सरकार आला हज़रत इमाम अहमद रज़ा फाज़ले बरेलवी रदियल्लाहु अन्हु की ज़िन्दगी

सरकार आला हज़रत इमाम अहमद रज़ा फाज़ले बरेलवी रदियल्लाहु अन्हु की ज़िन्दगी (पार्ट- 1)

कर अता अहमद रज़ाए अहमदे मुरसल मुझे
मेरे मौलाना हज़रते अहमद रज़ा के वास्ते

आला हज़रत, इमामे अहले सुन्नत, वलिए नेमत, अज़ीमुल बरकत, अज़ीमुल मरतबत, परवानाए शमए रिसालत, मुजद्दिदे आज़म, हामीये सुन्नत, माहीये बिदअत, आलिमे शरीअत, पीरे तरीकत, बाइसे खेरो बरकत, हज़रते अल्लामा मौलाना अल हाज हाफिजों कारी अश्शाह इमाम अहमद रज़ा खान कुद्दीसा सिररुहुन नूरानी अफगानी नसब व नसल के लिहाज़ से अफगान हैं।

आप एक सहाबी की औलाद हैं

आप का नसबी सिलसिला मुल्के अफगानिस्तान के मश्हूरो मारूफ कबीला “बढ़ हेच” से है जो अफगानो के जद्दे अमजद “केस अब्दुर रशीद” (जिन्हें सरकार दो आलम हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की खिदमते आलिया में हाज़री दे कर दीने इस्लाम कबूल करने की सआदत हासिल हुई) के पोते “शर जनून” अल मुलकक्ब शरफुद्दीन के पांच बेटों में से चौथे बेटे “बड़ हेच” से जा मिलता है, “गोया आप एक सहाबीये रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की औलाद से हैं”
(शाह अहमद रज़ा खान बढ़ हेच अफगानी अज़ कलम मुहम्मद अकबर आवान मतबुआ कराची)

आप के खानदान के मूरिसे आला वालियाने कंधार (अफगानिस्तान) के खानदान से थे, सब से पहले आप के खानदान की तारिख में जिन का ज़िक्र मिलता है वो “शहज़ादा सईदुल्लाह खान” हैं।

शहज़ादा सईदुल्लाह खान साहब

वालिए कंधार के साहब ज़ादे और कबीला “बड़ हेच” के पठान थे सलातीने मुगलिया के दौर में सुल्तान मुहम्मद नादिर शाह के साथ लाहौर आए और अज़ीज़ तरीन उहदों से नवाज़े गए, बादशाह दिल्ली की तरफ से उन की मेहमान नवाज़ी का हुक्म हुआ, पाकिस्तान के शहर लाहौर का “शीश महल” उन को रिहाइश के लिए अता हुआ जो आज भी मौजूद है, उनकी शाही मेहमान नवाज़ी होने लगी, इन्हें अपने मुस्तकबिल के लिए कुछ करना ज़रूरी था, लिहाज़ा दिल्ली तशरीफ़ लाए, यहाँ इन की बड़ी इज़्ज़त वक़अत हुईं चंद दिनों में वो फौज के बड़े उहदे “शीश हज़ारी” पर फ़ाइज़ हुए और दरबारे शाही की तरफ से आप को “शुजाअत जंग” का ख़िताब मिला।
(मुजद्दिदे इस्लाम अज़ मौलाना नसीम बस्तवी मतबूआ रज़ा अकेडमी लाहौर)

शहज़ादा सआदत यार खान साहब

आप शहज़ादा सईदुल्लाह खान साहब के शह ज़ादे थे, हुकूमते मुगलिया की तरफ से बगावत फिरो करने के लिए “रोहील खंड” भेजा गया था, जिस की फतह याबी पर आप को बरेली का सूबे दार बना दिया गया, और इस ज़िले में उनको एक जागीर अता हुई जो 1857, ईसवी की जंगे आज़ादी में ज़ब्त करली गई, आपने बरेली शरीफ को मुस्तकिल सुकूनत के लिए पसंद फ़रमाया।
(सीरते आला हज़रत अज़ अल्लामा हसनैन रज़ा खान मतबूआ बरकाती पब्लिशर कराची)

मौलाना मुहम्मद आज़म खान साहब

आप सआदत यार खान साहब के बेटे थे, हुकूमते वक़्त की तरफ से एक मुमताज़ उहदे पर काइम थे, इस खानदान में आप सब से पहली शख्सीयत हैं जिन्होंने हुकूमत व वज़ारत को खेर बाद कह कर “फ़क़ीरी” इख्तियार फ़रमाई और ज़ुहदो रियाज़त में मशगूल हो गए, बरेली शरीफ के मुहल्लाह “मेमार” से मुत्तसिल एक मैदान में डेरा लगा लिया, ये जगह आज भी “शहज़ादे का तकिया” के नाम से मशहूर है आप साहिबे करामत बुज़रुग थे।

लो अपना दोशाला ले जाओ

आप के साहब ज़ादे हर जुमेरात को सलाम करने हाज़िर हुआ करते, एक मर्तबा जाड़े यानि सर्दी के मौसम में हाज़िर हुए तो देखा के वालिदे गिरामी आग जलाए तशरीफ़ फरमा हैं और जिस्म पर कोई गरम पोशाक नहीं तो फ़ौरन अपना बेश कीमत दोशाला उतार कर वालिदे गिरामी के कन्धों पर डाल दिया, उन्होंने निहायत इस्तगना से दोशाला उतार कर भड़कती हुई आग में डाल दिया, साहबज़ादे के दिल में ख्याल आया काश जलाने के बजाए किसी और को दे देते, दिल में ये ख्याल आना ही था वालिदे गिरामी ने आग में से दोशाला खींचा (जिस पर आग ने कुछ भी असर न किया था) और साहबज़ादे की तरफ फेंकते हुए ये इरशाद फ़रमाया: फ़क़ीर के यहाँ धुकड़ फुकड़ का मुआमला नहीं चलता लो अपना ये “दोशाला” ले जाओ। (करामाते आला हज़रत अज़ इकबाल अहमद रज़वी मतबूआ कराची)

