ फेंकते हुए इरशाद फ़रमाया फ़कीर के यहाँ धुक्कड़ फुक्कड़, का मुआमला नहीं चलता लो अपना दोशाला ले जाओ।

आप की औलादे अमजाद

हज़रत मौलाना मुहम्मद आज़म खान! रहमतुल्लाह अलैह! ने दो अक़्द (निकाह) किए, पहली ज़ौजाह! (बीवी) से हज़रत काज़िम अली खान साहब! हैं, और दूसरी बीवी से चार साहबज़ादियाँ हुईं, जिन में एक का नाम फ़हमीदह बेगम था! जिन का अक़्द (निकाह) वली मुहम्मद खान रफ़ी के हमराह हुआ था, फ़हमीदह बेगम का इन्तिकाल 1938/ ईसवी में हुआ, हज़रत मौलाना मुहम्मद मुअज़्ज़म खान! रहमतुल्लाह अलैह! की रफ़ीकाए हयात सुलतान खानम थीं, जिन के नाम से हज़रत मौलाना मुहम्मद मुअज़्ज़म खान! रहमतुल्लाह अलैह! ने दिल्ली में 29/ जमादिउल ऊला 1168/ हिजरी को कोकठरा खरीदा था, ये कठेरा छत्ता जांनिसार खान लाहोरी दरवाज़े में मौजूद था, उसी मकाम पर हज़रत मौलाना मुहम्मद मुअज़्ज़म खान! रहमतुल्लाह अलैह! की हवेली थी, हज़रत मौलाना मुहम्मद मुअज़्ज़म खान! रहमतुल्लाह अलैह! तारिकुद दुनिया होने के बाद दिल्ली की रिहाइश छोड़ दी, और बरैली शरीफ को अपना मसकन बनाया जिस जगह आप ने क़याम फ़रमाया वो मुहल्लाह “शहज़ादे का तकिया” के नाम से मशहूर हुआ और आप विसाल के बाद मुहल्लाह “शहज़ादे का तकिया” में मदफ़ून हुए ।

आप का विसाल

आप की वफ़ात मुख्तलिफ तारीखी शवाहिद से ये मालूम होता है के 1815/ ईसवी में आप की वफ़ात हु।                              

मज़ार मुबारक

आप का मज़ार मुकद्द्स मुहल्लाह शहज़ादे का तकिया बरैली शरीफ यूपी इंडिया में ज़ियारत गाहे ख़ल्क़ है, ।

“अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त की उन पर बेशुमार रहमत हो और उन के सदके में हमारी मगफिरत हो”  

रेफरेन्स हवाला
  • तजल्लियाते ताजुश्शरिया                                 
  • फ़ैज़ाने आला हज़रत
  • सीरते आला हज़रत
  • तज़किराए खानदाने आला हज़रत

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