विलादत बसआदत
सरकार ख्वाजा गरीब नवाज़ रदियल्लाहु अन्हु! की सने विलादत में तारीख़ नवेसों और तज़किराह निगारों के बड़े इख़्तिलाफ़ात हैं, जमाअते अहले सुन्नत की आला तिरीन शख्सीयत हज़रत अल्लामा अर्शदुल कादरी रहमतुल्लाह अलैह अपनी किताब “हिन्द के राजा हमारे ख्वाजा” में तहरीर फरमाते हैं के: 522/ या 527/ या 533/ या 535/ या 536/ या 537/ हिजरी तक की रिवायतें मिलती हैं, मगर ज़्यादातर मुअर्रिख़ीन (हिस्टिरि, तारीख़ लिखने वाला) का इस बात पर इत्तिफाक है के आप रदियल्लाहु अन्हु! की विलादत मुबारत 14/ रजाबुल मुरज्जब 537/ हिजरी मुताबिक 1143/ ईसवी बरोज़ पीर सुबह के वक़्त मुल्के ईरान, का इलाका शहर सीसतान! के गाऊं संजर, में हुई।
आप का इस्मे गिरामी
आप रदियल्लाहु अन्हु! का इस्मे गिरामी “मोईनुद्दीन” हैं, और बाज़ हज़रात “मोईनुद्दीन हसन” बताते हैं, आप रदियल्लाहु अन्हु! का दूसरे दिन अक़ीक़ा, के बाद जब नोमोलूद का नाम रखने के लिए हज़रत ख्वाजा सय्यद गियासुद्दीन हसन अलैहिर रहमा ने अपनी अहलिया उम्मुल वरा, से मशवरा किया, तो उन्होंने कहा बच्चे का नाम इस की पैदाइश से पहले कई बुज़रुग ख्वाब में आ कर बता चुके हैं, इस लिए इस का नाम “मोईनुद्दीन हसन” ही तजवीज़ किया जाए बुज़ुर्गों के इरशादात के मुताबिक ये अल्लाह पाक की अमानत है इस की तरबीयतो निगेहदारी हमारे लिए बाइसे रहमत हो।
मुक़द्दस अल्काबात
सरकार ख्वाजा गरीब नवाज़ रदियल्लाहु अन्हु! के फ़ज़ाइलो कमालात और इल्मी व रूहानी इम्तियाज़ात के सबब आप रदियल्लाहु अन्हु! को इन चंद अल्काबात से भी याद किया जाता है: नाइबुन नबी फिल हिन्द, अताए रसूल, किशवरे विलायत के ताजदार, मोईनुल हक, मोईनुल मिल्लते वद्दीन, सुल्तानुल आरफीन, क़ुत्बे दौरां, वारिसुल अम्बिया, इमामे शरीअतो तारीकत, मख़्ज़ने मारफअत, मुक़्तदाए अरबाबे दीं, साहिबे असरार, कुदवतुस सालिकीन, ताजुल मुकर्ररीबीन, ख्वाजाए ख्वाजगान, सुल्तानुल हिन्द, रहनुमाए कामिलीन, ताजुल आशिक़ीन, बुरहानुल वासिलीन।
शिकमे मादर में कलमा शरीफ पढ़ना
आप रदियल्लाहु अन्हु! की वालिदा माजिदा हज़रते सय्यदा बीबी उम्मुल वरा माहे नूर रहमतुल्लाह अलैहा से रिवायत है के: जिस वक़्त से सरकार ख्वाजा गरीब नवाज़ रदियल्लाहु अन्हु! के जिस्म मुबारक में रूह डाली गई उस वक़्त से पैदाइश तक आप का मामूल ये रहा के निस्फ़ शब् (आधी रात) से दिन निकलने तक आप रदियल्लाहु अन्हु! कलमा शरीफ का ज़िक्र फ़रमाया करते थे, और में अपने कानो से आप के ज़िक्र की आवाज़ सुना करती थी, मज़ीद आप फरमाती हैं के मोईनुद्दीन हसन! सुल्बे पिदर से मेरे शिकम में मुन्तक़िल हुए तो अल्लाह पाक ने खेरो बरकत के दरवाज़े खोल दिए हमारे घर में खेरो बरकत की फ़रावानी व कसरत हो गई और हमारा दिल इत्मिनानो सुरूर से लबरेज़ हो गया।
अक्ताबो अब्दाल की मुबारकबाद
सरकार ख्वाजा गरीब नवाज़ रदियल्लाहु अन्हु! की वालिदा माजिदा फरमाती हैं के जिस पुरनूर दरख्शां सुबह को मोईनुद्दीन हसन! की विलादत मुबारिका हुई हमारे घर में नूर फ़ैल गया, और में ने अपने इर्द गिर्द बहुत सी नूरानी सूरतें देखीं, थोड़ी देर के बाद ये मंज़र निगाहों से उझल हो गया, फिर में ने अपने नोमोलूद बच्चे की तरफ नज़र की तो ये देख कर हैरान रह गई के वो सजदे में पड़ा है, में ने उसे उठा कर अपनी गोद में ले लिया, फिर जब ऊपर निगाह उठाई तो हज़ारों नूरानी सूरत! और हसीन चेहरे वालों को देखा, जिन के फ़ाख़िरा लिबासों से सुरूर अंगेज़ खुशबू की लपटें आ रही थीं, में हैरत में थी के ये कौन लोग हैं, इतने में उन में से एक शख्स ने मुझे मुखातिब करते हुए कहा: ऐ खातून! मुबारक हो के आज तेरे घर मोईनुद्दीन की विलादत हुई हम लोग इस दौर के “अक्ताबो अब्दाल” हैं और तुझे मुबारक बाद खुश खबरी देने आए हैं, उस के बाद ये हज़रात निगाहों से उजल हो गए।