हाफ़िज़ काज़िम अली खान साहब

आप आज़म अली खान साहब के साहबज़ादे और शहर “बदायूं” के तहसीलदार थे, दोसो सवारों की बटालीन (फौज) खिदमत में रहा करती थी, आप ने कोशिश फ़रमाई थी के सलतनाते मुगलिया और अंग्रेज़ो में जो नज़आ झगड़ा है वो खत्म हो जाए चुनांचे आप इस सिलसिले में कलकत्ता भी तशरीफ़ ले गए, (मुजद्दिदे इस्लाम अज़ मौलाना नसीम बस्तवी मतबूआ रज़ा अकेडमी लाहौर)

हाफ़िज़ काज़िम अली खान साहब

हाफ़िज़ काज़िम अली खान साहब आसिफुद दौला के यहाँ वज़ीर भी रहे, इन्होने तीन शादियां कीं पहली अहलिया मुहतरमा (बीवी) से तीन औलादें हुईं,
(1) इमामुल उलमा मौलाना रज़ा अली खान साहब (आला हज़रत के जद्दे अमजद दादा जान)
(2) रईसुल हुक्मा हकीम तकी अली खान साहब
(3) ज़ीनत बेगम
दूसरी अहलिया मुहतरमा (बीवी) से तीन लड़कियां हुईं,
(1) बदरुन्न निसा
(2) कमरुन्न निसा
(3) सदरुन्न निसा
तीसरी अहलिया मुहतरमा (बीवी) से एक साहबज़ादे पैदा हुए,
(1) जाफर अली खान साहब

"मौलाना शाह रज़ा अली खान साहब" 

पैदाइश व तालीमों तरबियत

आप सरकार आला हज़रत इमाम अहमद रज़ा खान फाज़ले बरेलवी रदियल्लाहु अन्हु के जद्दे अमजद दादा जान हैं, 1224, हिजरी में पैदा हुए, आप ने मौलाना खलीलुर रहमान (शहर टोनक, राजिस्थान) से जुमला उलूमे मुतादाविला हासिल किए, 22, साल की उमर में सनादे फरागत हासिल की, हुकूमत व जाँबाज़ी से इस खानदान का रिश्ता आप ही के दमकदम से मुनक़तअ हुआ और ये खानदान मुस्तकलन फ़क़्र फ़क़ीरी दरवेशी से मुशर्रफ हो गया, आप के इल्मों फ़ज़्ल की शोहरत हिंदुस्तान में दूर दराज़ मक़ामात तक फैली, आप उलूमे ज़ाहिरी के अलावा उलूमे बातनि ख़ुसूसन तसव्वुफ़ में अच्छी दस्तरस रखते थे, मौलाना हसन अली इल्मी जिनके ख़ुत्बे “ख़ुत्बाए इल्मी” के नाम से मशहूर हैं वो आप ही के शागिर्द हैं,

अख़लाक़ व आदात

सलाम करने में हमेशा पहल करते थे, लोगों के दिलों में ये आरज़ू मचल कर रह जाती के वो सलाम में पहल करें, कभी अपने नफ़्स के लिए ग़ज़बनाक नहीं हुए, फ़साहते कलाम, ज़ुहदो कनाअत, और हिल्म व तवाज़ेह जैसी दौलत बे बहा से मालामाल किए गए थे,

करामात

आप की ज़ाते गिरामी से बहुत सो करामाते ज़हूर में आईं :

उसने मुझे रंगा, अल्लाह उसे रंग दे

एक मर्तबा हिंदुओं के तुहार “होली” के मोके पर बाज़ार से गुज़र रहे थे, के एक हिन्दू औरत ने आप पर रंग डाल दिया, एक जोशीले नौजवान ने उसे मारना चाहा तो आप ने फ़रमाया “क्यों तशद्दुद करते हो उसने मुझे रंगा अल्लाह पाक उसे रंग दे” इतना ज़बान मुबारक से निकलना था के वो औरत फ़ौरन आप ने कदमो में आ गिरी, मुआफी मांगी, और मुशर्रफ बा इस्लाम हुई, आप ने वहीँ उस नौजवान से उस का अक़्द यानि निकाह कर दिया।

हज़रत का असा और छतरी रखी हुई है

एक मर्तबा एक साहब हाज़िरे खिदमत हुए और आप से कुछ रकम क़र्ज़ मांगी, आप ने फ़रमाया देखो बेजा खर्च ना करना, वो साहब आज़ाद मिजाज़ थे रकम ले कर तवाइफ़ के यहाँ चले गए, देखा के हज़रत का असा और छतरी रखी हुई है उलटे पाऊं वापस हुए, दूसरी के यहाँ गए वहां भी यही हाल देखा, तीसरी के यहाँ गए वहां भी यही हाल देखा आखिर कार आजिज़ हो कर खिदमत में हाज़िर हुए और सच्चे दिल से तौबा की । (करामाते आला हज़रत अज़ इकबाल अहमद रज़वी मतबूआ कराची)

