विलादत शरीफ़
काने हकीकत, परवरदए काशानए नुबुव्वत, सनादुल आरफीन, इमामुल मुत्तक़ीन, शैखुल इस्लाम, सरताजुल औलिया, सरखीले उल्माए किराम, क़ुत्बुल अक्ताब, सय्यातुद ताबईन, हज़रत सय्यदना ख्वाजा हसन बसरी रहमतुल्लाह अलैह! की विलादत बसआदत ख़लीफ़ए दोम हज़रते सय्यदना उमर फ़ारूके आज़म रदियल्लाहु अन्हु की शहादत से तकरीबन दो साल क़ब्ल 21/ या 22/ हिजरी मुताबिक 642/ ईसवी को मदीना मुनव्वरा ज़ादा हल्लाहु शरफऊं व तअज़ीमा में हुई, चूंके आप की वालिदा माजिदा हज़रते उम्मे सलमा रदियल्लाहु अन्हा की कनीज़ थीं, हज़रत सय्यदना ख्वाजा हसन बसरी रहमतुल्लाह अलैह! की इस तरह परवरिश हुई के आप इन पर बेहद शफ्कतो महरबानी फरमाती थीं, चुनांचे आप की वालिदा माजिदा किसी काम से बाहर चली जातीं, और आप रोने लगते तो हज़रते उम्मे सलमा रदियल्लाहु अन्हा बहलाने के लिए अपना दूध इन को पिलातीं इस तरह आप को उम्मुल मोमिनीन हज़रते उम्मे सलमा रदियल्लाहु अन्हा की रज़ाअत का शरफ़ हुआ, जो आप की खुश बख्ती की अलामत है,
वालिद माजिद
आप के वालिद माजिद का इस्म मुबारक “यसार” था, जो हज़रते ज़ैद बिन साबित रदियल्लाहु अन्हु के गुलाम थे।
इस्मे गिरामी
आप का नामे नामी इस्मे गिरामी कुन्नियत “अबू मुहम्मद” और बाज़ लोगों के नज़दीक “अबू सईद” और “अबी नस्र” है।
तालीमों तरबियत
हज़रत सय्यदना ख्वाजा हसन बसरी रहमतुल्लाह अलैह! का नाम सूफ़ियाए किराम रहमतुल्लाहि तआला अलैहिम में सरे फहरिस्त है, अकाबिर ताबईन में से हैं, आप की नशो नुमा काशानए नुबुव्वत में हुई, उम्मुल मोमिनीन हज़रते उम्मे सलमा रदियल्लाहु अन्हा ने अपना दूध पिलाया, ये उन चंद कतरों की बरकतें है, अल्लाह पाक ने आप के सीने में रख दीं, हज़रते उम्मे सलमा रदियल्लाहु अन्हा दुआ किय करती थीं, के या अल्लाह तू इस को मुक़्तदाए ख़ल्क़ बना दे, चुनांचे आप ने कसीर सहाबाए किराम की सुहबत हासिल की, और पेशवाए ख़ल्क़ बने।
आप के फ़ज़ाइलो कमालात
हज़रत सय्यदना ख्वाजा हसन बसरी रहमतुल्लाह अलैह! ऐसे मुक़द्दस दौर में पैदा हुए थे, जब के अकाबिर सहाबाए किराम की सुहबत मिली, जो इस्लामी तालीमात का ज़िंदह नमूना और अख़लाके नबवी की मुजस्सम तस्वीर थे, इस लिए उनका दामने इल्मो अमल, फ़ज़्लो कमाल, ज़ुहदो वरा, तकवाओ तदय्युन मुत्तकियो परहेज़गार, जुमला अख़लाक़ी और रूहानी फ़ज़ाइलो महासिन से मालामाल हो गए, इल्मे तफ़्सीर, इल्मे हदीस, अदब व लुग़त, शरीअतो तरीकत व तसव्वुफ़ का ऐसा चश्मा थे, जिससे तिश निगाने उलूमो मुआरफत अपनी प्यास बुझाते थे, हज़रत अल्लामा नबवी रहमतुल्लाह अलैह फरमाते हैं: वो (हसन बसरी) मशहूर आलिमे दीन थे, उन की जलालते