आप के वालिदैन
सरकार ख्वाजा गरीब नवाज़ रदियल्लाहु अन्हु! के वालिद माजिद हज़रते सय्यदना इमामे हुसैन इबने अली शेरे खुदा रदियल्लाहु अन्हु की औलाद में से हैं, और वालिदए मुहतरमा हज़रते सय्यदना इमामे हसन इबने अली शेरे खुदा रदियल्लाहु अन्हु की औलाद में से हैं, आप रदियल्लाहु अन्हु! के वालिद माजिद हज़रत सय्यद गियासुद्दीन हसन अलैहिर रहमा निहायत मुत्तकियो परहेज़गार थे, खानदानी शराफत के साथ साथ साहिबे दौलतो सरवत भी थे, फ़क्ऱो दुरवेशी की दौलत से भी मालामाल थे आप ने अपना सब कुछ अल्लाह पाक की राह में वक्फ कर दिया था, और बेशुमार बंदिगाने खुदा सुबह शाम आप से फ़ैज़याब होते थे, गरीबों, मिस्कीनों, हाजतमन्दों, और मुसीबत ज़दा लोगों के लिए आप की सख़ावतों फय्याजी के दरवाज़े हमेशा खुले रहते थे, वो एक बाकरमत बुज़रुग थे, और हर तबके के लोगों में निहायत इज़्ज़तो एहतिराम की निगाहों से देखे जाते थे, आप ने 552/ हिजरी में वफ़ात पाई, मज़ार शरीफ बग़दाद मुक़द्दस में बाबुश शाम के नज़दीक आज भी मरजए खलाइक है, सरकार ख्वाजा गरीब नवाज़ रदियल्लाहु अन्हु! की वालिदा माजिदा का इस्म शरीफ “उम्मुल वरा माहे नूर” है, बाज़ हज़रात कहते हैं के “माहे नूर खासुल मलिका” है।
नसब नामा पिदरी
किताब “मोईनुल अरवारह” के मुसन्निफ़ ने सरकार ख्वाजा गरीब नवाज़ रदियल्लाहु अन्हु! का नसब नामा पिदरी (वालिद) इस तरह तहरीर किया है: ख्वाजा मोईनुद्दीन हसन, बिन सय्यद गियासुद्दीन, बिन सय्यद सिराजुद्दीन, बिन सय्यद अब्दुल्लाह, बिन सय्यद अब्दुल करीम, बिन सय्यद अब्दुर रहमान, बिन सय्यद अली अकबर, बिन सय्यद इब्राहीम, बिन सय्यद इमाम मूसा काज़िम, बिन सय्यद इमाम जाफर सादिक, बिन सय्यद इमाम मुहम्मद बाकर, बिन सय्यद इमाम ज़ैनुल आबिदीन, बिन सय्यद इमामे हुसैन, बिन सय्यद हज़रते अली मुश्किल कुशा शेरे खुदा हैदरे कर्रार रिदवानुल्लाही तआला अलैहिम अजमईन।
नसब नामा मादरी
सरकार ख्वाजा गरीब नवाज़ रदियल्लाहु अन्हु! वालिदा माजिदा की तरफ से आप का नसब नामा इस तरह बयान किया जाता है: हज़रत ख्वाजा मोईनुद्दीन हसन बिन, बीबी उम्मुल वरा माहे नूर या बीबी खासुल मलिका, बिन्ते सय्यद दाऊद बिन, सय्यद अब्दुल्लाह हम्बली बिन, सय्यद ज़ाहिद बिन, सय्यद मोरिस बिन, सय्यद दाऊद बिन, सय्यद मूसा जौन बिन, सय्यद अब्दुल्लाह माहिज़ बिन, सय्यद हसन मुसन्ना बिन, हज़रत सय्यद इमामे हसन मुज्तबा बिन, हज़रते अली मुश्किल कुशा शेरे खुदा हैदरे कर्रार रिदवानुल्लाही तआला अलैहिम अजमईन।
सरकार गौसे आज़म रदियल्लाहु अन्हु से क़ुराबत
सरकार ख्वाजा गरीब नवाज़ रदियल्लाहु अन्हु! का मादरी नसब नामा “मसालिकुस सालिकीन” के हवाले के मुताबिक इमामुल औलिया शैख़ अब्दुल कादिर जिलानी गौसे आज़म बगदादी रहमतुल्लाह अलैह, हज़रत सय्यद अब्दुल्लाह हम्बली अलैहिर रहमा के पोते हैं, और सरकार ख्वाजा गरीब नवाज़ रदियल्लाहु अन्हु! की वालिदा मुहतरमा बीबी माहे नूर रहमतुल्लाह अलैहा हज़रत सय्यद अब्दुल्लाह हम्बली अलैहिर रहमा की पोती हैं, और इन दोनों के वालिद आपस में हकीकी भाई हैं, यानि सरकार ख्वाजा गरीब नवाज़ रदियल्लाहु अन्हु की वालिदा मुहतरमा हुज़ूर गौसे आज़म रदियल्लाहु अन्हु की चचा ज़ाद बहिन हैं, इस रिश्ते से हुज़ूर गौसे आज़म रदियल्लाहु अन्हु के मामू होते हैं, बाग्दाद् शरीफ में आम तौर पर मशहूर है के और साहिबे “मसालिकुस सालिकीन” ने अपनी किताब की जिल्द दो में लिखा है के: सरकार ख्वाजा गरीब नवाज़ रदियल्लाहु अन्हु! और हुज़ूर गौसे आज़म रदियल्लाहु अन्हु आपस में खाला ज़ाद भाई हैं, इन दोनों रिश्तों की मुताबिक़त इस तरह होती है, के सरकार ख्वाजा गरीब नवाज़ रदियल्लाहु अन्हु! की वालिदा माजिदा हुज़ूर गौसे आज़म रदियल्लाहु अन्हु की नंनिहाली रिश्ते में खाला, और ददिहाली रिश्ते में बहिन हैं, इस लिए हुज़ूर गौसे आज़म रदियल्लाहु अन्हु, सरकार ख्वाजा गरीब नवाज़ रदियल्लाहु अन्हु! के खाला ज़ाद भाई और मामू भी होते हैं।