दुश्मन देख न सके

1857, ईसवी के बाद जब अंग्रेज़ों का तसल्लुत कब्ज़ा हिंदुस्तान पर हुआ और उन्होंने शदीद मज़ालिम ढाए तो लोग डर के मारे परेशान फिरते थे बड़े लोग अपने अपने मकान छोड़कर गाऊं चले गए लेकिन “मौलाना रज़ा अली खान साहब कुद्दीसा सिररुहुन नूरानी” मुहल्लाह “ज़खीरा” में अपने मकान में बराबर तशरीफ़ रखते रहे और पांचों नमाज़ें जमात के साथ मस्जिद में अदा किया करते थे,

एक दिन उधर से अँगरेज़ फौजियों का गुज़र हुआ, उन्होंने चाहा के मस्जिद में अगर कोई शख्स हो तो उसे पकड़ कर मारे, मस्जिद में घुसे इधर उधर घूम आए लेकिन आप उन्हें नज़र ना आए, बोले के मस्जिद में कोई नहीं है हालांके आप मस्जिद में ही मौजूद थे।

अब मुकदमा फतह हो गया

हज़रत मौलाना रज़ा अली खान साहब कुद्दीसा सिररुहुन नूरानी की करामात बादे विसाल भी ज़ाहिर हुईं, जिनका ज़िक्र “मलफ़ूज़ाते आला हज़रत” में खुद सरकार आला हज़रत इमाम अहमद रज़ा खान फाज़ले बरेलवी रदियल्लाहु अन्हु यूं करते हैं, हज़रत जद्दे अमजद दादा जान ( मौलाना रज़ा अली खान साहब कुद्दीसा सिररुहुन नूरानी) बी हम्दिही तआला मेरे साथ इस वक़्त तक वही मुहब्बत है जो पहले थी,

एक मर्तबा जाएदाद का झगड़ा था और वो भी ऐसा के ज़ाहिरी रिज़्क़ बंद होने के असबाब थे, उसी दौरान में ने ख्वाब देखा के के जद्दे अमजद दादा जान अरबी घोड़े पर सवार, तमाम आज़ा निहायत रोशन, अरबी लिबास में तशरीफ़ लाए, में उसी फ़क्त मर खड़ा था, हज़रत करीब आ कर घोड़े से उतरे और फ़रमाया: बशीरुद्दीन वकील के यहाँ जाना, आँख खुली में ने कहा अब मुकदमा कामयाब हो गया चुनांचे सुबह ही को मुक़दमे में कामयाबी हो गई। (मलफ़ूज़ाते आला हज़रत)

औलादे अमजाद

आप ने दो निकाह फरमाए, पहली बीवी से एक साहबज़ादे और एक साहबज़ादी पैदा हुईं,
(1) मौलाना नकी अली खान साहब (आला हज़रत के वालिद मुहतरम)
(2) ज़ौजा मेहदी अली खान साहब
दूसरी अहलिया मुहतरमा से दो साहबज़ादिया हुईं,
(1) एक बीबी जान,
(2) मुस्तजाब बेगम

विसाले पुर मलाल
2, जमादीयुल ऊला 1286, हिजरी में आप ने इस दारेफानी से रेहलत फ़रमाई।

मौलाना शाह नकी अली खान साहब कुद्दीसा सिररुहुन नूरानी

मौलाना नकी अली खान साहब कुद्दीसा सिररुहुन नूरानी सरकार आला हज़रत इमाम अहमद रज़ा खान फाज़ले बरेलवी रदियल्लाहु अन्हु के वालिदे गिरामी हैं, आप ज़बरदस्त आलिमे दीन, कसीरुत तसानीफ़ बुज़रुग और बड़े पाए के आशिके रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम थे, मौलवी रहमान अली किताब “तज़किराए उल्माए हिन्द” में आप का तज़किराह यूं लिखते हैं,

पैदाइश व तालीमों तरबियत

रईसुल अतकिया हज़रत मौलाना शाह नकी अली खान साहब कुद्दीसा सिररुहुन नूरानी बरेली शरीफ में 1, रजाबुल मुरज्जब 1246, हिजरी मुताबिक 1830, ईसवी को मौलाना रज़ा अली खान साहब के यहाँ पैदा हुए।

अपने वालिद माजिद से तालीम व तरबियत पाई और इन्ही से दरसी उलूम से फरागत हासिल की, अल्लाह पाक ने उनको अपने हम असरों में मआश व मआद में मुमताज़ फ़रमाया था, फितरी शुजाअत के अलावा सखावत, तवाज़ेह और इस्तगना की सिफ़ात से मुत्तसिफ़ थे, अपनी उमरे अज़ीज़ को सुन्नत की इशाअत और बिदअत के रद्द में गुज़ारी। (तज़किराए उल्माए हिन्द)

अख़लाक़ व आदात

सरकार आला हज़रत इमाम अहमद रज़ा फाज़ले बरेलवी रदियल्लाहु अन्हु अपने वालिद मुहतरम के तज़किरे में तहरीर फरमाते हैं: फिरासते सादिका की ये हालत थी के जिस मुआमले में जो कुछ फ़रमाया वही ज़हूर में आया, अकेले मआश व मआद दोनों का बर वजहे कमाल इज्तिमा बहुत कम सुना, यहाँ आँखों से देखा, इस के अलावा सखावत शुजाअत उलू हिम्मत, करम व मुरव्वत, सदक़ाते ख़ुफ़िया मीरासे जलीय, बुलन्दिये इकबाल, दब्दाबाए जलाल, मवालाते फ़क़्र हुक्काम से उजलत, रिज़्के मोरूस पर कनाअत वगेरा।

फाइज़े जलील, व ख़साइले जमीला का हाल वही जानता है जिस ने उस जनाब की बरकते सुहबत से शरफ़ पाया है।
(हयाते आला हज़रत अज़ मलिकुल उलमा ज़फरुद्दीन बिहारी मतबूआ मक्तबए नबविया लाहौर)