शान पर सब का इत्तिफाक है, हज़रत इमाम शुआबि रहमतुल्लाह अलैह फरमाते हैं: में ने मुल्के ईराक के किसी शख्स को भी (हसन बसरी) से अफ़ज़ल नहीं पाया, हज़रत दाता गंज बख्श अली उस्मान हजवेरी रहमतुल्लाह अलैह फरमाते हैं: अहले तरीकत में आप की क़द्रो मन्ज़िलत बहुत ज़ियादा है, इल्मो अमल मुआमलात में आप बहुत अच्छे और लतीफ़ इशारात मन्क़ूल हैं, हज़रत इमाम बाकर रदियल्लाहु अन्हु फरमाते हैं: इन की बातें अम्बिया अलैहिमुस्सलाम की बातों के मुशाबेह हैं, तबकात इबने सअद! में है के: आप बुलंद पाया आलिम, सिका, हुज्जत, दीनो शरीअत के अमीन, इबादत गुज़ार सूफी मशरब, कसीरुल इल्म, फसीहुल बयान, और हसीनो जमील थे।
बैअतो खिलाफत
इल्मे बातिन की तालीमों तरबियत हज़रते अली शेरे खुदा कर्रामल्लाहु तआला वजहहुल करीम से पाई इन्ही से बैअत हुए, और खिरकए खिलाफत हासिल किया, साहिबे सीयारुल अक्ताब! रकम तराज़ हैं: के हज़रत सय्यदना ख्वाजा हसन बसरी रहमतुल्लाह अलैह! हज़रते अली शेरे खुदा कर्रामल्लाहु तआला वजहहुल करीम के जय्यद खुलफाए किराम में से थे, खिरकए फ़क्ऱो इरादत हज़रते अली शेरे खुदा कर्रामल्लाहु तआला वजहहुल करीम से मिला था, और ये कम्बल का वो खिरका था, जो शबे मेराज हुज़ूर नबी करीम सलल्लाहु अलैही वसल्लम को अल्लाह पाक की बारगाह से मिला था, और हुज़ूर नबी करीम सलल्लाहु अलैही वसल्लम ने हुक्मे इलाही से हज़रते अली शेरे खुदा कर्रामल्लाहु तआला वजहहुल करीम को अता फरमा दिया था, जिसे हज़रते अली शेरे खुदा कर्रामल्लाहु तआला वजहहुल करीम ने हज़रत सय्यदना ख्वाजा हसन बसरी रहमतुल्लाह अलैह! को अता कर दिया था, हज़रत सय्यदना ख्वाजा हसन बसरी रहमतुल्लाह अलैह! हज़रते इमामे हसन रदियल्लाहु अन्हु, और हज़रत ख्वाजा कुमैल बिन ज़ियाद रदियल्लाहु अन्हु से भी फैज़ हासिल किया था, इस तरह हज़रत सय्यदना ख्वाजा हसन बसरी रहमतुल्लाह अलैह! की एक ज़ात तमाम उलूमो मआरिफ़ का मख़ज़न बन गई थी।
आप ने बसरा के मिम्बर तुड़वा दिए
हज़रत सय्यदना ख्वाजा हसन बसरी रहमतुल्लाह अलैह! कम सुखन थे, अक्सर औकात ख़ल्वत में बैठ कर औरादो अज़कार में मसरूफ रहते थे, तालिबाने इल्मो मारफअत और खल्के खुदा की हिदायतो रहनुमाई के लिए मजलिसे इरशादो तलकीन मुनअकिद करते थे, और अहले ज़ौक़ आप के अनमोल कलमात से मुस्तफ़ीद होते, जब हज़रते अली शेरे खुदा कर्रामल्लाहु तआला वजहहुल करीम शहरे बसरा तशरीफ़ लाए, और तमाम वाइज़ीन को वाइज़ तक़रीर करने से मना फ़रमाया और तमाम मिम्बर तोड़ दिए गए, एक दिन हज़रत ख्वाजा हसन बसरी रहमतुल्लाह अलैह! की मजलिस में आ कर आप से दरयाफ्त फ़रमाया तुम तालिबे इल्म हो या आलिम?