हुलिया शरीफ
सरकार ख्वाजा गरीब नवाज़ रदियल्लाहु अन्हु! का हुलिया शरीफ इस तरह बयान क्या गया है, सुर्ख व सफ़ेद रंग, दराज़ कद, मौज़ूं जिस्म, मुतनासिब आज़ा, चौड़े शाने, कुशादा पेशानी, बड़ी ऑंखें, बुलंद नाक, भरी हुई सफ़ेद दाढ़ी, लबो पे रक्स करता तबस्सुम, लोगों को रोशन कर देने वाला रोशन चेहरा, चलने में मतानतो वकार उठने बैठने में इंफिरादि शान और बात चीत का अंदाज़ शीरीं।
शीर ख़्वारगी बचपन के वाक़िआत
सरकार ख्वाजा गरीब नवाज़ रदियल्लाहु अन्हु! आलमे शीर ख़्वारगी में ही करामातों का ज़हूर होने लगा था, बयान किया जाता है के जब कोई औरत अपना बच्चा ले कर आप के घर आती और वो बच्चा दूध के लिए रोने लगता तो आप अपनी वालिदा माजिदा की जानिब इशारा करते आप की वालिदा आप का इशारा समझ जातीं और उस बच्चे को अपना दूध पिला देतीं, इस पर आप बहुत खुश होते और मुस्कुराते थे, जब आप की उमर तीन साल की हुई तो अक्सरो बेश्तर बाहर से अपने हम उमर बच्चों को बुला कर घर ले आते और उन्हें इंतिहाई मुहब्बत के साथ बिठा कर खाना खिलाते जब वो आसूदा हो जाते तो आप बे पनाह मुसर्रत महसूस करते, आप रदियल्लाहु अन्हु! आम बच्चों की तरह कभी हम उमर बच्चों के साथ खेल कूद में शरीक नहीं हुए और ना कभी आवारा, आज़ाद, बद ज़बान और गंदे बच्चों की सुहबत कभी इख़्तियार ना की।
हज़रत इब्राहीम कंदोज़ी अलैहिर रहमा से मुलाकात
बयान किया जाता है के सरकार ख्वाजा गरीब नवाज़ रदियल्लाहु अन्हु! हस्बे मामूल अपने बाग़ में दरख्तों और पौदों को पानी दे रहे थे, के उस ज़माने के एक बुज़रुग हज़रत इब्राहीम कंदोज़ी अलैहिर रहमा घूमते हुए, आप के बाग़ में आए इन पर अक्सर इश्के हकीकी का ग़लबा तारी रहता था, जिस वक़्त आप रदियल्लाहु अन्हु! ने इन्हें देखा तो सब काम छोड़ कर उनकी तरफ मुतावज्जेह हुए निहायत ही इज़्ज़तो एहतिराम के साथ इन्हें एक सायादार दरख्त के नीचे बिठाया उन दिनों अंगूरों का मौसम था अंगूर पके हुए थे आप रदियल्लाहु अन्हु! ने अंगूरों का एक खोशा (गुंछा) ला कर इन की खिदमत में पेश किया और खुद बा अदब हो कर उन के सामने बैठ गए, हज़रत इब्राहीम कंदोज़ी अलैहिर रहमा को सरकार ख्वाजा गरीब नवाज़ रदियल्लाहु अन्हु! का हुसने सुलूक और रवय्या बहुत पसंद आया इन्हें निगाहें बातिन से ये मालूम हो गया के ये बच्चा राहे हक का मुतलाशी है, इस लिए जेब से एक खुली का टुकड़ा निकाला और उसे दाँतों से चबा कर आप रदियल्लाहु अन्हु! के मुँह में डाल दिया, जूंही खुली का टुकड़ा खाया तो आप रदियल्लाहु अन्हु! के दिल की कैफियत एकदम बदल गई, और दुनिया की मुहब्बत दिल से उचाट हो गई, और दिल में इश्के हकीकी का जज़्बा बेदार हो गया, और नूरे इलाही से मुनव्वर हो गया, फिर आप रदियल्लाहु अन्हु! ने बाग़, चक्की, और साज़ो सामान बेच कर इस की कीमत फुकरा मिस्कीन में तकसीम कर दी, और हुसूले इल्मे दीन की खातिर राहे खुदा के मुसाफिर बन गए।
तहसीले इल्म
