हज़रत ख्वाजा अबू इसहाक शामी चिश्ती रहमतुल्लाह अलैह

हज़रत ख्वाजा अबू इसहाक शामी चिश्ती रहमतुल्लाह अलैह

विलादत मुबारक

आशिके ज़ाते इलाह, महबूबे किबरिया, इमामुल असफिया, साहिबे कशफो करामात, ताजुल औलिया, फनाफिर रसूल, शैखुल मशाइख, साहिबे शरीअतो तरीकत, आलिमे दीन, हज़रत ख्वाजा अबू इसहाक शामी चिश्ती रहमतुल्लाह अलैह! की विलादत 17/ ज़िल हिज्जा, 237/ हिजरी बरोज़ जुमा रात के वक़्त दमिश्क मुल्के शाम में हुई, चिश्त, मुल्के अफगानिस्तान के शहर हिरात, के पास मौजूद है।

मुसलसल चालीस रोज़ इस्तिखारा

हज़रत ख्वाजा अबू इसहाक शामी रहमतुल्लाह अलैह! पांच 5/ 6/ छेह रोज़ के बाद या कभी सात रोज़ के बाद इफ्तार करते, और आप रहमतुल्लाह अलैह! फरमाते हैं के जो जो लज़्ज़त भूक में मुझे मिलती है, वो किसी चीज़ में नहीं मिलती, और इफ्तार के वक़्त भी तीन लुक़मे से ज़ियादा तनावुल नहीं फरमाते जब आप को मुरीद होने की ख्वाइश हुई तो आप ने मुसलसल चालीस रोज़ इस्तिखारा किया, आवाज़ आई के ऐ अबू इसहाक! जाओ हज़रत ख्वाजा मुम्शाद उलू दिनोरि रहमतुल्लाह अलैह की मुरीदी में शामिल हो जाओ, के वो मेरा दोस्त है, ये हिदायत मिलते ही आप हज़रत ख्वाजा मुम्शाद उलू दिनोरि रहमतुल्लाह अलैह! की खिदमत में हाज़िर हुए, आप ने इनकी मुहब्बतों शफकत से फ़रमाया में अल्लाह पाक से दुआ करता हूँ, के तुम कामिल दुर्वेश हो जाओ,

और तुम्हारे मुहिब्बीन आशिक़ीन भी कमिलीन में शुमार हो, फिर मुरीद कर के आप को ख़ल्वत में बिठा दिया और फ़रमाया के हमारे मशाइख़ीन का तरीकए नफ़्स के साथ मुआमला करने का रहा है, तुम भी फ़क्ऱो फाका इख्तियार करो और ज़िक्रे इलाही में मशगूल हो जाओ, फिर सात साल तक हज़रत ख्वाजा अबू इसहाक शामी रहमतुल्लाह अलैह! अपने पीर की खिदमत में रह कर मुजाहिदा नफ़्स करते रहे, और इक्कीस रोज़ पर जो कुछ रोटी का टुकड़ा और पानी मिलता तो आप इफ्तार करते।

खिलाफ़तो इजाज़त

आखिर में ग़ैब से आवाज़ आई के ऐ मुम्शाद उलू! अबू इसहाक! का काम पूरा हो गया, अब इन को अपना खिरकए खिलाफत पहना कर अपना जानशीन बना दो, हज़रत ख्वाजा शैख़ मुम्शाद उलू दिनोरि चिश्ती रहमतुल्लाह अलैह ने हुक्म के मुताबिक अपना खिरका इन को इनायत फ़रमाया और अपनी खिलाफ़तो इजाज़त से नवाज़ा, उसी वक़्त आवाज़ आई के: अबू इसहाक! तुम मेरे मकबूल बंदों में शामिल हो गए, चुनाचे यही हुआ, और आप की रुश्दो हिदायत रहबरी में बहुत से भटके हुए मंज़िले मक़सूद पर पहुंच गए, और आप ही की ज़ाते मुबारक से चिश्तियों की इब्तिदा हुई, क्यों के यही सिलसिला बाद में चिश्ती सिलसिला कहलाया।

सिलसिलए चिश्तिया की वजह तस्मिया

इस की वजह ये बताई जाती है के जब हज़रत ख्वाजा अबू इसहाक शामी रहमतुल्लाह अलैह! बाग्दाद् शरीफ में अपने मुर्शिद की कदम बोसी के लिए हाज़िर हुए, तो आप के पीरो मुर्शिद हज़रत ख्वाजा शैख़ मुम्शाद उलू दिनोरि चिश्ती रहमतुल्लाह अलैह ने पूछा के तुम्हारा नाम क्या है? आप ने जवाब दिया के गुलाम को लोग अबू इसहाक शमी! कहते हैं, तो आप ने बड़ी शफकत से फ़रमाया के तुम ख्वाजए चिश्त! हो और शहर चिश्त में इस्लाम तुम्हारे कदम की बरकत से फैलेगा, मुर्शिद से खिलाफ़तो इजाज़त पाने के बाद शहर चिश्त तशरीफ़ लाए और वहां ख्वाजए चिश्त के नाम से मशहूर हुए, और उसी दिन से चिश्ती कहलाने लगे।