अर्ज़ की में कुछ भी नहीं हूँ, जो कुछ मुझे हुज़ूर नबी करीम सलल्लाहु अलैही वसल्लम से मिला है, उसे मखलूके खुदा तक पहुंचाता हूँ, हज़रते अली शेरे खुदा कर्रामल्लाहु तआला वजहहुल करीम ने आप को तक़रीर से नहीं रोका, और फ़रमाया ये जवान शाइस्ता कलाम है, फिर वहां से चले गए, हज़रत ख्वाजा हसन बसरी रहमतुल्लाह अलैह! ने फरासत से इन्हें पहचान लिया, मिम्बर से उतर कर इन के पीछे पीछे हो लिए, जब इन की खिदमत में पहुंचे तो अदब के साथ अर्ज़ किया, अमीरुल मोमिनीन खुदा के वास्ते मुझे वुज़ू करना सिखाओ हज़रत अली रदियल्लाहु अन्हु ने आप को ज़ाहिरी व बातनी तहारत की तालीम दी, और मज़ीद रूहानी व अख़लाक़ी तरबियत से सरफ़राज़ किया,
हज़रत ख्वाजा हसन बसरी रहमतुल्लाह अलैह! हफ्ते में एक दिन मजलिसे वाइज़ मुनअकिद करते, मिम्बर पर चढ़ कर देखते के अगर हज़रते राबिया बसरी रहमतुल्लाह अलैहा मौजूद होतीं तो वाइज़ करते वरना नीचे आ जाते, किसी ने अर्ज़ किया इतने आली क़द्र बुज़रुग मौजूद हैं अगर एक बुढ़िया ना आए तो क्या हुआ, फ़रमाया जो ग़िज़ा हमने हाथियों के लिए तय्यार की है किस तरह चीटीयों के मुँह में डाल सकते हैं, जब मजलिसे वाइज़ गरम हो जाती और लोगों के दिलों में आग भड़क उठती और आँखों से आंसूं जारी हो जाते तो आप हज़रते राबिया बसरी रहमतुल्लाह अलैहा की तरफ देख कर फरमाते ये सब गर्मी तुम्हारी एक आह जिगर सोज़ की बदौलत है,
क्या आप ने हज़रत अली से फैज़ पाया है?
हज़रत ख्वाजा हसन बसरी रहमतुल्लाह अलैह! ज़ाहिरी उलूम में अगरचे इंफिरादी शान के मालिक थे, मगर उनका सरमायाए इफ्तिखार इल्मे बातिन का कमाल और रूहानियत में आला मकाम रखते थे, जहाँ फुकहाए किराम की नज़र नहीं पहुंच सकती, विलायतो मारफत राहे सुलूक के वो फ़रमाँ रवा थे, आप की ज़ात तसव्वुफ़ का मम्बा और इल्मे बातिन का सर चश्मा थी, तसव्वुफ़ की तमाम नहरें तकरीबन इससे निकलती हैं, तसव्वुफो रूहानियत के अक्सरो बेशतर सलासिल आप ही के वास्ते से हज़रते अली शेरे खुदा कर्रामल्लाहु तआला वजहहुल करीम तक मुनतही होते हैं,
मुहद्दिसीने किराम तहरीर करते हैं के हज़रत ख्वाजा हसन बसरी रहमतुल्लाह अलैह! ने हज़रते अली शेरे खुदा कर्रामल्लाहु तआला वजहहुल करीम से इस्तिफ़ादए रूहानी नहीं किया, मगर अरबाबे तसव्वुफ़ इस बात पर मुत्तफिक हैं के हज़रत ख्वाजा हसन बसरी रहमतुल्लाह अलैह! ने इल्मे बातिन हज़रते अली शेरे खुदा रदियल्लाहु अन्हु से हासिल किया था, हज़रत शाह वलियुल्लाह मुहद्दिसे देहलवी रहमतुल्लाह अलैह लिखते हैं के: अरबाबे तरीकत के नज़दीक हज़रत ख्वाजा हसन बसरी रहमतुल्लाह अलैह! हज़रते अली शेरे खुदा रदियल्लाहु अन्हु की जानिब यकीनी मंसूब हैं, मुहद्दिसीन के नज़दीक ये इन्तिसाब साबित नहीं है,