उस ज़माने में मुल्के उज़्बेकिस्तान के इलाके में शहर समर कंद, शहर बुखारा, के अज़ीम शहर आबाद थे जो इल्मो अदब का मरकज़ थे, खानकाहों और मदरसों में उल्माए किराम वक़्त के अज़ीम सूफ़ियाए इज़ाम तालीम देते थे, सरकार ख्वाजा गरीब नवाज़ रदियल्लाहु अन्हु! ज़ाहिरी तालीम हासिल करने के लिए शहर समर कंद, और बुखारा, का तवील सफर करने के बाद आप समरकंद पहुंचे, आप रदियल्लाहु अन्हु! ने मदरसे में दाखिल हो कर कुरआन शरीफ की तालीम हासिल करना शुरू करदी, उस मदरसे में हज़रत मौलाना शरफुद्दीन रहमतुल्लाह अलैह जैसे जय्यद आलिमे दीन की सुहबत में रह कर इल्म हासिल करने लगे, आप रदियल्लाहु अन्हु! ने कुरआन शरीफ हिफ़्ज़ किया, हज़रत मौलाना शरफुद्दीन रहमतुल्लाह अलैह की तवज्जुह से आप रदियल्लाहु अन्हु! ने चंद इब्तिदाई क़ुतुब भी पढ़ना शुरू की मगर कुछ अरसे के बाद, आप रदियल्लाहु अन्हु! ने बुखारा का रुख किया बुखारा में उन दिनों हज़रत मौलाना शैख़ हुस्सामुद्दीन बुखारी रहमतुल्लाह अलैह की बड़ी शुहरत थी, इंतिहाई काबिल आलिम फ़ाज़िल आप उन की खिदमत में हाज़िर हो कर उन के तलामिज़ा में शामिल हो गए, और चंद सालों में क़ुरान शरीफ, इल्मे तफ़्सीर, इल्मे हदीस इल्मे फ़िक़्ह, और उलूमो फुनून माकूलात व मनकूलात की मुकम्मल तालीम हासिल की, आखिर कर तालीम पूरी हासिल करने के बाद हज़रत मौलाना शैख़ हुस्सामुद्दीन बुखारी रहमतुल्लाह अलैह ने आप को दस्तारे फ़ज़ीलत भी अता फ़रमाई, बयान किया जाता है के इल्मे दीन हासिल कर ने के लिए आप बुखारा में पांच साल तक रहे।
तलाशे मुर्शिदे कामिल
सरकार ख्वाजा गरीब नवाज़ रदियल्लाहु अन्हु! आलिमो फ़ाज़िल, मुहद्दिसो फकीह, मुफ़स्सिरे कुरआन हत्ता के तमाम उलूमे ज़ाहिरी हासिल करने के बाद, आप रदियल्लाहु अन्हु! के दिल में अल्लाह पाकि की मुहब्बत का जज़्बा भड़क उठा मगर अल्लाह पाक की मारफअत (पहचान) को पाने के लिए, किसी मुर्शिदे कामिल की, बैअत करना ज़रूरी था, इसी सोच के तहत आप रदियल्लाहु अन्हु! मुर्शिद की तलाश के लिए चल पड़े उन दिनों मुल्के ईरान के शहर निशापुर! के नज़दीक क़स्बा हारुन, था, जहाँ हज़रत ख्वाजा उस्मान हारूनी रदियल्लाहु अन्हु, रहा करते थे, और उनकी बुज़ुर्गी का चर्चा चारो तरफ था, लोग जोक दर जोक उन की खिदमत में हाज़िर हो कर रूहानी फियूज़ो बरकात हासिल करते थे, गर्ज़ के उस दौर में शैख़े कामिल हज़रत ख्वाजा उस्मान हारूनी रदियल्लाहु अन्हु की ज़ाते मुबारक रूहानी फैज़ का चश्मा बना हुआ था, आप रदियल्लाहु अन्हु! ने जब इन के कमालात की शोहरत सुनी तो हारुन, पहुंच गए।
बैअत होने का वाक़िआ
“मलफ़ूज़ात अनीसुल अरवाह” में आप ने हज़रत ख्वाजा उस्मान हारूनी रदियल्लाहु अन्हु, से बैअत होने का वाकिअ यूं बयान फ़रमाया है, फ़कीर मोईनुद्दीन हसन संजरी! को शहर बाग्दाद् में हज़रत ख्वाजा जुनैद बगदादी रहमतुल्लाह अलैह की मस्जिद में हज़रत ख्वाजा उस्मान हारूनी रदियल्लाहु अन्हु, की कदम बोसी की सआदत नसीब हुई, और उस वक़्त दीगर मशाइख़ीन भी मौजूद थे, जूंही बंदे ने सर ज़मीन पर रखा, हज़रत ख्वाजा उस्मान हारूनी रदियल्लाहु अन्हु, ने फ़रमाया के दोगाना अदा कर में ने अदा किया, फिर फ़रमाया क़िब्ले की तरफ मुँह कर के बैठ जाओ, में बैठ गया, फिर फ़रमाया के सूरह बकरा पढ़ो में ने पढ़ी, फिर फ़रमाया 21/ मर्तबा कलमाए सुब्हान! पढ़, में ने पढ़ा, बाद में खड़े हो कर मुँह आसमान की तरफ किया, और मेरा हाथ पकड़ कर फ़रमाया के में ने तुझे अल्लाह पाक तक पंहुचा दिया, जूंही ये फ़रमाया कैंची अपने दस्ते मुबारक में लेकर मेरे सर पर चलाई, और चार तुरकी कुलाहे अकीदत मंद मेरे सर पे रखी, और ख़ास गुदड़ी अता फ़रमाई, फिर फ़रमाया बैठ जा में बैठ गया,