इश्के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम

आप को हुज़ूरे अकरम रहमते दो आलम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से कमाल दर्जे का इश्क था, एक बार बीमार हो गए जिस की वजह से नक़ाहत कमज़ोरी बहुत हो गई, हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने अपने फिदाई के जज़्बए महबूब की लाज रखी, और ख्वाब ही में एक प्याले में दवा अता फ़रमाई, जिस के पीने से इफ़ाक़ा आराम हुआ और आप जल्द ही सेहत याब हो गए।
(मौलाना नक़ी अली खान अज़ शहाबुद्दीन रज़वी मतबूआ लाहौर)


आप के इश्के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की गवाही दौरे हाज़िर के “माहिरे रज़वियात” अल्लामा पिरोफ़ैसर मसऊद साहब ने बड़े अनोखे अंदाज़ में अपनी किताब “इश्क ही इश्क” में दी है, सरकार आला हज़रत इमाम अहमद रज़ा फाज़ले बरेलवी रदियल्लाहु अन्हु ने अक्सर उलूमो फुनून अपने वालिद माजिद अल्लामा नक़ी अली खान कुद्दीसा सिररुहुन नूरानी से हासिल किए, वो इल्मे दानिश का बहरे ज़ख़्ख़ार थे, इमाम अहमद रज़ा, के सीने में इल्मो फ़ज़्ल का सैलाब उधर ही से उमंड कर आया है, मगर वो सैलाबे इश्क आला हज़रत के सीने में कहाँ से आया जिस ने सारे जहाँ को अपनी लपेट में ले लिया और एक आलम को मस्त बेखुद कर दिया,? ये भेद नहीं खुलता, दिल इस सर चश्मए साफी की खोज में अरसे से सर गरदा था के एक रोज़ सूरह “आलम नशराह” की तफ़्सीर “अल कलामुल औज़ाह” नज़र से गुज़री, कुरआन शरीफ की आठ मुख़्तसर आयतों की तफ़्सीर बड़े साइज़ के 438, सफ़हात पर फैली हुई है, अल्लाहु अकबर! ये इमाम अहमद रज़ा के वालिद मुहतरम मौलाना नक़ी अली खान कुद्दीसा सिररुहुन नूरानी की तफ़्सीर है जो पहले हिंदुस्तान से शाए हुई और फिर पाकिस्तान से शाए हुईं, इस तफीर को जब गौर से पढ़ा तो आँखें खुल गईं सफा चार से पढ़ते पढ़ते सफा गियारह पर पंहुचा तो यूं महसूस हुआ के जैसे समंदर के किनारे पर मोती बिखरे हों, या जैसे दामने कोह (पहाड़) पर लाल बिखरे हों,

तफ़्सीर में एक तरफ मुफ़स्सिर के इश्को मुहब्बत का आलम नज़र आता है तो दूसरी तरफ उनके इल्मो फ़ज़्ल की शान नज़र आती है, बेशुमार उलूमे अकलिया व नकलिया की मुस्तलीहात और किताबों के नाम आठ सफ़हात में इस तरह प्रो दिए जैसे लड़ी में मोती, बेशक इल्म ख़ादिमें इश्क है उन्होंने इल्म को इश्क की चौखट पर झुका कर बता दिया के हासिल इल्म इश्को मुहब्बत के सिवा कुछ नहीं, अल्लाह पाक और उसके हबीबे करीम हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की मुहब्बत, सफा चार पर सरकारे दो आलम हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का ज़िक्र आया बस फिर क्या था, ज़हन भी रवां, दिल भी रवां, ज़बान भी रवां, कलम भी रवां ज़बान रूकती नहीं कलम ठहरता नहीं एक सीले रवां है जो चलता ही चला जा रहा है, नामे नामी इस्मे गिरामी “मुहम्मद” सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम फ़िक्रों ख्याल के उफ़क पर तुलु हुआ तो झूम झूम गए ऐसा मालूम होता है के सरापाए अक़दस सामने आ गए हों,

“माहिरे रज़वियात” अल्लामा पिरोफ़ैसर मसऊद साहब हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के वो अल काबात मुबारक नकल फरमाते हैं जो हज़रत मौलाना नक़ी अली खान कुद्दीसा सिररुहुन नूरानी ने अपनी किताब “अल कलामुल औज़ाह” में लिखे हैं इन अल काबात मुबारक की ख़ुसूसीयत ये है के इन में बहुत सारी क़ुतुब के नाम भी आ गए हैं और प्यारे आक़ा हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के अल काबात मुबारक भी हो गए हैं मसलन, नुसखाए कीमियाए सआदत, मफ़ातेह फ़तेह कदीर, अहयाए उलूमो कमालात, खाज़िन कंज दकाइक, हिसने हसीन उमता, दुर्रे मुखात्तर बहरे राइक, जामे उसूल, मसदरे सेहा बुखारी व मुस्लिम, बयाज़े अनवारे मासबीह,,

यहाँ तक के हज़रत मौलाना नक़ी अली खान कुद्दीसा सिररुहुन नूरानी के तहरीर करदह, हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के तकरीबन 571, अलक़ाबात मुबारक नकल फरमाने के बाद “माहिरे रज़वियात” अल्लामा पिरोफ़ैसर मसऊद साहब तहरीर फरमाते हैं के अल्लाह अल्लाह! इश्क खाना वीरान साज़ ने कैसा मस्त बे खुद बना दिया? महबूब का ज़िक्र आया, जज़्बात का एक सैलाब उमण्ड पड़ा, कहाँ से चला और कहाँ थमा? फिर भी प्यास बाकी है दिल चाहता है के अभी और ज़िक्र कीजिए,
ये हैं सरकार आला हज़रत इमाम अहमद रज़ा फाज़ले बरेलवी रदियल्लाहु अन्हु के वालिद माजिद हज़रत मौलाना नक़ी अली खान कुद्दीसा सिररुहुन नूरानी, इमाम अहमद रज़ा खान, के सीने में आप ने इश्के मुस्तफा सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का ऐसा नक्श जमाया के पूरा वुजूद सरापा इश्क बन गया और फिर इस पैकरे इश्को मुहब्बत ने मिल्लते इस्लामिया में इश्के मुस्तफा सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की ऐसी रूह फूंकी के मशरिको मगरिब सलातो सलाम के नग्मों से गूंजने लगे।

