खिलाफ़तो इजाज़त
हज़रत सूफी शाह आबादानी देहलवी रहमतुल्लाह अलैह! आप का सिलसिलए नसब खलीफऐ अव्वल हज़रते सय्यदना अबू बक्र सिद्दीक रदियल्लाहु अन्हु से मिलता है, आप हज़रत मौलाना मीर मुहम्मद ज़करिया देहलवी रहमतुल्लाह अलैह के मुरीदो खलीफा हैं।
विलादत बा सआदत
आप रहमतुल्लाह अलैह 1151/ हिजरी में शहर सियालकोट (पंजाब) में पैदाइश हुई, आप के वालिद माजिद का नाम मियां शैख़ नूर जमाल था, “बशारत” जिस दिन आप रहमतुल्लाह अलैह की विलादत हुई, उसी दिन एक साहिबे कशफो करामात बुज़रुग सियालकोट (पंजाब) में तशरीफ़ लाए, लोग जोक दर जोक उनकी बारगाह में हाज़िर हुए, ये वो ज़माना था के नादिर शाह दुर्रानी दिल्ली को वीरान कर के अपने वतन वापस लोट रहा था, ऐसे वक़्त में एक कामिल दुर्वेश का शहर में आना लोगों के लिए राहत का सामान बन गया, हज़रत सूफी आबादानी देहलवी रहमतुल्लाह अलैह! की पैदाइश की ख़ुशी में हज़रत के घर नक्कारा बज रहा था, जब नक्कारा की आवाज़ इन बुज़रुग के कान में आई तो इन्होने इस का सबब मालूम किया, लोगों ने अर्ज़ किया मियां नूर जमाल के यहाँ लड़का पैदा हुआ है, वलियुल्लाह बहुत खुश हुए, और फ़रमाया अल्हम्दुलिल्लाह! तुम लोगों की परेशानी दूर होने का वक़्त आ गया है, ये बच्चा क़ुत्बे वक़्त शैख़े तरीकत होगा, इस की बरकत से अल्लाह पाक तुम्हारी परेशानियों को दूर फरमाएगा, आप बचपन ही से नेक सालेह मुत्तक़ी थे, आप रहमतुल्लाह अलैह की आदत दूसरे बच्चों से अलग थीं, बचपन ही से नमाज़ रोज़ा के पाबंद थे, आप के दिल में जज़्बए इलाही शुरू ही से था और क्यों ना होता के पैदाइशी वली थे, वालिदैन भी बुज़रुग थे, इसी जज़्बे के तहत आप रहमतुल्लाह अलैह ने मुख्तलिफ बुज़रुगों की बारगाह में हाज़िर हो कर फैज़ हासिल किया।
खिलाफ़तो इजाज़त
हज़रत सूफी आबादानी देहलवी रहमतुल्लाह अलैह! अपने वालिद माजिद और चचा शैख़ करीमुद्दीन के साथ दिल्ली तशरीफ़ लाए, और जामा मस्जिद के करीब मोहल्ला कागज़गीरान! में रिहाइश इख़्तियार की, इसी मोहल्ले में हज़रत मौलाना मीर मुहम्मद ज़करिया देहलवी रहमतुल्लाह अलैह रहा करते थे, आप रहमतुल्लाह अलैह हज़रत! की खिदमत में बराबर हाज़िर होते थे, चुनांचे कुछ दिनों के बाद आप और आप के चचा ज़ाद भाई गुल मुहम्मद साहब हज़रत मौलाना मीर मुहम्मद ज़करिया देहलवी रहमतुल्लाह अलैह के मुरीद हो गए, हज़रत मौलाना मीर मुहम्मद ज़करिया देहलवी रहमतुल्लाह अलैह आप को तमाम मुरीदों में अज़ीज़ रखते थे और आप भी अपने मुर्शिद की मुहब्बत में दीवाने फरज़ाने थे, जब हज़रत मौलाना मीर मुहम्मद ज़करिया देहलवी रहमतुल्लाह अलैह की वफ़ात का वक़्त करीब आया तो आप ने तमाम मुरीदों को जमा कर के फ़रमाया के जो कुछ मुझ को बुज़रुगों से मिला है वो सब में ने मियां आबादानी को बख्शा और ये अमानत इन के सुपुर्द की, आज से वो मेरे नाइब जानशीन हैं, ये कह कर अपना खिरकए खिलाफत और टोपी अता फ़रमाई।