फिर फ़रमाया के हमारे खानवादे में आठ पहर का मुजाहिदा होता है, आज तुम मुजाहिदे में मशगूल हो जाओ, आप रदियल्लाहु अन्हु! मुजाहिदे में मशगूल हो गए, जब दूसरे दिन मुजाहिदे से बाहर तशरीफ़ लाए, तो आप ने फ़रमाया: बैठ, और एक हज़ार मर्तबा सूरह इखलास पढ़, में ने पढ़ी, फिर फ़रमाया आसमान की तरफ देखा, में ने आसमान की तरफ निगाह की, आप ने फ़रमाया, तुझे क्या दिखाई देता है, में ने अर्ज़ किया के अर्शे आज़म तक सब कुछ दिखाई दे रहा है, फिर फ़रमाया ज़मीन की तरफ देख, में ने ज़मीन की तरफ देखा, फिर आप ने पूछा कहाँ तक दिखाई देता है? में ने अर्ज़ किया के हिजाबे अज़मत तक, फ़रमाया के आंख बंद कर, जब में ने आंख बंद की, फिर फ़रमाया खोल, मेने खोली, मुझे दो उँगलियाँ दिखा कर फ़रमाया, तुझे क्या दिखाई देता है, में ने अर्ज़ किया अठारह 18000/ हज़ार किस्म की मख़लूक़ात, तो आप ने फ़रमाया जा तेरा काम बन गया सवर गया, एक ईट पास में रखी हुई थी, आप ने फ़रमाया उस को उलट दो, में ने उल्ट दी, तो उस के नीचे एक मुठ्ठी सोने के दीनार थे, हज़रत ख्वाजा उस्मान हारूनी रदियल्लाहु अन्हु, ने फ़रमाया इसे ले जा कर फकीरों को सदका कर दो, में ने सदका कर दी, आपने फ़रमाया चंद रोज़ तक हमारी खिदमत में रहो, में ने अर्ज़ किया बंदा हाज़िर है ।
सिलसिलए चिश्तिया में बैअत
सरकार ख्वाजा गरीब नवाज़ रदियल्लाहु अन्हु! ने हज़रत ख्वाजा उस्मान हारूनी रदियल्लाहु अन्हु, से उन के वतन हारुन में पहली बैअत का शराफ हासिल किया था, उस के बाद से पीरो मुर्शिद आप रदियल्लाहु अन्हु! से बेहद मुहब्बत करने लगे, ये उसी मुहब्बत का नतीजा था के हज़रत ख्वाजा उस्मान हारूनी रदियल्लाहु अन्हु, सरकार ख्वाजा गरीब नवाज़ रदियल्लाहु अन्हु! को शरफ़े मुलाकात बख्शने और अपने फियूज़ो बरकात से मालामाल करने के लिए बाग्दाद् शरीफ तशरीफ़ ले गए और इस के लिए तवील सफर किया, इधर पीरो मुर्शिद की आमद की खबर सुनकर सरकार ख्वाजा गरीब नवाज़ रदियल्लाहु अन्हु! भी बाग्दाद् शरीफ हाज़िर हुए, और पीरो मुर्शिद से बैअत सानी का शराफ हासिल किया, इस बैअत की तफ्सील और इसी वाकिए को सय्यदुल उलमा हज़रत मुफ़्ती सय्यद आले मुस्तफा मारहरवी रहमतुल्लाह अलैह “किताब अहले सुन्नत की आवाज़” में तहरीर फरमाते हैं:
मुसलमानो का ये दुआ गो, मोईनुद्दीन हसन! बाग्दाद् शरीफ में हज़रत ख्वाजा जुनैद बगदादी रहमतुल्लाह अलैह की मस्जिद में हज़रत ख्वाजा उस्मान हारूनी रहमतुल्लाह अलैह की कदम बोसी का शरफ़ मिला, जब इस दुर्वेश ने सरे नियासाज़ ज़मीन पर रखा, तो पीरो मुर्शिद ने इरशाद फ़रमाया के दो रकअत नमाज़ अदा करो, में ने नमाज़ अदा की, फिर फ़रमाया क़िब्ला रू बैठ जाओ, में बैठ गया, फिर हुक्म हुआ सूरह बकरा पढ़, मेने पढ़ी, फिर हुक्म हुआ के इक्कीस बार दुरूद शरीफ पढ़, में ने पढ़ा, हज़रत! ने आसमान की जानिब निगाह उठाई और फ़कीर का हाथ पकड़ कर फ़रमाया, में ने तुझ को खुदा तक पहुंचाया और उस की बारगाह का मकबूल बना दिया,
इस के बाद मुर्शिद ने मेरे सर के बाल कैची से काटे, और कुलाहे चार तुर्की, मुझे पहनाई, फिर अपना ख़ास गलीम (उूँन का कुरता) अता फ़रमाया, फिर हुक्म दिया के 1000/ बार सूरह इखलास पढ़, मेने सूरह इखलास पढ़ी, फिर फ़रमाया के हमारे खानवादे में एक दिन और रात मुजाहिदा करने का अमल है तो आज मुजाहिदे में मशगूल हो जाओ, आप रदियल्लाहु अन्हु! ने मुर्शिद के हुक्म की तामील की, एक दिन रात मुजाहिदे में मशगूल रहे,
दुसरे दिन जब हाज़िर हुए, तो मुर्शिद ने फ़रमाया बैठ जा, और एक हज़ार बार सूरह इखलास पढ़ में ने पढ़ी, फिर फ़रमाया आसमान की जानिब देख, में ने देखा दरयाफ्त फ़रमाया के कहाँ तक नज़र आ रहा है में ने अर्ज़ की अर्शे आज़म तक, फ़रमाया ज़मीन की तरफ देख, में ने देखा, फ़रमाया कहा तक देख रहा है में ने अर्ज़ की तह्तुस सरा तक, फ़रमाया फिर एक हज़ार बार सूरह इखलास पढ़, में ने फिर पढ़ी, फिर फ़रमाया आसमान की जानिब देख, में ने देखा, फिर पूछा अब कहा तक देख रहा है, में ने अर्ज़ की