मीरां जी मुलहिम शहीद हज़रत ख्वाजा अब्दुल्लाह बदायूनी रहमतुल्लाह अलैह

मीरां जी मुलहिम शहीद हज़रत ख्वाजा अब्दुल्लाह बदायूनी रहमतुल्लाह अलैह

नाम व लक़ब

आप का नामे नामी इस्मे गिरामी “ख्वाजा सय्यद अब्दुल्लाह” और लक़ब “मीरां जी मुलहिम” था, और मीरां जी मुलहिम शहीद! के नाम से मशहूर हैं।

बैअतो खिलाफत

हज़रत मीरां जी मुलहिम शहीद हज़रत ख्वाजा अब्दुल्लाह रहमतुल्लाह अलैह! अफगानिस्तान के शहर गज़नी! में पैदा हुए, और वहीँ नशो नुमा तालीमों तरबियत पाई, हुसैनी सय्यद थे, हज़रत शैख़ अब्दुर रहमान मुहम्मद रहमतुल्लाह अलैह! के मुरीद और खलीफा थे, और वो मुरीद व खलीफा हज़रत अबुल कासिम इब्राहीम नसीराबादी रहमतुल्लाह अलैह! के थे, और उन्हें इजाज़तो खिलाफत हज़रत शैख़ अबू बक्र शिब्ली बगदादी रहमतुल्लाह अलैह! से पाई थी, और आप मुरीदो खलीफा थे सय्यदुत ताएफ़ ताऊसुल उलमा हज़रत जुनैद बगदादी रहमतुल्लाह अलैह! के, आप का गज़नी के बुज़ुर्गों में शुमार होता था, इल्मे तजवीद और कुरआन में यगानाए अस्र थे, और फन्ने सिपाह गिरी में भी महारत रखते थे, शहादत के शोक में सुल्तान महमूद ग़ज़नवी की फौज में दाखिल हो कर मुतअद्दिद जिहाद किए और सिपह सालारी का आला मनसब पाया, मुजाहिदे ज़ीवकार वलिए रोज़गार थे, सुल्तान की हमशीरा के पास पंहुचा कर गज़नी से अजमेर आए और काफी मुद्दत वहां मुकीम रहे, नमाज़े फजर के बाद मुराकिबा करते थे, एक रोज़ मुराकिबा की हालत में मुन्कषिफ हुआ के कन्नौज जाने वाले सुल्तानी लश्कर के चौपाए वेदामऊ में रोक लिए गए हैं, उसी वक़्त मुराकिबा से सर उठाया और चंद मुजाहिदीन साथ ले कर बा नियत जिहाद अजमेर से वेदामऊ की समत रवाना हो कर बरसों की मंज़िलें हफ़्तों में तये करते हुए बदायूं में तशरीफ़ लाए, और राजा चन्दर पाल के सिपाहियों से जंग के दौरान शहीद हुए, और ये भी मशहूर है के आप सय्यदुश शुहदा हज़रत सय्यद सालार मसूद गाज़ी बहराइची रहमतुल्लाह अलैह के “उस्ताज़े मुहतरम” थे।

छोटे सरकार मज़ार पर हाज़री देते

साहिबे तसर्रुफ़ और साहिबे करामात हैं आप का आस्ताना मरजए खलाइक है, कोई हाजतमन्द महरूमो मायूस नहीं जाता, हज़रत मीरां जी मुलहिम शहीद ख्वाजा अब्दुल्लाह रहमतुल्लाह अलैह! बदायूं शरीफ के सब से पहले शहीद हैं, आप के मज़ार मुबारक पर हाज़री के लिए छोटे सरकार यानी हज़रत शैख़ अबू बक्र मुऐताब ख्वाजा बदरुद्दीन शाहे विलायत बदायूनी रहमतुल्लाह अलैह! आप की कब्र शरीफ की ज़ियारत करते वक़्त दूर ही से जूते उतार कर आते थे, क्यूंकि इस जगह बेशुमार शुहदाह के मज़ारात हैं, ऐसा न हो के धोके से किसी कब्र पर पैर पड़ जाए।

शेर पथ्थर का हो गया

आप की बेशुमार करामात हैं और अक्सर ज़हूर में आती रहती हैं, एक वाक़िआ भोरजी लड़की का है, जो मुहम्मद तुगलक के दोर में हर जुमे रात को चिराग जलाने आप के मज़ार पर आती थी, एक रोज़ शेर कहीं से आ गया, और मौका पा कर लड़की पर झपटा, वो आप का नाम ले कर चिल्लाई, उस का चिल्लाना था के शेर उसी वक़्त खुदा के हुक्म से पथ्थर का हो गया था और लड़की सही सलामत अपने घर चली गई थी, एक रिवायत ये भी है के लड़की के शोर मचाते ही शेर गायब हो गया था।

विसाल

गालिबन हज़रत मीरां जी मुलहिम शहीद ख्वाजा अब्दुल्लाह रहमतुल्लाह अलैह! की शहादत 420, हिजरी है।

मज़ार शरीफ

आप का मज़ार मुबारक यूपी के ज़िला बदायूं शरीफ में मरजए खलाइक है

“अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त की उन पर बेशुमार रहमत हो और उन के सदके में हमारी मगफिरत हो”

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रेफरेन्स हवाला

  • मरदाने खुदा
  • तज़किरतुल वासिलीन

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