ज़ाहिरो बातिन
हज़रत सूफी आबादानी देहलवी रहमतुल्लाह अलैह! ने बा काइदा इल्मे ज़ाहिरी हासिल नहीं किया था, लेकिन अल्लाह पाक ने आप को इल्मे लदुन्नी से नवाज़ा था, जब आप रहमतुल्लाह अलैह वाइज़ो नसीहत फरमाते तो अक्सर अहादीसे मुबारिका की तिलावत कर के इस की बेहतरीन तशरीह फरमाते थे और मसनवी शरीफ से मिसाल दे कर अच्छी तरह मतलब समझाते थे, अगर कोई शख्स आप से किसी शेर का मतलब दरयाफ्त करता तो उस का मतलब भी वाज़ेह तौर पर बयान फरमाते थे, अक्सर आने वाले का मकसद अपने नूरे बातिन से मालूम कर के उस का हल फरमा देते थे,
सीरतो खसाइल
आप रहमतुल्लाह अलैह ने अपने पीरो मुर्शिद की सुन्नत पर अमल करते हुए कागज़ गिरी का पेशा इख्तियार फ़रमाया, अपने हाथ से कागज़ बनाते जो कुछ इससे आमदनी होती, इस को तीन हिस्सों में तकसीम फरमाते, एक हिस्सा अपने मुताअल्लिक़ीन पर, दूसरा हिस्सा अपने पीर ज़ादों पर, तीसरा हिस्सा फुकरा व मसाकीन गरीबों कल्लास और गोशा नशीन मजज़ूबों, फकीरों पर खर्च फरमाते थे, हर आने वाले से खंदा पेशानी से पेश आते, उस की खातिर मदारात करते, उस को खाना पेश करते और रुखसत करते वक़्त शिरीनी और एक दस्ता कागज़ का देते, एक बार किसी ने अर्ज़ किया के आप अल्लाह पाक के कामिल वली हैं, और अल्लाह पाक ने आप रहमतुल्लाह अलैह को हज़ारों गुलाम अता फरमाए हैं, और ख्वाइश रखते हैं के वो आप की खिदमत करे, मगर आप कागज़ बनाते हैं, और सादगी से रहते हैं, और हर शख्स से इस क़द्र आजिज़ी व इंकिसारी से मिलते हैं, इस में क्या राज़ है? आप इस की ये बात सुन कर मुस्कुराए और फ़रमाया गौर से सुनो! में ना तो फ़कीर था और ना शैख़े कामिल, में तो कागज़ बनाने वाला शख्स था, मुझे जो कुछ मिला है वो इज्ज़ो इंकिसारी के साथ अपने पीरो मुर्शिद की नज़रे करम से दौलत मिली है, फिर में किस तरह आजिज़ी व इंकिसारी छोड़ दूँ,
करामात
हज़रत सूफी आबादानी देहलवी रहमतुल्लाह अलैह! के मुरीदो खलीफा हज़रत नवाब सय्यद अमजद अली लखनवि रहमतुल्लाह अलैह का बयान है के हज़रत मुहम्मद अहमद कादरी लखनवि रहमतुल्लाह अलैह ने मुझ से फ़रमाया के आप के पीरो मुर्शिद हज़रत सूफी आबादानी देहलवी रहमतुल्लाह अलैह! अल्लाह पाक की बारगाह में मकबूल थे, में ने एक मर्तबा देखा के एक शख्स फ़िज़ा