हिजाबे अज़मत तक फ़रमाया आँखें बंद कर में ने ऑंखें बंद की, फ़रमाया खोल, में ने खोली, फिर अपनी उँगलियाँ दिखला कर इस्तिफ़सार (पूछना) फ़रमाया, क्या नज़र आ रहा है में ने अर्ज़ की अठारह 18000/ आलम, देख रहा हूँ, फिर इस के बाद सामने पड़ी हुई एक ईट उठाने का हुक्म दिया, में ने उसे उठा लिया तो उस के नीचे से मुठ्ठी भर दीनार निकले, फ़रमाया इन को ले जा, कर फुकरा में तकसीम कर दो, में ने हुक्म की तामील की, और हाज़िरे खिदमत हुआ, हज़रत ख्वाजा उस्मान हारूनी रहमतुल्लाह अलैह ने इरशाद फ़रमाया के मोईनुद्दीन हसन! अब हमारी खिदमत ही में रहा करो में ने अर्ज़ किया ताबे फ़रमान हूँ।
खिरकाए खिलाफत
हज़रत ख्वाजा उस्मान हारूनी रहमतुल्लाह अलैह की मुरीदी में दाखिल होने के बाद सरकार ख्वाजा गरीब नवाज़ रदियल्लाहु अन्हु! ने अपने पीरो मुर्शिद की तकरीबन 20/ साल तक खिदमत की, और इस मुद्दत में आप ने हज़रत ख्वाजा उस्मान हारूनी रहमतुल्लाह अलैह के साथ काफी सेरो सियाहत की आप को अपने पीरो मुर्शिद से हद्द दर्जा अक़ीदतो मुहब्बत थी, ये कैफियत थी के हज़रत ख्वाजा उस्मान हारूनी रहमतुल्लाह अलैह जहाँ कहीं सफर करते सरकार ख्वाजा गरीब नवाज़ रदियल्लाहु अन्हु!
इन का लिबास, बिस्तर, और तोशए सफर अपने सर पर रख कर चलते थे, आप रदियल्लाहु अन्हु! की इस वालिहाना मुहब्बत और मुख्लिसाना खिदमत से मुर्शिदे करीम! के दिल पर गहरा असर मुरत्तब हुआ, इसी सबब से आप पीरो मुर्शिद के खासुल ख़ास और मुकर्रब महबूब बन गए, चुनाचे एक मर्तबा फ़रमाया: “मोईनुद्दीन खुदा का महबूब है और मुझे इस की मुरीदी पर फख्र है” आखिरकार आप रदियल्लाहु अन्हु! बाग्दाद् शरीफ में अपने मुर्शिद! से रुखसत हुए तो मुर्शिदे कामिल ने आप रदियल्लाहु अन्हु! को बा कमाले मुहब्बत खिरकए खिलाफत! अता किया, और जानशिनी के मनसब पर फ़ाइज़ किया, उस वक़्त आप रदियल्लाहु अन्हु! की उमर तकरीबन 52/ साल थी, हज़रत ख्वाजा उस्मान हारूनी रहमतुल्लाह अलैह ने तबर्रुकाते मुस्तफ़वी (जो सिलसिलए चिश्तिया में चले आ रहे थे) सरकार ख्वाजा गरीब नवाज़ रदियल्लाहु अन्हु! को खिलाफत अता फरमाते वक़्त इनायत फरमाए, और चंद अहम नसाहे (नसीहत की जमा) फरमाने के बाद अपना असा मुबारक भी, आप को दे दिया, इस के अलावा नालैंन शरीफ, और मुसल्ला भी अता फ़रमाया नीज़ इरशाद फ़रमाया के:
ये तबर्रुकात हमारे मशाइख़ीने तरीकत की यादगार हैं जो हुज़ूर नबी करीम सलल्लाहु अलैही वसल्लम से हम तक पहुंचे थे, इन को इस तरह रखना जिस तरह हमने रखा, और उसी को ये यादगारें देना जिस को तुम अहिल पाओ और जो कुछ हम ने तुम को बताया इस पर अमल करना ताके क़यामत के दिन शर्मिंदगी न हो, मखलूक से तमअ लालच नहीं रखना, आबादी से दूर रहना और किसी से कुछ तलब ना करना।
आप का शजरए तरीकत
सरकार ख्वाजा गरीब नवाज़ रदियल्लाहु अन्हु! का शजरए तरीकत इस तरह है:।
1, सुल्तानुल हिन्द, ख्वाजाए, ख्वाजगान, नाइबुन नबी फिल हिन्द अताए रसूल, हज़रत ख्वाजा गरीब नवाज़ मुईनुद्दीन चिश्ती
2, हज़रत ख्वाजा उस्मान हारूनी चिश्ती
3. हज़रत ख्वाजा हाजी शरीफ ज़न्दनी चिश्ती
4. हज़रत ख्वाजा कुतबुद्दीन मौदूद चिश्ती
5. हज़रत ख्वाजा नासिरुद्दीन अबू युसूफ चिश्ती
6. हज़रत ख्वाजा अबू मुहम्मद चिश्ती
7. हज़रत ख्वाजा शैख़ अबू अहमद अब्दाल चिश्ती
8. हज़रत ख्वाजा शैख़ अबू इसहाक शामी चिश्ती
9. हज़रत ख्वाजा शैख़ मुम्शाद उलू दिनोरी चिश्ती
10. हज़रत ख्वाजा हुबैरा बसरी
11. हज़रत ख्वाजा हुज़ैफ़ा मरअशी
12. हज़रत ख्वाजा इबराहीम इबने अदहम
13. हज़रत अल्लामा ख्वाजा फ़ुज़ैल बिन अयाज़
14. हज़रत शैख़ अब्दुल वाहिद बिन ज़ैद
15. हज़रत सय्यदना ख्वाजा हसन बसरी