हज़रत शैख़ अहमद कशाशी रहमतुल्लाह अलैह लिखते हैं के: सूफ़ियाए किराम का इस पर इत्तिफाक है के हज़रत ख्वाजा हसन बसरी रहमतुल्लाह अलैह! ने हज़रते अली शेरे खुदा कर्रामल्लाहु तआला वजहहुल करीम से फैज़ पाया है, सल्फ़ से लेकर खल्फ तक तमाम अकाबिर सूफ़ियाए किराम हज़रत ख्वाजा हसन बसरी रहमतुल्लाह अलैह! को इस सिलसिलए नूरानी का सर चश्मा और शैख़ुश शीयूख मानते हैं, आप रहमतुल्लाह अलैह के अक़वाल से सनद लाते हैं, सूफ़ियाए किराम के तज़किरों में आप रहमतुल्लाह अलैह का नाम सरे फहरिस्त होता है, आप रहमतुल्लाह अलैह के अक़वाल तालीमों तसव्वुफ़ का निसाब माने जाते हैं,
साहिबे सीयरुल अक्ताब! ने इन अल्फ़ाज़ में आप का ज़िक्र किया है के: हज़रत ख्वाजा हसन बसरी रहमतुल्लाह अलैह! बेशुमार फ़ज़ाइलो मनाक़िब और करामात के हामिल थे, आप रहमतुल्लाह अलैह को सरे दफ्तर जमी औलियाए किराम कहा जाता है, तमाम लोगों को रुश्दो हिदायत के ज़रिए सही राह दिखाना और मारफते इलाही की मंज़िल से करीब करना आप का मकसदे हयात था।
सीरतो ख़ासाइल
हज़रत इमाम शुआबि रहमतुल्लाह अलैह ने 70/ सहाबऐ किराम की ज़ियारत का शरफ़ हासिल किया था, और इस बाब में वो हज़रत ख्वाजा हसन बसरी रहमतुल्लाह अलैह! से मुमताज़ थे, मगर इस के बावजूद आप रहमतुल्लाह अलैह बड़ी तअज़ीमों तौकीर अज़मत किया करते थे, एक मर्तबा इन के साहबज़ादे ने से पूछा वालिद गिरामी! में देखता हूँ के जैसा बर्ताव आप हज़रत ख्वाजा हसन बसरी रहमतुल्लाह अलैह! के साथ करते हैं, वैसा किसी दूसरे शख्स के साथ नहीं करते हैं? हज़रत इमाम शुआबि रहमतुल्लाह अलैह ने जवाब दिया बेटा में ने भी हुज़ूर नबी करीम सलल्लाहु अलैही वसल्लम के सत्तर 70/ सहाबऐ किराम को देखा है मगर आप रहमतुल्लाह अलैह से ज़ियादा किसी को इन से मुशाबेह नहीं पाया,
हज़रत ख्वाजा हसन बसरी रहमतुल्लाह अलैह! तमाम महासिन का सर चश्मा सोज़ो गुज़ारे क्लब है, इसी ज़ुहदो वरा, तकवाओ तदय्युन मुत्तकियो परहेज़गार, तमाम अख़लाक़ी व रूहानी फ़ज़ाइल के मालिक थे, हज़रत ख्वाजा हसन बसरी रहमतुल्लाह अलैह! का दिल ऐसा शाकिस्ता साज़ था जिससे दर्द के सिवा कोई नगमा नहीं निकलता था, हज़रत ख्वाजा हसन बसरी रहमतुल्लाह अलैह! पर हमेशा हुज़नो गम तारी रहता था,
एक दिन हज़रत ख्वाजा हसन बसरी रहमतुल्लाह अलैह! ने अपने खादिम को हिदायत की के आज इफ्तार में रोटी और तली हुई मछली बाज़ार से ले आना, खादिम ले आया, इफ्तार के वक़्त जब वो खाना सामने लाया गया तो आप ने फ़रमाया के दुर्वेश का लज़ीज़ खाने से क्या सरोकार खादिम ने अर्ज़ किया हुज़ूर आप ही ने फरमाइश की थी, हज़रत ख्वाजा हसन बसरी रहमतुल्लाह अलैह! ने एक नारा मारा और ज़ारो कतार रोने लगे, यहाँ तक के रोते रोते बेहोश हो गए, जब होश आया तो फरमाने लगे, के खुदा वनदा हसन बसरी! ने भूल से ये कुसूर किया है इसे बख्श दे, और इस का नाम दुरवेशों की फहरिस्त से खारिज मत करना, उस के बाद चालीस रोज़ तक कुछ नहीं खाया, और सिर्फ रोते रहे, फिर ग़ैब से निदा आई के ऐ हसन! हमने तुझ को मुआफ कर दिया, और दुवेशों का सरगिरो यानि सरदार बना दिया, लेकिन दिल शाकिस्ताग़ी न छोड़ना क्यों के ये मुझे बहुत अज़ीज़ है, ये दिल जितना ही शाकिस्ता होता है इतनी ही इज़्ज़तो मन्ज़िलत मेरे हुज़ूर बढ़ जाती है,