मुस्तफा जाने रहमत पे लाखों सलाम 
शमए बज़्मे हिदायत पे लाखों सलाम    

बैअतो खिलाफत

1294, हिजरी में हज़रत सय्यद शाह आले रसूल अहमदी मारहरवी कुद्दीसा सिररुहुन नूरानी की बारगाह में पहुचें और उन से बैअत की, तमाम सलासिले जदीदह व क़दीमाह की इज़ाज़तों खिलाफत का हुक्म नामा और सनादे हदीस हासिल की।

ज़ियारते हरमैन तय्येबैन

26, शव्वालुल मुकर्रम 1295, हिजरी को बावजूदे शिद्द्त अलालत व कमज़ोरी खुद हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के बुलाने के सबब (ख्वाब में आप को ये इशारा हुआ था) अज़्मे ज़ियारत व हज मुसम्मम फ़रमाया, हर चंद अर्ज़ की गई के अलालत की ये हालत है आइन्दाह साल पर मुल्तवी कर दो, इरशाद फ़रमाया, मदीना मुनव्वरा ज़ादा हल्लाहु शरफऊं व तअज़ीमा के इरादे से कदम दरवाज़े से बाहर रख लू फिर चाहे रूह उसी वक़्त परवाज़ कर जाए, मक्का शरीफ में हज़रत सय्यद अहमद ज़ैन दहलान वगेरा उल्माए मक्का से दोबारा इल्मे हदीस की सनद हासिल की।

करामात

आप की ज़ाते गिरामी से कई करामात का ज़हूर हुआ।

बारिश शुरू हो गई

एक बार बरेली शरीफ में बारिश नहीं हुई, मखलूके खुदा बहुत परेशान थी, एक रोज़ अहले शहर कसीर तादाद में आप की बारगाह में हाज़िर हुए और दुआ के लिए अर्ज़ किया, आप ने फ़रमाया तुम सब मेरे साथ ईद गह को चलो ताके नमाज़े इस्तसका अदा करें, आप तशरीफ़ ले जा रहे थे के एक गैर मुस्लिम ने फभती! कसी मियां जब तक बारिश ना हो वापस ना लौटना, आप रास्ता तै करते हुए ईद गह पहुंच गए और नमाज़े इस्तसका अदा फ़रमाई, इस के बाद नमाज़ जब दुआ के लिए हाथ उठाया तो यकायक आसमान पर बदल छ गए, अभी दुआ से फारिग भी न हुए थे के बारिश शुरू हो गई इतनी ज़बर दस्त बारिश हुई के लोगों का घरों तक जाना मुश्किल हो गया, आप अपने दौलत कदे पर तशरीफ़ लाए तो वही गैर मुस्लिम मुआफी के लिए हाज़िर हुआ जिसे आप ने मुआफ फरमा दिया, उस रोज़ के बाद लगा तार बारिश होती रही और कहत दूर हो गया। (मौलाना नक़ी अली खान अज़ शहाबुद्दीन रज़वी मतबूआ लाहौर)

मिलेगी मुझ को

“मलफ़ूज़ाते आला हज़रत” में सरकार आला हज़रत इमाम अहमद रज़ा फाज़ले बरेलवी रदियल्लाहु अन्हु ने अपने वालिद मुहतरम के विसाल के बाद भी चंद करामात बयान फ़रमाई हैं, चुनांचे इरशाद फरमाते हैं, गाऊं में एक ज़मीन मेरी ज़मीन के मुत्तसिल एक साहब की थी, वो सूदखोर के हाथ बेचना चाहते थे, उन से कहा गया मुखालिफत की वजह से उन्होंने ना माना, वालिद मुहतरम ख्वाब में तशरीफ़ लाए और फ़रमाया: मुझे नहीं देते सूदखोर को देते हैं और मिलेगी मुझ को, चुनांचे ऐसा ही हुआ। (मलफ़ूज़ाते आला हज़रत)

आप की तसानीफ़

आप की पच्चीस 25, तसानीफ़ का ज़िक्र सरकार आला हज़रत इमाम अहमद रज़ा फाज़ले बरेलवी रदियल्लाहु अन्हु ने फ़रमाया है, जिन में से चंद मशहूर ये हैं,

  1. अल कलामुल औज़ह तफ़्सीर सूरह अलम नशराह
  2. जवाहिरूल बयान
  3. (3) एहसनुल वीआई फी आदाबे दुआ
  4. सुरुरुल क़ुलूब फी ज़िक्रे महबूब

औलादे अमजाद

हज़रत मौलाना नक़ी अली खान रहमतुल्लाह अलैह के यहाँ छेह 6, औलादे हुईं,
तीन साहबज़ादे
(1) आला हज़रत इमाम अहमद रज़ा फाज़ले बरेलवी रदियल्लाहु अन्हु
(2) मौलाना हसन रज़ा खान साहब रहमतुल्लाह अलैह
(3) मौलाना मुहम्मद रज़ा खान साहब रहमतुल्लाह अलैह
और तीन साहबज़ादियाँ
(1) हिजाब बेगम
(2) अहमदी बेगम
(3) मुहम्मदी बेगम बेटों में सब से बड़े “इमाम अहमद रज़ा” थे, इन से छोटे मौलाना हसन रज़ा थे, और सब से छोटे मौलाना मुहम्मद रज़ा थे । (फकीहे इस्लाम अज़ हसन आज़मी मतबूआ कराची)