ख्वाजगाने चिश्त के सरदार

ख्वाजगाने चिश्त (चिश्त, मुल्के अफगानिस्तान, के सूबा हिरात, का बहुत मशहूर शहर, है इसी शहरे चिश्त से सिलसिलए आलिया चिश्तिया का आगाज़ हुआ) के सरदार पांच हज़रात हैं जिन्हें चिश्तियों के पांच तन कहा जाता है, (1) हज़रत ख्वाजा अबू इसहाक शामी चिश्ती रहमतुल्लाह अलैह! (2) हज़रत ख्वाजा अबू मुहम्मद चिश्ती, (3) हज़रत ख्वाजा अबू अहमद चिश्ती, (4) हज़रत ख्वाजा अबू युसूफ चिश्ती, (5) हज़रत हज़रत ख्वाजा मौदूद चिश्ती रहमतुल्लाहि तआला अलैहिम अजमईन, ये पांचों हज़रात चिश्त शरीफ में रहते हैं, और इन के मज़ारात मुबारक भी मुल्के अफगानिस्तान के शहर चिश्त! में ही मरजए खलाइक हैं, और इसी तरह इन के खुलफ़ा भी मुल्के हिंदुस्तान में पांच तन हैं,

(1) सुल्तानुल हिन्द अताये रसूल ख्वाजाए ख्वाजगान हज़रत ख्वाजा गरीब नवाज़ मुईनुद्दीन चिश्ती रहमतुल्लाह अलैह, (2) क़ुत्बुल अक्ताब हज़रत ख्वाजा कुतबुद्दीन बख्तियार काकी चिश्ती ऊशी रहमतुल्लाह अलैह, (3) हज़रत ख्वाजा बाबा फरीदुद्दीन मसऊद गंजे शकर रहमतुल्लाह अलैह (4) सरकार महबूबे इलाही निज़ामुद्दीन औलिया देहलवी रहमतुल्लाह अलैह, (5) हज़रत शैख़ मखदूम अलाउद्दीन अली अहमद साबिर कलियरी रहमतुल्लाह अलैह, ये पांचों बुज़रुग इरादतो खिलाफत की निस्बत से यकेबाद दीगरे सज्जादानशीन बनते गए और और अपने शागिर्द मुहिब्बीमें मुरीदीन मोतक़िदीन आशिक़ीन खुलफाए किराम को छोड़ कर रुखसत हुए, इन्ही बुज़ुर्गाने दीन को चिश्ती, चिश्तिया कहा जाता है।

पालक मारते ही पहुंच जाते

हज़रत ख्वाजा अबू इसहाक शामी रहमतुल्लाह अलैह! आप सिमआ के बहुत शौकीन थे, किसी आलिम ने आप के सिमआ पर एतिराज़ नहीं किया, जो शख्स एक बार आप की मजलिस में चला जाता फिर वो दुबारा गुनाह का मुर्तकिब नहीं होता, अगर बीमार जाता तो शिफा हासिल करता, दुनियादार जाता तो तारिकुद दुनिया बन जाता, क़ुतुब सीरत वगेरा में दर्ज है, के हज़रत ख्वाजा अबू इसहाक शामी रहमतुल्लाह अलैह! की मजलिस वगेरा की बरकत से मूसलाधार बारिश होती, इमामे चिश्त हज़रत ख्वाजा अबू इसहाक शामी चिश्ती रहमतुल्लाह अलैह! के बारे में मशहूर है के “आप कहीं जाना चाहते तो पलक मारते ही उस मक़ाम पर पहुंच जाते, मक़ाम की दूरी आप के सामने कोई हकीकत नहीं रखती थी, बल्कि सौ सौ आदमियों को एक साथ मंज़िले मकसूद तक पहुंच जाते थे,

विसाल

आप रहमतुल्लाह अलैह का विसाल 14/ रबिउस सानी 329/ हिजरी को हुआ।

मज़ार

आप रहमतुल्लाह अलैह का मज़ार मुबारक: “शहर अक्का” मुल्के शाम सीरिया में में मरजए खलाइक है, आप रहमतुल्लाह अलैह के विसाल से ले कर आज तक आप के मज़ार शरीफ पर एक चिराग रोशन है, जो कभी नहीं बुझा जो सुबह शान रोशन रहता है, आंधी तूफ़ान भी इस को बुझा ना सका।

“अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त की उन पर बेशुमार रहमत हो और उन के सदके में हमारी मगफिरत हो”

रेफरेन्स हवाला

  • मिरातुल असरार
  • सीयरुल अक्ताब
  • ख़ज़ीनतुल असफिया
  • सवानेह शैखुल आलम
  • सफ़िनतुल औलिया,

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