हज़रत ख्वाजा हसन बसरी रहमतुल्लाह अलैह! पर खशीयते इलाही का इस क़द्र ग़लबा था, के हर आन लरज़ा तरसा रहते थे, आप रहमतुल्लाह अलैह गुफ्तुगू कम करते थे, ज़ियादा तर ख़ल्वत नशीन हो कर ख़ौफ़े खुदा के सबब रोया करते थे, एक बार अपने मकान के बाला खाने पर ज़िक्रे खुदा में मसरूफ थे, आप रहमतुल्लाह अलैह पर खशीयते इलाही का ग़लबा हुआ और आप रहमतुल्लाह अलैह इतना रोये के अश्को के कतरे परनाले से टपकने लगे, नीचे से एक शख्स गुज़रा जिस पर चंद कतरे गिरे उस ने पूछा ये पानी पाक है या नापाक? हज़रत ख्वाजा हसन बसरी रहमतुल्लाह अलैह! ने उसे जवाब दिया ये पानी एक गुनहगार के आंसूं हैं, अपने कपड़े फ़ौरन धोलो, अक्सर रोते रोते बेहोश हो जाते जब होश आता तो रोरो कर फरमाते थे ऐ अल्लाह पाक! हसन! बड़ा ना फ़रमान और गुनहगार है इस पर रहम फरमा और इसे शर्मसारी से बचाले,
एक बार आप पूरी रात रोते रहे लोगों ने पूछा आप का शुमार तो साहिबे तक़वा लोगों में होता है, फिर इतनी गिर्याओ ज़ारी करते हैं? फ़रमाया में तो उस दिन के लिए रोता हूँ जिस दिन मुझ से कोई ऐसी खता हो गई हो के अल्लाह पाक बाज़ पुर्स कर के ये फरमा दे के ऐ हसन! हमारी बारगाह में तुम्हारी कोई वुक़अत तौकीर नहीं, और हम तुम्हारी पूरी इबादत को रद्द करते हैं, एक दिन हज़रत मालिक बिन दीनार रहमतुल्लाह अलैह हज़रत ख्वाजा हसन बसरी रहमतुल्लाह अलैह! से पूछा के दुनिया का अज़ाब कैसा होता है? तो आप रहमतुल्लाह अलैह ने जवाब दिया दिल का मर जाना, फिर दरयाफ्त किया गया, दिल का मर जाना क्या होता है? जवाब दिया दुनिया में दिल लगाना, एक मर्तबा हज़रत ख्वाजा हसन बसरी रहमतुल्लाह अलैह! ने फ़रमाया मेरे नज़दीक बकरी इंसान से ज़ियादा होशियार है, इस लिए के चरवाहे की, एक आवाज़ पर वो चरने से रुक जाती है, लेकिन इंसान कितना बेखबर है के अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त का हुक्म भी इस को ख्वाहिशात से नहीं रोक पाता।
हज़रत ख्वाजा हसन बसरी रहमतुल्लाह अलैह! और हज्जाज बिन युसुफ़
एक दिन हज्जाज बिन युसुफ़ अपने बहुत से सिपाहियों के साथ हज़रत ख्वाजा हसन बसरी रहमतुल्लाह अलैह! की मजलिस में आ कर बैठ गया, आप ने उस की तरफ ज़रा तवज्जुह नहीं की, और हाज़रीने मजलिस से गुफ्तुगू करते रहे, जब गुफ्तुगू खत्म हुई, तो उनमे से एक शख्स ने कहा के वाकई हसन हसन! ही हैं, हज्जाज बिन युसुफ़ खामोश बैठा देखता रहा, फिर आप के करीब आ कर उसने आप का बाज़ू पकड़ लिया और तमाम हाज़रीन से