16, हज़रते सय्यदना अमीरुल मोमिनीन ख़लीफ़ए चहारुम अली शेरे खुदा रिदवानुल्लाही तआला अलैहिम अजमईन।
बेदारी में हुज़ूर नबी करीम सलल्लाहु अलैही वसल्लम की ज़ियारत
सरकार ख्वाजा गरीब नवाज़ रदियल्लाहु अन्हु! सेरो सिहत करते हुए, मक्का शरीफ पहुंच कर वहां चंद दिनों क़याम फरमाने के बाद मदीना मुनव्वरा ज़ादा हल्लाहु शरफऊं व तअज़ीमा के लिए तशरीफ़ ले गए, और हुज़ूर नबी करीम सलल्लाहु अलैही वसल्लम के मज़ार मुक़द्दस पर हाज़री की सआदत हासिल की, और चंद दिन आप यहाँ मुकीम रहे, एक दिन हुज़ूर नबी करीम सलल्लाहु अलैही वसल्लम के रौज़ाए मुबारक से निदा (आवाज़) आई के मोईनुद्दीन! को बुलाओ, खादिम ने वहां तमाम मौजूदा ज़ायरीन को मुख़ातब कर के आवाज़ दी मोईनुद्दीन किस का नाम है हाज़िर हो, इस के जवाब में कई आवाज़ें आईं, के आप किस मोईनुद्दीन को बुला रहे हैं, यहाँ तो बहुत से गुलाम हाज़िर हैं, खादिम लोट कर फिर आस्तानए पाक पर आए,
दोबारा रौज़ाए मुबारक से आवाज़ आई के मोईनुद्दीन चिश्ती को बुलाओ, फिर क्या था सरकार ख्वाजा गरीब नवाज़ रदियल्लाहु अन्हु! की कैफियत अजीबो गरीब हो गई, लबो पर दुरूदे पाक के फूल सजा कर, रौज़ए रसूल के मुक़द्दस आस्ताने पर बा अदब खड़े हो गए अंदर से आवाज़ आई के क़ुत्बुल मशाइख अंदर आ जाओ, आप रदियल्लाहु अन्हु! बेखुदी और दीवानगी के आलम बा अदब अंदर आ जाओ, आप की किस्मत बेदार हुई के हालते बेदारी में हुज़ूर नबी करीम सलल्लाहु अलैही वसल्लम के जमाले जहाँ आरा के दीदारो अनवार से मुशर्रफ हुए, और आकाए करीम हुज़ूर नबी करीम सलल्लाहु अलैही वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया:
मोईनुद्दीन! तू हमारा ऐन दीन है तुम को हिंदुस्तान जाना होगा है, और वहां एक जगह अजमेर! है, जहाँ मेरे फ़रज़न्द सय्यद हुसैन नामी, दीनी तब्लीग फि सबीलिल्लाह की नियत से गए थे, अब वो शहीद हो गए, जिस के सबब वो जगह काफिरो के तसल्लुत में गई, तुम्हारे कदमो की बरकत से वहां इस्लाम फैलेगा और वहां के काफिर मगलूब होंगे,
फिर हुज़ूर नबी करीम सलल्लाहु अलैही वसल्लम ने एक अनार सरकार ख्वाजा गरीब नवाज़ रदियल्लाहु अन्हु! के हाथ में अता फ़रमाया, और कहा इसमें देखो ताके तुम ये देख कर और जान लो के तुम्हें कहाँ जाना है, हुक्म के मुताबिक आप रदियल्लाहु अन्हु! ने अनार के अंदर निगाह की तो मशरिक से मगरिब तक जो कुछ था सब निगाहों के सामने आ गया, नीज़ शहर अजमेर! और उस की पहाड़ियां वगेरा भी अच्छी तरह नज़र आ गईं, बारगाहे रसूल में मदद की दरख्वास्त करते हुए हिंदुस्तान की तरफ चल पड़े, चुनांचे चालीस अफ़राद का एक मुक़द्दस काफिला भी आप की कियदतो सरबराही में मदीना शरीफ से अजमेर मुकद्द्स के लिए रवाना हुए ।
दूसरी मर्तबा मक्का शरीफ की हाज़री
सरकार ख्वाजा गरीब नवाज़ रदियल्लाहु अन्हु! का सतत्तर 77/ साल अक्सर हिस्सा सफर में गुज़रा, जब अपने पीरो मुर्शिद हज़रत ख्वाजा उस्मान हारूनी रदियल्लाहु अन्हु! से रुखसत हुए तो, मुशाहिदए आलम, और मुतालाए जहाँ और अहलुल्लाह बुज़ुरगाने दीन की ज़ियारत की गर्ज़ से सफर का आगाज़ किया, बहुत से मुल्को और शहरों में तशरीफ़ ले गए, जैसे, खुरासान, मुल्के ईरान का शहर, समरकंद, मुल्के उज़्बेकिस्तान का शहर, बुखारा, मुल्के उज़्बेकिस्तान का शहर, ईराको सउदिया अरब, हारुन, मुल्के ईरान का शहर, बाग्दाद् शरीफ, मुल्के ईराक की राजधानी, किरमान, मुल्के ईरान का शहर, हमदान, मुल्के ईरान का शहर, तबरेज़, मुल्के ईरान का शहर, खरकान, मुल्के ईरान का शहर, हिरात, मुल्के अफगानिस्तान का शहर, दमिश्क, अस्फहान, मुल्के ईरान का शहर, गज़नी, मुल्के अफगानिस्तान का शहर, रै, शुमाली ईरान का तारीखी शहर है, बदख्शां, मुल्के अफगानिस्तान का सूबा, मक्का शरीफ और मदीना शरीफ, मुल्तान, और लाहौर, मुल्के पाकिस्तान के शहर, तशरीफ़ ले गए, और वहां के मर्दाने हक औलियाए किराम से मुलाकात हुई और फियूज़ो बरकात हासिल किए, दौराने सफर जहाँ भी जाते पीरो मुर्शिद की हिदायत के मुताबिक खुद को आम लोगों से अलैहिदा (अलग) रखते थे,