विसाल मुबारक

हज़रत सय्यदना शाह मौलाना नक़ी अली खान रहमतुल्लाह अलैह ने माहे ज़ुल काइदह की आखरी तारिख 1297,
हिजरी जुमेरात ज़ोहर के वक़्त विसाल फ़रमाया,

वलिदाह माजिदह

आला हज़रत इमाम अहमद रज़ा फाज़ले बरेलवी रदियल्लाहु अन्हु की वलिदाह माजिदह “हुसैनी खानम” बिन्ते नवाब अस्फंद यार बेग एक पाक सीरत व पाक तीनत खातून थीं, शुरू ही से एहकामे शरईया की पाबंद रहीं, कभी कोई काम ख़िलाफ़े शरआ नहीं किया, उनके फ़हम व ज़का और दानिश व ख़िरद के बारे में मौलाना हसनैन रज़ा खान कुद्दीसा सिररुहुन नूरानी रकमतराज़ हैं:

“वो मुगलिया खानदान की बड़ी गय्यूर, इंतिहाई होशमंद और साइबुर राय खातून थी, उन्होंने बड़ी उमर पाई आला हज़रत इमाम अहमद रज़ा फाज़ले बरेलवी रदियल्लाहु अन्हु के अक्सर हालात मुझे इन्हीं से मालूम हुए, हज़रत मौलाना नक़ी अली खान रहमतुल्लाह अलैह अपने खानदान और अहबाब में “सुल्ताने अक्ल” मशहूर थे और आला हज़रत इमाम अहमद रज़ा फाज़ले बरेलवी रदियल्लाहु अन्हु की वालिदाह “वज़ीर अक्ल” कहलाईं।

भाई बहन

“सीरते आला हज़रत” में मौलाना हसनैन रज़ा खान रहमतुल्लाह अलैह ने आला हज़रत इमाम अहमद रज़ा फाज़ले बरेलवी रदियल्लाहु अन्हु के बहन भाईयों का ज़िक्र यूं किया है: आला हज़रत इमाम अहमद रज़ा फाज़ले बरेलवी रदियल्लाहु अन्हु तीन भाई थे, और उनकी तीन बहने थीं सब से छोटी बहन (मुहम्मदी बेगम ज़ौजा किफ़ायतुल्लाह खान) का जवानी ही में इन्तिकाल हो गया था, आला हज़रत इमाम अहमद रज़ा फाज़ले बरेलवी रदियल्लाहु अन्हु भाईयों में सब से बड़े और दो बहनो से छोटे थे, मगर अल्लाह पाक ने उन को इज़्ज़तो वकार में सब से बड़ा कर दिया था, वो अपने बड़ों की इज़्ज़त और छोटों पर शफकत का बर्ताव करते उनकी इज़्ज़त हर छोटा बड़ा यकसां करता था।

विलादत बा सआदत

चौदवी सदी के मुजद्दिद, शरीअते मुहम्मदिया के नासिर व मुअय्यिद, इमामे अहले सुन्नत, आला हज़रत, अज़ीमुल बरकत, आक़ाए नेमत, दरियाए रहमत, मख़्ज़ने इल्मो हिकमत, पैकरे रुश्दो हिदायत, आरिफ़े शरीअत, व तरीकत गव्वासे बहरे हकीकत, व मारफत, ताजदारे विलायत, शैखुल इस्लाम, वल मुस्लिमीन हुज्जतुल्लाह, फिल अरदीन, ताजुल फुहूल, ज़ियाए मिल्लते वददीन, वरिसुल अम्बिया, वल मुर्सलीन, सिराजुल फुकहा वल मुहद्दिसीन, ज़ुब्दतुल आरफीन, वस सालिकींन, हज़रत अल्लामा व मौलाना, हाफिज़ो कारी, मुफ़्ती, हकीम, अल हाज अश्शाह, अबू मुहम्मद, अब्दुल मुस्तफा मुहम्मद अहमद रज़ा फाज़ले बरेलवी रदियल्लाहु अन्हु की विलादत बा सआदत पैदाइश 10, शव्वालुल मुकर्रम 1272, हिजरी मुताबिक 14, जून 1856, ईसवी को बरोज़ हफ्ता ज़ोहर के वक़्त बरेली शरीफ के मोहल्ला जसूली में हुई।
(सवानेह इमाम अहमद रज़ा अल्लामा बदरुद्दीन अहमद क़ादरी मतबूआ सुखर)

नामे नामी व इसमें गिरामी

आप का पैदाइशी नाम “मुहम्मद” है, आप की वालिदा माजिदह मुहब्बत में “अम्मान मियां” पुकारा करती थीं, वालिदा माजिदह और दीगर अइज़्ज़ाह “अहमद मियां” के नाम से पुकारते थे, आप के जद्दे अमजद ने आप का नाम मुबारक “अहमद रज़ा” रखा, और आप का तारीखी नाम “अल मुख्तार” है जब के कुन्नियत अबू मुहम्मद है, और आला हज़रत खुद अपने नाम से पहले “अब्दुल मुस्तफा” लिखा करते थे । (तजल्लियाते इमाम अहमद रज़ा कारी अमानत रसूल रज़वी मतबूआ मक्तबा अल मुस्तफा बरेली शरीफ यूपी)