मुख़ातब हो कर बोला के लोगों! अगर तुम लोग अगर किसी मर्दे खुदा को देखना चाहते हो तो हसन बसरी! को देखो, एक शख्स ने हज्जाज बिन तुसुफ़ को उस के मरने के बाद ख्वाब में देखा, के मैदाने हश्र में जमा हैं, और हज्जाज बिन युसुफ़ भी मौजूद है, इस शख्स ने हज्जाज बिन युसुफ़ से पूछा के आज तू परवरदिगार से क्या मांगेगा? हज्जाज बिन युसुफ़ ने जवाब दिया वही जो खुदा को वाहिद मानने वाले मांगते हैं,
हज्जाज बिन तुसुफ़ के बारे में मशहूर है के जब उस पर हालते नज़आ तारी हुई, तो उसने दुआ मांगनी शुरू की ऐ अल्लाह पाक! सब लोग यक ज़बान हो कर कह रहे हैं, के तू मुझ को मुआफ नहीं करेगा, और नहीं बख्शेगा, लेकिन तू गफ़्फ़ारो करीम है, इन कम हौसला लोगों को दिखला दे के तू जो चाहता है करता है, और मेरे जैसे ख़ताकारों को भी बख्शने में तुझे कोई रुकावट नही तेरी बख्शिश हो जाएगी, हज़रत ख्वाजा हसन बसरी रहमतुल्लाह अलैह! को जब इस वाकिए की इत्तिला मिली, तो आप ने फ़रमाया के वो खबीस अपनी ज़बान तराज़ी और लिसानी से आक़िबत भी सवार लेगा।
आतिश परस्त का इस्लाम कबूल करना
हज़रत ख्वाजा हसन बसरी रहमतुल्लाह अलैह! के पड़ोस में शमऊन नामी एक आतिश परस्त (आग की पूजा करने वाला) रहता था, जब वो बीमार हो कर मरने लगा, और उस पर आलमे नज़आ तारी हुआ, तो लोगों ने आप को खबर दी, आप रहमतुल्लाह अलैह उस के पास तशरीफ़ ले गए, और उस के सिरहाने खड़े हो कर फ़रमाया के ऐ मुशरिक! सारी ज़िन्दगी तो तेरी आतिश परस्ती में गुज़री, अब भी खुदा से डर और इस्लाम कबूल करले ताके अल्लाह पाक तुझे बख्श दे, शमऊन! ने कहा ऐ ख्वाजा! दो बातें मुझे मुस्लमान होने से रोकती हैं, एक तो ये मुस्लमान दौलते दुनिया को बुरा कहते हैं, फिर भी उस के पीछे दौड़ते हैं, और उसकी तलब में मरते हैं, और दूसरे ये लोग मौत को हक जानते हुए भी, इस के लिए कुछ नहीं करते और आइंदा के लिए कोई तदबीर नहीं सोचते, आप रहमतुल्लाह अलैह ने फ़रमाया के मुस्लमान अगरचे ऐसा करते हैं, लेकिन खुदा की वहदानीयत के तो दिल से काइल हैं, और उसका शरीक किसी को नहीं बनाते, अगर वो गुनाह करते हैं तो तौबा भी करलेते हैं, और फिर अल्लाह पाक उनको बख्श देता है, तुमने सारी ज़िन्दगी आतिश परस्ती में गुज़ारी है, में जब जानू के तुम अपनी ऊँगली आग में डाल्दो, और वो इसे ना ना जलाए, लेकिन में उस खुदा की परस्तिश करता हूँ के अगर अपना हाथ आग में डाल दूँ और खुदा से दुआ करूँ के वो ना जले तो फिर क्या मजाल है, जो एक बाल भी जल जाए, शमऊन ने कहा अगर ऐसा हो जाए, जैसा आप फरमा रहे हैं, तो में आप के अल्लाह पर ईमान ले आऊंगा,