दूसरी मर्तबा सरकार ख्वाजा गरीब नवाज़ रदियल्लाहु अन्हु! मक्का मुकर्रमा ज़ादा हल्लाहु शरफऊं व तअज़ीमा हाज़िर हुए और काबा शरीफ की ज़ियारत से मुशर्रफ हुए, काबे शरीफ का तवाफ़ और इबादतों रियाज़त में मशगूल रहते, एक दिन आप रदियल्लाहु अन्हु! ने काबा मुअज़्ज़मा में गैब से ये आवाज़ सुनी, ऐ मोईनुद्दीन! हम तुझ से खुश हैं, तुझे बख्श दिया, जो कुछ चाहे मांग, ताके आता करूँ, सरकार ख्वाजा गरीब नवाज़ रदियल्लाहु अन्हु! ये सुनकर बहुत खुश हुए, और सज्दाए शुक्र अदा किया, और अल्लाह पाक की बारगाह में अर्ज़ किया, या इलाही! तेरे बंदे मोईनुद्दीन के लिए इससे बड़ी और क्या सआदत हो सकती है, तूने मुझे अपनी बारगाह का मकबूल बना लिया, इसे के बाद अगर कोई आरज़ू है, तो सिर्फ ये है के तू अपने फ़ज़्लो करम से मेरे सिलसिले के मुरीदों को बख्श दे, आवाज़ आई! के ऐ मोईनुद्दीन तू हमारा ख़ास बंदा है, तेरी आरज़ू मुबारक हो, जो तेरे मुरीद और तेरे सिलसिले में क़यामत तक मुरीद होंगे उन सब को बख्श दूंगा,
तुम को हिंदुस्तान की विलायत अता की
हिन्द के राजा हमारे सरकार ख्वाजा गरीब नवाज़ रदियल्लाहु अन्हु! हमा वक़्त अपने प्यारे नाना जान हुज़ूर नबी करीम सलल्लाहु अलैही वसल्लम के मज़ार मुक़द्दस, पर हाज़िर रहते, एक दिन मज़ार शरीफ पर हाज़िर थे, के आप रदियल्लाहु अन्हु! पर गुनूदगी (ओंग, नीँद) आ गई, ख्वाब में आकाए दो जहाँ हुज़ूर नबी करीम सलल्लाहु अलैही वसल्लम की ज़ियारत नसीब हुई, और हुज़ूर नबी करीम सलल्लाहु अलैही वसल्लम ने सरकार ख्वाजा गरीब नवाज़ रदियल्लाहु अन्हु! को बशारत अता की, ऐ मोईनुद्दीन! तुम मेरे दींन के मोईन हो, में ने तुमको हिंदुस्तान की विलायत अता की, हिंदुस्तान से कुफ्रो शिर्क की तारीकी ज़ुल्मत फैली हुई है, तुम अजमेर जाओ! तुम्हारे वुजूदे मसऊद की बरकत से कुफ्रो शिर्क गुमराहीयो बातिल का अँधेरा ख़त्म होगा और इस्लाम की रौशनी का उजाला फ़ैल जाएगा,
इस शानदार पुरबहार! बशारत से सरकार ख्वाजा गरीब नवाज़ रदियल्लाहु अन्हु! बहुत खुश और मसरूर हुए, मगर हैरान थे के अजमेर कहाँ है? अजमेर का रास्ता किधर है? इसी सोचो फ़िक्र में थे के दोबारा आँख लग गई, और हादियो रहबर हुज़ूर नबी करीम सलल्लाहु अलैही वसल्लम आप के ख्वाब में तशरीफ़ ला कर थोड़ी ही देर में मदीना शरीफ से हिंदुस्तान के तमाम रास्ते और अजमेर का तमाम शहर और किला, और पहाड़िया आप रदियल्लाहु अन्हु! को दिखला दिया, फिर एक जन्नती अनार! आप रदियल्लाहु अन्हु! को देख हुज़ूर नबी करीम सलल्लाहु अलैही वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया ऐ मोईनुद्दीन! हम तुम को अल्लाह पाक के सुपुर्द करते हैं, और आप को रुखसत फ़रमाया हिंदुस्तान के लिए।
रेफरेन्स हवाला
(1) मिरातुल असरार
(2) सीयरुल अक्ताब
(3) ख़ज़ीनतुल असफिया
(4) सवानेह शैखुल आलम
(5) सफ़िनतुल औलिया,
(6) सीयरुल औलिया
(7) साबरी इंसाइकिलोपीडिया
(8) ख्वाजगाने चिश्त
(9) हिन्द के मुर्शिदे आज़म
(10) हिन्द के राजा सवानेह ख्वाजा
(11) बज़्मे सूफ़िया
(12) तज़किरा ख्वाजाए अजमेर
(13) ख्वाजा गरीब नवाज़ के 100/ वाक़िआत
(14) सूफ़ियाए किराम और दावते दीन
(15) सीरते ख्वाजा गरीब नवाज़
(16) अख़बारूल अखियार
(17) तारीखे फरिश्ता
(18) मुन्तखाबुत तवारीख
(19) मसालिकुस सालिकीन
(20) मोनिसुल अरवाह
(21) अनीसुल अरवाह
(22) तुज़के जहाँगीरी