अल काबात

सय्यदी आला हज़रत इमाम अहमद रज़ा फाज़ले बरेलवी रदियल्लाहु अन्हु के बेशुमार अल्काबात हैं, जिन में से आप का मशहूर तिरिन लक़ब “आला हज़रत” है अल्लामा बदरुद्दीन अहमद क़ादरी रज़वी अपनी किताब “सवानेह इमाम अहमद रज़ा” में “आला हज़रत” के इस लक़ब की वजह तस्मिया कुछ यूं बयान करते हैं: खानदान के लोग इम्तियाज़ व तआरुफ के तौर पर अपनी बोल चाल में उन्हें “आला हज़रत” कहते थे, मआरिफ़ व कमालात और फ़ज़ाइल व मकारिम में अपने मुआसिरिन के दरमियान बरतरी के लिहाज़ से ये अलफ़ज़ अपने ममदूह की शख्सीयत पर इस तरह मुन्तबिक़ चस्पा हो गया के आज मुल्के हिंदुस्तान ही नहीं बल्के बैरूने मुल्क भी अवामो ख्वास ही नहीं बल्के सारी दुनिया की ज़बानो पर चढ़ गया, और अब क़बूले आम की नौबत यहाँ तक पहुंच गई के क्या मवाफ़िक़ क्या मुखालिफ, किसी हल्के में भी “आला हज़रत” कहे बगैर शख्सीयत की ताबीर ही नहीं होती । (सवानेह इमाम अहमद रज़ा अल्लामा बदरुद्दीन अहमद क़ादरी मतबूआ सुखर)

उल्माए हिजाज़ की तरफ से अल्काबात

उल्माए हिजाज़ (मक्का शरीफ व मदीना शरीफ) ने आप को इन अल्काबात से याद फ़रमाया है:
मारफत का आफताब, फ़ज़ाइल का समंदर, बुलंद सितरह, दरियाए ज़ख़्ख़ार, बहरे ना पैद किनार, यकताए ज़माना, दीने इस्लाम की सआदत, दाईराए उलूम का मरकज़, फसीहुल लिसान, यकताए रोज़गार, वगेरा वगेरा और हज़रत अल्लामा इस्माईल खलील मक्की ने तो यहाँ तक फ़रमाया: “अगर इस के हक में ये कहा जाए के वो इस सदी का मुजद्दिद है तो बिला शुबाह हक व सही है”
(फाज़ले बरेलवी और तरके मवालात अज़ पिरोफ़ैसर मसऊद अहमद साहब मतबूआ लाहौर)

हुलिया मुबारक

सय्यदी आला हज़रत इमाम अहमद रज़ा फाज़ले बरेलवी रदियल्लाहु अन्हु का हुलिया मुबारक इस तौर पर है, ऑंखें मोज़ों और खूबसूरत, निगाह क़द्रे तेज़ जो हक़ाइक़ की तह तक पहुंचने में बे मिसाल, पेशानी, कोशादाह बुलंद दमकती हुई, चेहरा मलीह शगुफ्ता शादाब जलाल व जमाल की खुली हुई तफ़्सीर, नाक, जो हमेशा ऊँची सर बुलंद ही जिस ने ख़ारजी और दाखली हर महाज़ पर इस्लाम दुश्मन ताकतों की नाकेँ खाक आलूद कर दीं, आवाज़, निकलती तो दहन से फूल झड़ते निहायत बुलंद, सीना, उलूमो मआरिफ़ का गनजीना हामिले शरीअत व तरीकत, दिल, आईने की तरह साफ शफ़्फ़ाफ़, ज़हनो दिमाग, आलिमाना व मुज्तहदाना बारीक बीं व नुक्ता रस, पंजा फौलादी व असादुल्लाही, जिसे से गुस्तख़ाने रसूल का खून हमेशा टपकता रहा जिसने बड़े बड़े सूरमाओं की कलाईयाँ मरोड़ कर रख दीं, कलम, रवां दवा सय्याल लेकिन मुहतात और ज़िम्मे दार और निडर बे बाक, कदम, जो हमेशा सिराते मुस्तकीम पर गामज़न रहे।

ज़बान साफ थी

सय्यदी आला हज़रत इमाम अहमद रज़ा फाज़ले बरेलवी रदियल्लाहु अन्हु की ज़बान खुली तो साफ थी और बच्चों की तरह कज मज (टेडी) ना थी। (सीरते आला हज़रत अज़ अल्लामा हसनैन रज़ा खान मतबूआ इमाम अहमद रज़ा अकेडमी

मुंबई)बिस्मिल्लाह ख्वानी व अजीबो गरीब वाकिअ

आला हज़रत कुद्दीसा सिररुहुन नूरानी की रस्मे “बिस्मिल्लाह” के मोके पर एक अजीबो गरीब वाकिअ पेश आया, आप के उस्ताज़े मुहतरम ने हस्बे दस्तूर “बिस्मिल्लाहिर रहमानिर रहीम” के बाद “अलिफ़,बा, ता, सा, जीम, वगेरा हूरेफे तहज्जी आप को पढ़ाना शुरू किया, उस्ताज़ के बताने के मुताबिक आप पढ़ते गए, जब “लाम अलिफ़” की नोबत आई, उस्ताज़ ने फ़रमाया कहो “लाम अलिफ़” तो आला हज़रत कुद्दीसा सिररुहुन नूरानी खामोश हो गए और “लाम अलिफ़” नहीं पढ़ा, उस्ताज़ ने दोबारा कहा मियां साहबज़ादे! कहो “लाम अलिफ़” तो आप ने फ़रमाया: ये दोनों हुरूफ़ तो में पढ़ चूका हूँ, अलिफ़ भी पढ़ा और लाम भी पढ़ चूका हूँ, अब दोबारा क्यों पढ़ाया जा रहा है? महफिले “बिस्मिल्लाह ख्वानी” में आप के दादा जान हज़रत मौलाना रज़ा अली खान रहमतुल्लाह अलैह मौजूद थे फ़रमाया बेटा! उस्ताज़ का कहा मानो, जो कहते हैं पढ़ो,