आग मौजूद थी हज़रत ख्वाजा हसन बसरी रहमतुल्लाह अलैह! ने अपना हाथ उस में डाल दिया, और थोड़ी देर तक उस में डाले रखा, अल्लाह पाक के हुक्म से आग ने बिलकुल नहीं जलाया, शमऊन ये देख कर हैरान रह गया, और कहा के हज़रत! आप का फरमाना ठीक है, इस्लाम सच्चा है, लेकिन सारी ज़िन्दगी तो इसी तरह तो गुज़री है अब आखरी वक़्त में क्या फाइदा होगा, जब आख़िरत के सामान करने का कोई मौका नहीं रहा, अलबत्ता एक सूरत है के आप मुझे शिफारिस नामा लिख कर दें, के अल्लाह पाक मुझ को बख्श देगा, फिर में ईमान ले आऊंगा, हज़रत ख्वाजा हसन बसरी रहमतुल्लाह अलैह! ने उसी वक़्त एक तहरीर लिख कर उस को दे दी, शमऊन तौबा कर के मुस्लमान हो गया, और खूब रोया, मरने के वक़्त हज़रत ख्वाजा हसन बसरी रहमतुल्लाह अलैह! से वसीयत की के मेरे मरने के बाद आप मुझ को ग़ुस्ल दें, और कब्र में उतारें, और ये तहरीर मेरे हाथ में पकड़ा दें, ताके क़यामत के दिन, में इसे सिफारिश के तौर पर पेश कर दूँ, इतना कह कर शमऊन का ख़त्म हो गया, और हज़रत ख्वाजा हसन बसरी रहमतुल्लाह अलैह! ने इस की तहजीज़ो तकफीन फ़रमाई, और बहुत से लोगों ने नमाज़े जनजा अदा की फिर खुद ही इसे कब्र में उतारा और उस के हाथ में तहरीर दे दी।
मलफ़ूज़ात शरीफ
- इंसान के लिए ज़रूरी है के वो नाफ़े इल्म, अकमल इल्म, इख़्लासो क़नाअत और सबरे जमील हासिल करता रहे, जब ये चीज़ें हासिल
- हो जाएंगी तो इस के उखरवी मरातिब हासिल हो जायेंगे,
- बद इंसान की सुहबत नेक लोगों से दूर कर देती है,
- नफ़्स से ज़ियादा दुनिया में कोई चीज़ सरकश नहीं,
- जो शख्स सीमो ज़र से मुहब्बत करता अल्लाह पाक उसे रुस्वा करता है,
- जिस चीज़ की तुम दूसरों को नसीहत करते हो पहले खुद उस पर अमल करो,
- जिस नमाज़ में दिलजमई न हो वो वजहे अज़ाब बन जाती है,
- इंसान के कलबी खौफ का नाम ख़ुशू है,
- तीन अफ़राद की ग़ीबत दुरुस्त है अव्वल, लाल ची की दोम, फासिक की, सोम ज़ालिम बादशाह की
- जो शख्स खुदा की इताअत करता है, उससे दोस्ती करना तुम पर लाज़िम है क्यों के जो शख्स सालेह इंसान को दोस्त रखता है वो गोया
- खुदा को दोस्त रखता है,
- इस्लाम ये है के तुम अपने क्लब को खुदा के सुपुर्द कर दो, और हर मुस्लमान तुम्हारे हाथों से महफूज़ रहेगा।
आप के खुलफाए किराम
हज़रत ख्वाजा हसन बसरी रहमतुल्लाह अलैह! के पांच जय्यद खुलफाए इज़ाम थे,
(1) हज़रत शैख़ अब्दुल वाहिद बिन ज़ैद
(2) इबने रज़ीन
(3) शैख़ मुहम्मद वआसे
(4) हज़रत राबिया बसरी
(5) हज़रत शैख़ हबीब अजमी रिदवानुल्लह तआला अलैहिम अजमईन।
वफ़ात
आप रहमतुल्लाह अलैह का विसाल 4/ मुहर्रमुल हराम 111/ हिजरी को हुई ज़ीकाइदा 1440/ हिजरी में हुआ।
मज़ार
आप रहमतुल्लाह अलैह का मज़ार मुबारक: मुल्के ईराक के शहर बसरा में मरजए खलाइक है,
“अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त की उन पर बेशुमार रहमत हो और उन के सदके में हमारी मगफिरत हो”
रेफरेन्स हवाला
- मिरातुल असरार
- कशफ़ुल महजूब
- ख़ज़ीनतुल असफिया
- मशाइखे इज़ाम जिल्द अव्वल
- सीयरुल अक्ताब
- तज़किरतुल औलिया