में उड़ रहा है, अचानक उस का एक हाथ जिस्म से अलग हो कर नीचे गिरा, इससे अल्लाह पाक की आवाज़ निकल रही थी, कुछ देर के बाद दूसरा हाथ गिरा इससे भी अल्लाह पाक की आवाज़ आ रही थी, कुछ देर के बाद जिस्म के सारे आज़ा अलग हो कर ज़मीन पर गिर पड़े और हर एक अज़ू से अल्लाह की आवाज़ निकल रही थी, उस शख्स के बदन से जो खून के कतरे ज़मीन पर गिर रहे हैं, इन कतरों में से ज़मीनन पर अल्लाह पाक का नक्श ज़ाहिर हो रहा था, इस वाकिए को देख कर मुझ को हैरत हुई, दूसरे बुज़रुग जो वहां मौजूद थे में ने उन से मालूम किया ये कौन आशिके इलाही हैं? इन बुज़रुगों ने फ़रमाया ये मक़बूले इलाही हज़रत सूफी आबादानी हैं,
आप के मुरीद सआदत यार खान, के यहाँ लड़के नहीं होते थे, एक मर्तबा इन की बीवी जो के हज़रत से मुरीद थीं, इन्होने इन से कहा के हज़रत से औलाद के लिए दुआ के वास्ते अर्ज़ करें, सआदत यार खान ने हज़रत से अर्ज़ किया, हज़रत ने मुस्कुरा कर इन की तरफ देखा, और दो गुलाब के फूल अता फरमाए, और फ़रमाया के एक तुम खाना और एक अपनी बीवी को खिला देना, इंशा अल्लाह लड़का होगा, अल्लाह पाक के फ़ज़्लो करम से और हज़रत की दुआ से इन के यहाँ गुलाब की तरह हसीनो जमील बेटा पैदा हुआ, चंद साल के बाद आप सआदत यार खान के यहाँ तशरीफ़ ले गए, इस बच्चे को देख कर फ़रमाया अल्लाह पाक तुझ को इस का नेमलबदल अता फरमाएगा, कुछ दिनों के बाद बच्चे का इन्तिकाल हो गया, कुछ दिनों के बाद सआदत यार खान के यहाँ दूसरा लड़का पैदा हुआ,
वफ़ात
आप रहमतुल्लाह अलैह ने बादशाह शाह दुर्रानी के दौरे हुकूमत में 18/ रबिउस सानी 1220/ हिजरी मुताबिक 1805/ ईसवी 69/ साल की उमर में वफ़ात पाई।
मज़ार
आप रहमतुल्लाह अलैह का मज़ार मुबारक, दिल्ली 6/ में कौड़िया पुल से पहले प्रेज़ेंटेन्शन का कॉन्वेंट स्कूल, नज़द रोमन कैथोलिक गिरजा घर के खेल के मैदान में जहाँ घास लगी हुई है था, स्कूल की इन्तिज़ामियाँ (कमेटी) ने इस पर मिटटी डाल कर ज़ेरे ज़मीन कर दिया, बहुत अफ़सोस का मकाम है के इतने अज़ीम बुज़रुग का मज़ार मुबारक शहीद कर दिया गया, हम सभी को इस तरफ ख़ास धियान दे ने की ज़रुरत है, वरना आने वाले वक़्त में जो औलियाए किराम बुज़रुगाने दीन के मज़ारात हैं वो भी ख़त्म कर दिए जाएंगे, इसी तरह हमने खुदा जा कर देखा है के कई औलियाए किराम बुज़रुगाने दीन के मज़ार मुबारक को तोड़ दिया ख़त्म कर दिए।
“अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त की उन पर बेशुमार रहमत हो और उन के सदके में हमारी मगफिरत हो”
रेफरेन्स हवाला
रहनुमाए मज़ाराते दिल्ली