आला हज़रत कुद्दीसा सिररुहुन नूरानी ने हुकम की तामील करते हुए “लाम अलिफ़” पढ़ा लेकिन आप के दादा जान के चेहरे की तरफ मुस्तफ़सिराना निगाह डाली, आप के दादा जान हज़रत मौलाना रज़ा अली खान रहमतुल्लाह अलैह ने अपनी फिरासते इमानि से भांप लिया के गोया ये नन्नाह बच्चा कह रहा है के आज के सबक में तो हुरूफ़े मुफरदाह का बयान है फिर इन के दरमियान एक मुरक़्क़ब लफ्ज़ कैसे आ गया, अगरचे बच्चे की छोटी उमर के एतिबार से लाम के साथ अलिफ़ मिलाने की वजह बयान करना क़ब्ल अज़ वक़्त बात थी मगर आप के दादा जान हज़रत मौलाना रज़ा अली खान रहमतुल्लाह अलैह ने नूरे बातनि से मुलाहिज़ा किया के ये लड़का फ़ज़्ले खुदा से अकलीमे इल्मो फन का ताजदार होने वाला है, इस वक़्त बच्चे की उमर तो ज़रूर छोटी है मगर इस का इदराक शाऊरो समझ बी फ़ज़्लिहि तआला छोटा नहीं, इस लिए आप ने आला हज़रत कुद्दीसा सिररुहुन नूरानी से फ़रमाया बेटा! शुरू में सब से पहला हर्फ़ जो तुमने पढ़ा वो हकीकत में हमज़ाह है अलिफ़ नहीं है और अब लाम के साथ जो हर्फ़ तुम मिला कर पढ़ रहे हो वो अलिफ़ है लेकिन चूंके अलिफ़ हमेशा साकिन रहता है और तनहा साकिन हर्फ़ को किसी तरह पढ़ा नहीं जा सकता इस लिए लाम के साथ अलिफ़ को मिला कर इस का भी तलफ़्फ़ुज़ कराया जाता है, आला हज़रत कुद्दीसा सिररुहुन नूरानी ने दोबारा सवाल किया के अगर यही बात थी तो इसे किसी भी हर्फ़ के साथ मिला सकते थे, मसलन “बा” या “जीम” या “दाल” के साथ भी मिला कर अलिफ़ का तलफ़्फ़ुज़ कराया जा सकता था लेकिन इन सारे हरफ़ों को छोड़ कर “लाम” के साथ “लाम अलिफ़” मिला कर इस की अदायगी, ऐसा क्यों हुआ? लाम, से अलिफ़, का खास रिश्ता क्या है? आला हज़रत कुद्दीसा सिररुहुन नूरानी का ये सवाल सुन कर आप के दादा जान ने जोशे मुहब्बत में आप को गले लगा लिया और दिल से दुआएं दीं फिर फ़रमाया बेटा! “लाम” और “अलिफ़” के दरमियान सूरतन और सीरतन बड़ा गहरा तअल्लुक़ है लिखने में दोनों की सूरत और शक्ल एक दूसरे की तरह है देखो “लाम अलिफ़, लाम लाम” और सीरतन यूं तअल्लुक़ है “लाम” का क्लब “अलिफ़” है और अलिफ़ का क्लब “लाम” है यानि “लाम, अलिफ़, मीम” के बीच में “अलिफ़” और “अलिफ़, लाम, फे” के बीच में लाम है गोया,

मन तू शुदम तू मन शुदी, मन तन शुदम तू जां शुदी 
ता कस  नगोयद बाद  अज़ीं,  मन दीगरम तू दीगरी  

यानि ऐ मुर्शिद तू मुझ में फना हो कर में तू हुआ तू में हुआ में जिस्म बना और तू रूह बना ताके कोई शख्स इस के बाद ये ना कहे के में और हूँ और तू और है, ज़ाहिरी निगाह में तो दादा जान ने इस “अलिफ़ लाम” के मुरक़्क़ब लाने की वजह ब्यान फ़रमाई मगर बातों ही बातों में असरारो हक़ाइक़, रुमूज़ व इशारात के दरयाफ्त व इदराक की सलाहीयत आला हज़रत कुद्दीसा सिररुहुन नूरानी के क्लबों दिमाग में बचपन से ही पैदा फ़रमादी जिस का असर बाद में सब ने अपनी आँखों से देख लिया के आला हज़रत कुद्दीसा सिररुहुन नूरानी अगर शरीअत में हज़रत सय्यदना इमामे आज़म अबू हनीफा रहमतुल्लाह अलैह के कदम बा कदम हैं तो तरीकत में सरकार गौसे आज़म मुहीयुद्दीन शैख़ अब्दुल कादिर जिलानी रदियल्लाहु अन्हु के नाइबे अकरम हैं । (सवानेह इमाम अहमद रज़ा अल्लामा बदरुद्दीन अहमद क़ादरी मतबूआ सुखर)

रेफरेन्स हवाला

  • तज़किराए मशाइखे क़ादिरिया बरकातिया रज़विया
  • सवानेह आला हज़रत
  • सीरते आला हज़रत
  • तज़किराए खानदाने आला हज़रत
  • तजल्लियाते इमाम अहमद रज़ा
  • हयाते आला हज़रत अज़
  • फाज़ले बरेलवी उल्माए हिजाज़ की नज़र में
  • इमाम अहमद रज़ा अरबाबे इल्मो दानिश की नज़र में
  • फ़ैज़ाने आला हज़रत

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